Holi पर Banke Bihari Mandir जाने वाले ध्यान दें! 3 मार्च को बदल गया दर्शन का समय, कहीं बंद न मिलें पट
Holi 2026 Vrindavan Temple Timing: मथुरा-वृंदावन के विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में दर्शन के समय में बड़ा फेरबदल किया गया है। आगामी 3 मार्च को होने वाले चंद्र ग्रहण के मद्देनजर ये बदलाव किया गया है। हैरानी की बात यह है कि जारी की गई समय सारणी के मुताबिक, सूतक काल के दौरान भी मंदिर के पट खुले रखने का निर्णय लिया गया है, जो धार्मिक परंपराओं के विपरीत माना जा रहा है।
मंदिर प्रबंधन समिति के अनुसार, 3 मार्च को मंदिर सुबह 6:15 बजे खुलेगा और 8:30 बजे बंद होगा। वहीं शाम को दर्शन रात 8:00 बजे से 10:00 बजे तक होंगे। विवाद तब शुरू हुआ जब ज्योतिषियों ने बताया कि चंद्र ग्रहण दोपहर 3:20 से शाम 6:47 तक रहेगा, जिसका सूतक काल सुबह 6:20 बजे से ही शुरू हो जाएगा। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या सूतक काल लगने के बावजूद मंदिर के पट खुले रहेंगे?

अन्य मंदिरों ने लिया सख्त फैसला
बांकेबिहारी मंदिर के विपरीत, वृंदावन के अन्य प्रमुख मंदिरों ने ग्रहण और सूतक की मर्यादा का पालन करने का निर्णय लिया है:
- श्री राधारमण मंदिर: यहां 3 मार्च को धुलेंडी मनाई जाएगी। सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक मंदिर के पट 13 घंटे के लिए पूरी तरह बंद रहेंगे।
- श्री राधादामोदर मंदिर: यहां सुबह 9 बजे से पहले ही आरती और श्रृंगार संपन्न कर लिया जाएगा। ग्रहण के बाद मंदिर की शुद्धि और अभिषेक होगा।
बांके बिहारी मंदिर की उत्पत्ति कैसे हुई और यह कितना पुराना है?
उत्तर: बांके बिहारी जी का प्राकट्य 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास जी की निस्वार्थ भक्ति से हुआ था। मान्यता है कि निधिवन में स्वामी जी के मधुर भजनों से प्रसन्न होकर राधा-कृष्ण युगल रूप में प्रकट हुए थे। स्वामी जी के आग्रह पर दोनों एकाकार होकर एक श्यामवर्ण विग्रह (मूर्ति) के रूप में स्थापित हुए, जिन्हें आज हम 'बांके बिहारी' के नाम से पूजते हैं।
प्रश्न 2: बांके बिहारी के दर्शन के दौरान बार-बार पर्दा क्यों डाला जाता है?
उत्तर: यह इस मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा है। मान्यता है कि ठाकुरजी अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत हैं। यदि कोई भक्त उनकी आंखों में लगातार एकटक देख ले, तो ठाकुरजी उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके साथ ही मंदिर छोड़कर चले जाते हैं। इसी 'प्रेम के आकर्षण' को रोकने के लिए हर कुछ मिनटों में पर्दा डाला और खोला जाता है, जिसे 'झांकी दर्शन' कहते हैं।
प्रश्न 3: बांके बिहारी जी को 'त्रिभंग मुद्रा' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: "बांके" शब्द का अर्थ है-तीन जगहों से मुड़ा हुआ। भगवान कृष्ण का यह विग्रह तीन स्थानों (घुटने, कमर और गर्दन) से मुड़ी हुई मुद्रा में है, जिसे शास्त्रों में 'त्रिभंग मुद्रा' कहा जाता है। "बिहारी" का अर्थ है-विहार करने वाला या आनंद लेने वाला। यह कृष्ण का सबसे मनमोहक और रसिक स्वरूप माना जाता है।
प्रश्न 4: मंदिर में सुबह 'मंगला आरती' क्यों नहीं होती?
उत्तर: बांके बिहारी जी को यहां बाल स्वरूप में पूजा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ठाकुरजी पूरी रात निधिवन में रासलीला करते हैं, जिससे वे थक जाते हैं। उन्हें विश्राम देने के लिए सुबह जल्दी (मंगला आरती) नहीं जगाया जाता, बल्कि उन्हें आराम से उठाने के लिए सुबह के दर्शन देरी से शुरू होते हैं। पूरे साल में केवल 'जन्माष्टमी' के दिन ही यहाँ मंगला आरती होती है।
प्रश्न 5: वृंदावन यात्रा की शुरुआत सबसे पहले किस मंदिर से करनी चाहिए?
उत्तर: परंपरा के अनुसार, वृंदावन की यात्रा यमुना जी के दर्शन (केसी घाट) से शुरू करना सबसे उत्तम है। इसके बाद प्राचीनतम मंदिर श्री राधा मदन मोहन जी के दर्शन करने चाहिए। हालांकि, भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस्कॉन मंदिर या बांके बिहारी जी के दर्शन से भी दिन की शुरुआत कर सकते हैं।
प्रश्न 6: बांके बिहारी जी के 'चरण दर्शन' कब होते हैं?
उत्तर: ठाकुर बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन साल में केवल एक बार 'अक्षय तृतीया' के पावन पर्व पर ही होते हैं। शेष पूरे वर्ष उनके चरण वस्त्रों और आभूषणों से ढके रहते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस आर्टिकल में मंदिर से जुड़े कुछ इनपुट धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और प्रचलित इतिहास पर आधारित है।
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