यूपी विधानसभा चुनाव 2022: दलित वोटरों की कौन सी पार्टी होगी पहली पसंद?
लखनऊ, 17 नवंबर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के लिए राजनीतिक पार्टियों ने अपनी चुनावी विसात बिछानी शुरू कर दी है। जनता के बीच लोक-लुभाने वादे के साथ सभी राजनीतिक पार्टियां संपर्क साध रही हैं। यूपी में हर बार की तरह भले ही राजनीतिक पार्टियां विकास का दम भर रही हैं लेकिन हर बार की तरह इस बार भी जातिगत राजनीति का बोलबाला है। राजनीतिक पार्टियां विभिन्न जातियों के वोटरों के साधने के लिए अपना जाल फैला रही हैं। वहीं दलित वोटरों को साधने के लिए सभी पार्टियां अपने पैतरे चल रही हैं क्योंकि ये दलित वोटर ही पिछले चुनावों में प्रदेश की सरकार का स्वरूप तय करने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 2022 के चुनाव में दलित वोटर की पहली पसंद कौन सी पार्टी होगी?

बसपा खो चुकी है अपना वर्चस्व
बहुज समाजवादी पार्टी जो दलितों के वोटों पर अपना एकाधिकार मानती है, लेकिन पिछले चुनावों में बहुत बुरी तरह परास्त होकर अपने लिए राजनीतिक अस्तित्व पर ही संकट खड़ी कर चुकी है। यहीं कारण है कि इस चुनाव में बसपा को नेता मुख्य विरोधी पार्टी तक नहीं मान रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद बसपा सुप्रीमों मायावती 2022 के चुनाव में दमदार वापसी करने के दावे कर रही हैं।वाराणसी विधानसभा सीटों के पिछले चुनाव परिणाम पर डाले नजर, जानें किसका लहराया परचम
जानें किसे वोट करते रहे हैं दलित?
बात अगर पिछले चुनावों की करें तो 2012 और 2017 में बसपा की हालत हर बार और बिगड़ती गई। 2007 में मायावती का सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला रंग लाया और 30.43 फीसदी वोट हासिल कर 206 सीट जीत का पचचम लहराया और प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। लेकिन बसपा को 2012 यूपी विधानसभा चुनाव में 25.9 फीसदी वोट हासिल हुए और कुल 403 में से केवल 80 सीट पर जीत हासिल कर सकी। 2017 विधान सभा चुनाव में 23 फीसदी वोट के साथ बसपा 403 सीटों में से बसपा महज 19 सीटों पर सिमट कर रह गई। जिनमें बगावत के बाद अब केवल सिर्फ 7 विधायक बचे हैं। वहीं इसके दो साल बाद 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में 80 सीटों में से महज 10 सीट पर ही बसपा ने जीत हासिल की।
दिग्गज नेताओं ने छोड़ा बसपा का साथ
एक समय में मायावती ने यूपी की राजनीति में अपना परचम लहराया। चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाली मायावती भारत की सबसे युवा महिला सीएम के साथ सबसे पहली दलित मुख्यमंत्री भी बनी थी। 2003 में चुनाव हार गई और 2007 का चुनाव जीत कर सत्ता पर काबिज हुई। चौथी बार यूपी की सीएम बनी लेकिन 2012 में सपा से हार कर सत्ता गवां दी। बसपा एक समय में ऐसी पार्टी थी जिसकी यूपी का वर्चस्व था उसकी हालत खराब होने के साथ ही कई दिग्गज नेता बसपा छोड़ कर अन्य पार्टियों में चले गए। गैरभाजपाई पिछड़े और दलित वर्ग के नेता बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर रहे है जिसका लाभ सपा को हो सकता है। सपा गांव-गांव जाकर दलित वोटरों से संपर्क साध रही है। भाजपा भी दलितों को साधने के लिए कोई मौका नहीं गवां रही है।
21 प्रतिशत मतदाताओं का सरकार बनाने में अहम भूमिका
उत्तर प्रदेश के 21फीसदी दलित वोटरों ने कभी मुस्लिम तो कभी ओबीसी के साथ प्रदेश में सरकार का निर्धारण तय किया है। उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व हैं। 2017 के चुनाव में 86 विधानसभा सीटें आरक्षित थीं जिनमें से 76 पर भाजपा ने ही जीत हासिल की थी। वहीं 2007 विधानसभा चुनाव में बहुजन समाजवादी पार्टी ने 89 आरक्षित सीटों में से 62 सीटें जीत हासिल कर जीत हासिल कर प्रदेश में सरकार बनाई थी।
भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद की पार्टी
हालांकि बसपा के अलावा आजाद समाज पार्टी के प्रमुख और भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद दलितों के यूपी में पकड़ से इंकार नहीं किया जा सकता। पश्चिमी उत्तर प्रदेश जो कि बसपा का गढ़ माना जाता है उसमें चंद्रशेखर आजाद की पार्टी ने पंचायत चुनाव में 40 से ज्यादा सीटों पर कब्जा जमाकर सेंध लगा दी है। इसलिए इस पार्टी को हल्के में लेना राजनीतिक पार्टियों की भूल होगी। अगर दो या तीन फीसदी भी दलितों के वोट चंद्रशेखर या उनकी सहयोगी पार्टी को गए तो सीधा नुकसान बसपा को होना तय है।
क्या कहते हैं राजनीतिक के जानकार
वहीं राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों के अनुसार पिछले चुनाव परिणाम की सर्वे रिपोर्ट इस बात की गवाह है कि साल दर साल भाजपा को वोट करने वाले दलित वोटरों की संख्या में इजाफा हुआ है। आगामी चुनाव में भी दलितों का वोट एक ही पार्टी को ना जाकर बंट जाएगा।
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