'राइट टू एजुकेशन' के नाम पर छीना जा रहा था गरीब बच्चों का हक, दो गिरफ्तार

वाराणसी। सरकार चाहे कितने भी जतन कर लें उन्हीं के मुलाजिम सरकारी योजनाओं का पलीता लगाने में जुटे हैं। ऐसा ही एक मामला तब सामने आया जब जिले के सिटी मजिस्ट्रेट ने खुद छापेमारी की कर्रवाई करते हुए दो लोगों को गिरफ्तार किया। दरसअल पुलिस की गिरफ्त के आए इन दोनों आरोपियों पर आरोप है कि ये लोग सरकार की योजना राइट टू एजुकेशन के तहत गरीब परिवार के लोगों को दिए जाने वाले अधिकार से उन्हें वंचित कर शहर के अमीर परिवार के लोगों से मोटी रकम वसूल कर सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें पहुंचाने का काम कर रहे थे। सिटी मजिस्ट्रेट विश्राम जी ने खुद छापेमारी कर जनसेवा केंद्र से कई लोगों के आधारकार्ड, नामचीन स्कूलों के आईडी कार्ड और मोहर के साथ तमाम दस्तावेज बरामद हुए है।

varanasi fraud regarding government scheem right to education caught

बड़ी संख्या में नकली दस्तावेज हुए बरामद
सिटी मजिस्ट्रेट विश्राम जी ने मीडिया को बताया कि कई दिनों से सूचना मिल रही थी कि शिवपुर थाना क्षेत्र के कांशीराम आवास के जन सेवा केंद्र से कई फर्जी कामों का संचालन किया जाता है। इस जानकारी पर बीएसए और सिटी मजिस्ट्रेट ने खुद जनसेवा केंद्र पर छापा मारा तो वहां स्कूलों में एडमिशन को लेकर चल रहे फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। यही नहीं कई फर्जी आधार कार्ड भी मिले। साथ ही साथ कई स्कूलों, कालेजों और बेसिक शिक्षा अधिकारी के मोहर बरामद हुई। यही नहीं इस जनसेवा केंद्र से कांशीराम आवासीय योजना के भी कई दस्तावेज बरामद हुए हैं। पूरे मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पूछताछ में दोनों ने बताया कि इनके इस फर्जीवाड़े में कलेक्ट्रेट का बाबू भी शामिल है, जिसकी मदद से ये पूरा काम चल रहा था।

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क्या है राइट टू एजुकेशन
दरसअल सरकार की योजना है कि राइट टू एजुकेशन के तहत शहर के बड़े इंग्लिश स्कूलों में गरीब परिवार के बच्चों को 25 प्रतिशत एडमिशन की सुविधा मुहैया कराई जाए। लेकिन इस बस में सरकारी विभाग के लोग ही मिली भगत कर पैसे वालों से मोटी रकम लेकर उनके बच्चों का इस योजना के तहत एडमिशन करा रहे थे। सिटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि छापेमारी में कई पार्षदों के मोहर और तमाम दस्तावेज बरामद हुए हैं। वहीं पुलिस की गिरफ्त में आने पर अजय गौतम और सूर्यबली पटेल ने बताया कि कलेक्टर के एक बाबू रामवृक्ष की मदद से ये पूरा खेल चल रहा था। वो कलेक्टर के ऑफिस से उनकी मदद करता था और इसके बदले उसे 10 हजार रुपये देने पड़ते थे।

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