Bahubali Files: पूर्वांचल की हवा में बारूद 'मुन्ना बजरंगी', खून का प्यासा! नेता के सीने में उतारीं 100 गोलियां
Uttar Pradesh Bahubali Files Munna Bajrangi: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में, जहां गंगा की लहरें शांत लगती हैं, लेकिन हवा में बारूद की महक घुली रहती है। जहां सूरज उगने से पहले नाम उभरते थे और डूबने से पहले लाशें। इसी जमीन से निकला एक नाम, जो रातों की नींद उड़ा देता और धीरे-धीरे डर का पर्याय बना- 'मुन्ना बजरंगी'।
असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह, लेकिन अपराध की दुनिया में वह बजरंगी बन गया। गरीबी की गलियों से निकलकर उसने एक ऐसा साम्राज्य बुना, जिसमें राजनीति-गैंगवार और खून के धागे जुड़े थे। 40 से ज्यादा हत्याओं का आरोपी, सरकारी ठेकों का मालिक, और मुख्तार अंसारी का दाहिना हाथ। लेकिन उसका अंत उतना ही खौफनाक था-जेल की सलाखों के पीछे, जहां वह खुद को राजा समझता था, वहां गोली की आवाज ने उसकी कहानी खत्म कर दी। आज Oneindia Hindi अपनी Bahubali Files की सीरीज में उस गरीब लड़के की कहानी सुना रहा है, जो कालीन बुनते-बुनते खौफ का पर्याय बन गया...

चैप्टर 1: गरीबी की आग - एक साधारण लड़के का जन्म
2 जून 1967 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पूरेदयाल गांव में एक गरीब किसान परिवार में प्रेम प्रकाश सिंह (Prem Prakash Singh) का जन्म हुआ। पिता पारसनाथ सिंह खेतों में मजदूरी करते, परिवार में चार भाई-राकेश (इंजीनियर, मुंबई में), एक ठेकेदार, और छोटा जुट्टा (बीमारी से मौत)। घर की हालत ऐसी कि पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छूट गई। मुन्ना ने कालीन बुनाई शुरू की, फिर बस कंडक्टर बना। लेकिन उसके मन में फिल्मी गैंगस्टर्स की छवि थी-हथियारों का शौक, दबदबे की चाहत।

1984 में, महज 17 साल की उम्र में, जौनपुर के सुरेही थाने में पहला मर्डर केस दर्ज हुआ, 'एक व्यापारी की हत्या पैसे के विवाद में' । मुन्ना भागा मुंबई, लेकिन अपराध की दुनिया उसे खींचती रही। वह गजराज सिंह गैंग में शामिल हुआ, जहां अपराधी राजनेता बनने का रास्ता दिखा। राजा भैया, डीपी यादव जैसे नामों से प्रेरित होकर मुन्ना ने सोचा-बंदूक नाम देती है, राजनीति अमर बनाती है।

चैप्टर 2: अपराध की सीढ़ियां - छोटे कांड से बड़ा नाम
90 के दशक की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में अपराध फल-फूल रहा था। मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) की सरकार में गैंगस्टरों को राजनीतिक संरक्षण मिलता। मुन्ना ने वाराणसी, गाजीपुर, मऊ में अपना नेटवर्क फैलाया। 1993 में जौनपुर के लाइन बाजार में दिनदहाड़े BJP नेता राम चंद्र सिंह (Ram Chandra Singh) और उनके सरकारी गनर अब्दुल्लाह समेत तीन की हत्या की दी। यह पहला बड़ा कांड था, जो मुन्ना को स्पॉटलाइट में लाया।
1995 में वाराणसी के कैंट इलाके में छात्र नेता राम प्रकाश शुक्ला (Ram Prakash Shukla) की हत्या। फिर 1996 का सबसे खौफनाक कांड-रामपुर थाने के जमालपुर के पास AK-47 से ब्लॉक प्रमुख कैलाश दुबे, पंचायत सदस्य राजकुमार सिंह समेत तीन को मौत के घाट उतारा। मुन्ना अब कॉन्ट्रैक्ट किलर बन चुका था-कारोबारी, डॉक्टर, ठेकेदार सब उसके निशाने पर। दिल्ली तक नेटवर्क फैला, 1998-2000 में कई वारदातें। पूर्वांचल में दबदबा बनाने के लिए 2002 में वाराणसी के चेतगंज में एक ज्वैलर की दिनदहाड़े हत्या की।
वह ब्रजेश सिंह गैंग (Brijesh Singh Gang) से जुड़ा, लेकिन जल्द ही मुख्तार अंसारी गैंग (Mukhtar Ansari Gang) में शिफ्ट हो गया। मुख्तार का गैंग मऊ से चलता, लेकिन असर पूरे पूर्वांचल पर। AK-47 से लैस, सरकारी ठेके हथियाने वाले। मुन्ना प्लानर था-टारगेट तय, एक्जीक्यूशन परफेक्ट। उसका नाम फुसफुसाहट से चीख बन गया।

चैप्टर 3: गैंगवार की जंग - ब्रजेश सिंह vs मुख्तार अंसारी
पूर्वांचल में दो बड़े नाम टकराए-मुख्तार अंसारी (समाजवादी पार्टी से जुड़े) और ब्रजेश सिंह (कृष्णानंद राय के साथ)। 2001 में मऊ-लखनऊ हाईवे पर ब्रजेश गैंग ने मुख्तार गैंग पर घात लगाकर हमला किया-दोनों तरफ तीन-तीन मौतें।
2002 चुनाव में मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी (Afzal Ansari )को कृष्णानंद राय ने हराया। यह मुख्तार के लिए झटका था। मुन्ना अब मुख्तार का दाहिना हाथ था। ठेकों पर कब्जा, वोट मैनेजमेंट, विरोधियों को "मैसेज"-सब मुन्ना संभालता। लेकिन टकराव बढ़ा। मुन्ना ने ब्रजेश सिंह से 'ब्रांड' बनने का रास्ता चुना, लेकिन खौफ की लिस्ट में नाम जुड़ते गए-ठेकेदार, गवाह, नेता। पुलिस की 'डेड-लिस्ट' में मुन्ना टॉप पर।
चैप्टर 4: खून की होली - कृष्णानंद राय हत्याकांड (2005)
29 नवंबर 2005-पूर्वांचल के इतिहास का सबसे खौफनाक दिन। मुख्तार अंसारी के कहने पर मुन्ना बजरंगी ने BJP विधायक कृष्णानंद राय पर हमला प्लान किया। राय अपनी क्वालिस गाड़ी में छह साथियों के साथ जा रहे थे। टाटा सूमो में सवार सात हमलावरों ने घेर लिया। छह AK-47 से 400 से ज्यादा गोलियां दागी। राय के शरीर से 67 गोलियां बरामद हुईं, कुछ रिपोर्ट्स में 60-100 तक। राय समेत सात मौतें। पुलिस ने इसे 'उत्तर प्रदेश माफिया संघर्ष में सबसे बड़ा गोलाबारी प्रदर्शन' कहा।

इस हत्याकांड के पीछे हमलावर थे- मुन्ना बजरंगी, फिरदौस, अता-उर-रहमान उर्फ बाबू, ऐजाजुल हक, विश्वास नेपाली, संजीव माहेश्वरी, राकेश पांडे, रामू मल्लाह। CBI ने बाद में नाम लिए। यह हत्या सियासी हलकों में हलचल मचा दी-मुन्ना मोस्ट वॉन्टेड बन गया और सिर पर 7 लाख का इनाम रखा गया। लेकिन वह दिल्ली-मुंबई में छिपता रहा।
चैप्टर 5: राजनीति का कवच - अपराध को वैधता
मुन्ना ने अपराध को राजनीतिक ढाल दी। 2012 में जेल से अपना दल से विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गया। राजनीति ने उसे इस्तेमाल किया-चुनाव में सुरक्षा, वोट मैनेजमेंट। वह लोकल डॉन से राज्य-स्तरीय बाहुबली बना। सरकारी ठेके, कोल-शराब के कारोबार में हस्तक्षेप। लेकिन केस बढ़ते गए-हत्या, अपहरण, रंगदारी। कुल 40 से ज्यादा मामले, कई राज्यों में दर्ज हुए। जेल उसके लिए जागीर थी-आदेश बाहर पहुंचते, नेटवर्क सक्रिय। 'मैं अंदर हूं, लेकिन सिस्टम बाहर मेरा है'-यह उसकी भूल थी।
चैप्टर 6: गिरावट की शुरुआत - गिरफ्तारी और जेल का जीवन
2009 में, 7 लाख के इनाम के बाद, मुंबई के मलाड में सिद्धिविनायक सोसायटी से गिरफ्तारी हुई। असली नाम प्रेम प्रकाश सिंह से पत्नी सीमा सिंह और तीन बच्चों के साथ रह रहा था। झांसी, बागपत जैसी जेलों से भी साम्राज्य चलता। लेकिन 2017 में योगी सरकार के आने के बाद सख्ती बढ़ी।
चैप्टर 7: जेल में अंत - बागपत की खूनी सुबह
8 जुलाई 2018 को झांसी जेल से बागपत ट्रांसफर किया। 9 जुलाई सुबह 6:30 बजे, बैरक में चाय पीते वक्त साथी कैदी सुनील राठी ने 10 गोलियां मुन्ना के सिर में ठोक दी। मुन्ना ढेर। जेलर, डिप्टी जेलर सस्पेंड। मौत के बाद सवाल-गैंगवार? सिस्टम की चूक? या बदला? मुन्ना की मौत ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए। वह खौफ का शिकार बन गया, जो खुद खौफ फैलाता था।
खौफ की विरासत - एक चेतावनी
मुन्ना बजरंगी पूर्वांचल के बाहुबली युग का प्रतीक था। लेकिन अंत अकेला होता है। उसकी कहानी बताती है कि बंदूक नाम देती है, लेकिन कानून की पहुंच से कोई नहीं बचता। पूर्वांचल ने कई मुन्ना देखे-मुख्तार, ब्रजेश-लेकिन सबक एक कि खौफ कभी अमर नहीं। अगर आप चाहें, Oneindia Hindi अपनी अगली कड़ी में 'बाहुबली फाइल्स - सीरीज 3: मुख्तार अंसारी' ला सकते हैं। कमेंट में बताएं!












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