उत्तर प्रदेश: नोटों के ‘पहाड़’ तले दबी यूपी की राजनीति ! पीयूष से पोंटी तक

लखनऊ, 29 दिसंबर। उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले नकद नोटों के 'पहाड़' की देशव्यापी चर्चा है। कारोबारी पीयूष जैन के घर नोटों की खान साबित हुए। चार दिन से खुदाई चल रही है। जैसे खान से कोयला निकलता है वैसे ही जैन के घर से काली कमाई के नोट निकल रहे हैं। छापेमारी के दौरान 280 करोड़ की गड्डी ऐसे खड़ी थी जैसे कोई बहुमंजिली इमारत हो। किसी सरकारी रेड में आजतक इतनी नकदी नहीं मिली। 125 किलो सोना भी मिला है। लोग अचंभित हैं।

uttar pradesh election Is Piyush Jain related to any political party?

साधारण सा दिखने वाला आदमी क्या दौलत का इतना बड़ा पहाड़ खड़ा कर सकता है? तरह-तरह की चर्चा चल रही है। कुछ लोगों का कहना है, ये तो इत्तेफाक की बात है कि नोटों की खान का भंडाफोड़ हो गया वर्ना 2022 के चुनाव में धनबल का जबर्दस्त इस्तेमाल होने वाला था। कुछ लोगों का कहना है कि पीयूष जैन तो मोहरा है, ये काली कमाई भ्रष्ट नेताओं की है। इस बीच 'पीयूष गड्डी गाथा' पर भाजपा और सपा के बीच जुबानी तीरंदाजी शुरू है। दोनों, पीयूष जैन को एक दूसरे का आदमी बता रहे हैं। क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति नोटों के पहाड़ तले दबी हुई है ?

क्या पीयूष जैन का किसी राजनीतिक दल से संबंध है ?

क्या पीयूष जैन का किसी राजनीतिक दल से संबंध है ?

क्या पीयूष जैन का किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध है ? इस सवाल का आधिकारिक जवाब अभी नहीं मिला है। इस संबंध में आरोप-प्रत्यारोप ही लगाये जा रहे हैं। लेकिन छापे में शामिल क अधिकारी का कहना है, बिना किसी संरक्षण के दो सौ-तीन सौ करोड़ की नकदी रखना संभव नहीं लगता। ये तो संयोग की बात है है कि इस छिपे खजाने का भेद खुल गया। वर्ना कोई जान ही नहीं पाता। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि पीयूष जैन के पास इतना पैसा है। उसे इतना नकदी रखने का आत्मविश्वास जरूर कहीं से मिला होगा। अभी छापामारी जारी है। कागजातों की जांच चल रही है। यकीन से कुछ कहा नहीं जा सकता। समाजवादी पार्टी कह चुकी है कि उसके विधान पार्षद पम्पी जैन का पीयूष जैन से कुछ लेना देना नहीं है। पीयूष जैन के मामले में भले अभी राजदारी हो लेकिन ये सच है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति धनबलियों के प्रभाव से मुक्त नहीं है। एक समय तो उत्तर प्रदेश के शासन में लिकर किंग पोंटी चड्ढा की तूती बोलती थी।

लिकर किंग के इशारे पर चलती थी सरकार !

लिकर किंग के इशारे पर चलती थी सरकार !

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने 2017 में कहा था, "जिस तरह से इलेक्शन फंडिंग हो रही है, वही भ्रष्टाचार की जड़ है। जब तक ये रहेगा, चीजों का सुधरना मुश्किल है।" कोई भी कारोबारी हो, उसका अंतिम लक्ष्य मुनाफा है। वह जब किसी दल को कोई फंड देता है तो बदले में कई गुना अधिक कमाना चाहता है। गुरदीप चड्ढा उर्फ पोंटी चड्ढा उत्तर प्रदेश का चर्चित शराब कारोबारी था। इस धंधे में उसका एकछत्र राज था जिसकी वजह से उसे लिकर किंग कहा जाता था। उसके पिता कुलवंत चड्ढा मुरादाबाद में शराब की दुकान के आगे चखना बेचते थे। लेकिन पोंटी ने अपने परिवार की किस्मत बदल दी। कहा जाता है कि 1990 के शुरू में पोंटी चड्ढा समाजवादी पार्टी से नजदीकी बढ़ाने में कामयाब रहा। मुलायम सिंह यादव उस समय मुख्यमंत्री थे। पोंटी ने समाजवादी पार्टी के कई बड़े नेताओं से दोस्ती बढ़ा ली। कहा जाता है कि उसने सपा नेताओं के सहयोग से अपने शराब व्यवसाय को खूब फैलाया। 1995 में जब बसपा की सरकार बनी तो पोंटी ने यहां भी अपनी जगह बना ली। 2003 में जब सपा की फिर सरकार बनी तो उसने दोबारा चोला बदल लिया। वह हर दल में अपनी पैठ बनाना जानता था। 2005 में सपा सरकार ने उसे एक बहुत बड़ा ठेका ( इंटीग्रेटेड चाइल्ड प्रोजेक्ट) दिया था।

जब बदल गयी आबकारी नीति

जब बदल गयी आबकारी नीति

पोंटी का आर्थिक साम्राज्य तब खड़ा हुआ जब 2007 में बसपा की सरकार बनी। कहा जाता है कि पोंटी के इशारे पर ही 2009 में बसपा सरकार ने आबकारी नीति बदल दी थी। उत्तर प्रदेश में पहले स्टेट शुगर फेडरेशन (सरकारी संस्था) शराब कंपनियों से थोक में शराब खरीदी थी। फिर फेडरेशन अपने मुताबिक खुदरा दुकानदारों को शराब बेचता था। एक अनुमान के मुताबिक फेडरेशन उस समय हर साल करीब साढ़े चार हजार करोड़ रुपये की शराब खरीदता था। लेकिन बसपा सरकार ने नियम बदल कर शराब खरीदने का जिम्मा पोंटी की कंपनी को दे दिया। पोटी ने इसका जबर्दस्त फायदा उठाय़। वह खुद ही यह तय करने लगा कि किस कंपनी से कौन सी शराब खरीदनी है। शराब कंपनिया अपने कारोबार के लिए पोंटी पर निर्भर हो गयीं। पोंटी उन पर दबाव बना कर कम दाम में शराब खरीदता और ऊंची दाम पर बेचता। उसकी तिजोरी में पैसों की बरसात होने लगी। अब साढ़े हजार करोड़ रुपये के शराब कारोबार पर उसका एकाधिकार था। आरोप है कि बसपा सरकार ने उसे बिना नीलामी के ही 12 जिलों में शराब बेचने का ठेका भी दे दिया था। आरोप है तब उसे 11 सरकारी चीन मिल औने पौने दाम पर नीलाम की गयी थी। सरकारी मुलाजिमों की मिलभगत से उसे रियल एस्टेट के धंधे में फायदा पहुंचाया गया था। 2012 में पोंटी चड्ढा की रहस्यमय परिस्थितियों के बीच हत्या हो गयी थी।

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