'कांग्रेस मुक्त'हुई यूपी विधान परिषद, पहली बार सदन में नहीं होगा विपक्ष का नेता

लखनऊ, 08 जुलाई। उत्तर प्रदेश में 2017 में भारतीय जनता पार्टी के उदय के बाद विपक्षी दलों के सामने खुद को बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। जिस तरह से एक के बाद एक लगातार दो चुनाव में विपक्ष को विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा उसके बाद भाजपा प्रदेश में काफी मजबूत हुई है। योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में 2017 के बाद 2022 में भाजपा ने एक बार फिर से जबरदस्त वापसी की। एक तरफ जहां विपक्ष पहले सत्ता से दूर हुआ तो दूसरी तरफ अब ऊपरी सदन में भी विपक्ष को बड़ा झटका लगा है। भाजपा देश को कांग्रेस मुक्त करने की लंबे समय से बात करती आई है और यूपी की विधान परिषद में पार्टी को यह लक्ष्य हासिल भी हो गया है।

पहली बार विपक्ष का नेता नहीं होगा

पहली बार विपक्ष का नेता नहीं होगा

यूपी काउंसिल के प्रमुख सचिव राजेश सिंह ने जो नोटिफिकेशन जारी किया है उसमे कहा गया है कि 27 मई 2022 को उत्तर प्रदेश विधान परिषद में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थी और उसके 11 सदस्य थे। जिसकी वजह से उनके सदस्य सपा के सदस्य लाल बिहारी यादव विपक्ष के नेता थे। लेकिन 7 जुलाई 2022 में सपा के कुल 9 सदस्य ही सदन में हैं, लेकिन उपरी सदन के नियम 234 के तहत विपक्ष के नेता के पद के लिए कम से कम 10 सदस्यों की जरूरत होती है। जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चेयरमैन ने विपक्ष के नेता के पद से लाल बिहारी यादव को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है, अब वह सिर्फ सपा के नेता होंगे।

देश की सबसे बड़ी विधान परिषद

देश की सबसे बड़ी विधान परिषद

राजेश सिंह ने बताया कि विधान परिषद नियम और परंपरा के अनुसार चलता है। यह भी नियम और परंपरा के तहत है, अगर किसी भी राजनीतिक दल के 10 फीसदी से कम सदस्य हैं तो उसे सदन में विपक्ष के नेता का पद नहीं दिया जा सकता है। बता दें कि उत्तर प्रदेश की विधान परिषद देश की सबसे बड़ी विधान परिषद है। यहां तक कि उत्तराखंड के अलग होने के बाद 8 विधान परिषद की सीटें खत्म हो गईं, बावजूद इसके यूपी की विधान परिषद देश की सबसे बड़ी विधान परिषद है। ऐसा पहली बार है कि यूपी विधान परिषद में विपक्ष का नेता नहीं होगा।

क्या है विधान परिषद की स्थिति

क्या है विधान परिषद की स्थिति

यूपी की विधान परिषद की बात करें तो इसकी कुल क्षमता 100 सदस्यों की है, जिसमे 73 सदस्य भाजपा के हैं, 9 सपा के, 1 बसपा के और 9 अन्य हैं। जबकि 8 सीटें अभी खाली हैं। यूपी की 100 विधान परिषद की सीटों में से 36 को स्थानीय संसदीय क्षेत्र से चुना जाता है। पिछले महीने इन 36 सीटों पर चुनाव हुआ था, जिसमे से 33 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी, जबकि बाकी की सीटों पर निर्दलीय को जीत मिली थी। हाल ही में 6 जुलाई को 13 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि सपा के खाते में सिर्फ 4 सीटें आई हैं। जिसके बाद भाजपा के विधान परिषद में कुल 73 सदस्य हो गए हैं। वहीं बसपा के पास सिर्फ एक सीट बची है।

 भाजपा को घमंड नहीं करना चाहिए।

भाजपा को घमंड नहीं करना चाहिए।

पहली बार विधान परिषद में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। कांग्रेस के एकमात्र विधायक दीपक सिंह बुधवार को रिटायर हो गए। कांग्रेस के पूर्व विधान परिषद सदस्य दीपक सिंह ने कहा कि यह सच है कि यूपी की विधान परिषद में विपक्ष की संख्या काफी कम हो गई है और यह अबतक की सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है, कांग्रेस का अब एक भी सदस्य सदन में नहीं है, लेकिन भाजपा को इस बात का घमंड नहीं होना चाहिए। अब भाजपा के पतन और कांग्रेस के उदय का समय शुरू होगा।

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