UP: BJP के उदय के साथ ही शुरू हुआ RLD के पतन का दौर, पार्टी को पुराना रुतबा दिला पाएंगे जयंत चौधरी?
राष्ट्रीय लोकदल का गठन 1999 में हुआ था। हालांकि उसे राज्य की पार्टी का दर्जा 2002 में मिला था लेकिन जयंत चौधरी की पार्टी 24 साल बाद वहीं आकर खड़ी हो गई है जहां से उसने शुरुआत की थी। जयंत के लिए यह चुनौतियों भरा समय है।

Rashtriya Lok Dal political journey: राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के चीफ जयंत चौधरी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। निकाय चुनाव की तैयारियों में जुटे रालोद को बड़ा झटका उस समय लगा जब चुनाव आयोग ने क्षेत्रिय पार्टी के दर्जे को समाप्त कर दिया। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो 1999 से शुरू हुआ रालोद का सफर 24 साल बाद वहीं पहुंच गया है जहां से उसकी शुरुआत हुई थी। RLD के लिए मुश्किल दौर तब शुरू हुआ जब केंद्र में 2014 में बीजेपी की सरकार बनी। अब जयंत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उनको फिर क्षेत्रिय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ेगा।
2009 लोकसभा चुनाव में RLD ने जीती पांच लोकसभा सीटें
रालोद के राजनीतिक सफर पर गौर किया जाए तो 1999 में एक गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत पार्टी से इसका सफर शुरू हुआ था। इसके ठीक दस साल बाद यानी 2009 के लोकसभा चुनाव में यूपी से रालोद के पांच लोकसभा सांसद चुनकर संसद पहुंचे थे। रालोद के तत्कालीन चीफ चौधरी अजीत सिंह 2011 में कांग्रेस की सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रहे। वहीं यूपी की बात करें तो एक समय ऐसा था जब यूपी में आरएलडी के 14 विधायक और छह मंत्री (2003-2007) तक थे।
बीजेपी के केंद्र में उदय के बाद शुरू हुआ रालोद के पतन का दौर
राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज कहते हैं कि,
जयंत चौधरी के लिए एक कठिन समय है।1999 में अजीत सिंह ने रालोद का गठन किया। 2009 के लोकसभा चुनाव में उसको सबसे बड़ी सफलता मिली जब उसके पांच सासंद चुनकर आए थे। लेकिन जैसे ही केंद्र में बीजेपी सरकार 2014 में बनी उसके बाद से पार्टी का लगातार पतन होता चला गया। बीजेपी के उभार के बीच अब उनको नई रणनीति और नए उत्साह के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।
कभी कांग्रेस तो कभी बीजेपी सरकार में मंत्री बने अजीत सिंह
उत्तर प्रदेश में 2002 के विधानसभा चुनावों से पहले 2001 में अजीत ने भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन किया और 2001 में वाजपेयी सरकार में कैबिनेट में जगह पाने में कामयाब रहे। वह केंद्रीय कृषि मंत्री बने और 2003 तक इस पद पर रहे। इससे पहले उन्होंने वीपी सिंह सरकार (दिसंबर 1989-नवंबर 1990) में उद्योग मंत्रालय और 1996 में खाद्य मंत्री के रूप में कार्य किया था। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही रालोद के लिए परिस्थितियां बदलती चली गईं क्योंकि बीजेपी ने यूपी में अपनी रणनीति में बदलाव किया।

2002 में मिला था राज्य पार्टी का दर्जा
हालांकि 2002 के यूपी विधानसभा चुनावों में रालोद ने भाजपा के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा और 14 सीटों पर जीत हासिल की। रालोद को पहली बार एक राज्य पार्टी का दर्जा मिला था। ये वो समय था जब रालोद में यूपी में सत्ता की कुंजी बन गई थी। लेकिन अजीत सिंह की महात्वाकांक्षा की वजह से 2003 में उन्होंने बीजेपी से नाता तोड़ा और सपा से गठबंधन कर लिया। समाजवादी पार्टी के प्रमुख और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मंत्रिमंडल में अनुराधा चौधरी, कोकब हामिद और स्वामी ओमवेश समेत छह रालोद विधायकों को जगह दी थी।
2004 लोकसभा चुनाव में रालोद ने जीती 3 सीटें
RLD ने SP के साथ गठबंधन में 2004 का लोकसभा चुनाव लड़ा और तीन सीटों बिजनौर (मुंशीराम), बागपत (अजीत सिंह) और कैराना (अनुराधा चौधरी) में जीत हासिल की। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई लेकिन आरएलडी ने इससे दूरी बनाए रखी। 2007 के यूपी चुनाव में अजीत ने अपनी रणनीति बदली और रालोद अकेले चुनाव लड़ी और उसने 10 सीटें जीतीं। यह वही चुनाव था जब बसपा सुप्रीमो मायावती ने यूपी में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई थी।

2014 में शुरू हुआ आरएलडी के पतन का दौर
अजीत ने 2009 के लोकसभा चुनावों में सात सीटों पर फिर से भाजपा के साथ गठबंधन किया और पांच पर जीत हासिल की। लेकिन 2011 में वह यूपीए में शामिल हो गए। उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्री बनाया गया था। अजीत सिंह ने मई 2014 तक कार्यभार संभाला। आरएलडी 2012 के यूपी चुनावों में कांग्रेस की सहयोगी रही और उसने नौ सीटें जीतीं। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों में अजीत कांग्रेस के फेर में फंस गए और उनका यह कदम पार्टी के लिए भारी पड़ गया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की प्रचंड जीत के बीच रालोद का सफाया हो गया। यहीं से रालोद के पतन का दौर शुरू हो गया।
रालोद के प्रदेश अध्यक्ष रामाशीष राय कहते हैं,
चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि पार्टी अभी भी यूपी के राजनीतिक मैदान पर मजबूत स्थिति में है और राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी के नेतृत्व में रालोद इस बाधा को भी आसानी से पार कर लेगी। राज्य का दर्जा छिनने के पीछे बड़ी ताकतें लगी थीं क्योंकि उनको डर था कि किसान उनके खिलाफ खड़ा हो रहा है। 2024 के चुनाव में पार्टी नई रणनीति और तेवर के साथ मैदान में उतरेगी।

यूपी में रालोद के पास हैं आठ विधायक
2017 के यूपी चुनावों में जब बीजेपी यूपी की सत्ता पाने में कामयाब रही तब रालोद अकले चुनाव लड़ी और सिर्फ एक सीट तक सीमित हो गई। इसके एकमात्र विधायक सहेंद्र सिंह रमाला भी बाद में भाजपा में शामिल हो गए। रालोद ने 2018 में कैराना उपचुनाव जीतकर कुछ खोई हुई जमीन हासिल की, लेकिन एक और झटका उस समय लगा जब सपा और बसपा के साथ गठबंधन में 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन वह एक भी सीट जीतने में नाकाम रही। इस बीच कोरोना महामारी के बाद 2021 में अजीत के निधन के बाद RLD की बागडोर उनके बेटे जयंत चौधरी के हाथ में आ गई। इनके पास एक नए संगठन को चलाने का काम था। पार्टी को 2022 के यूपी चुनावों में कुछ मजबूती मिली जब उसने सपा के साथ गठबंधन किया और आठ सीटें जीतीं।
रालोद को दोबारा खड़ा करने की जयंत के सामने चुनौती
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष रह चुके आंजनेय उपाध्याय कहते हैं कि,
रालोद के लिए "अस्तित्व का संकट" ऐसे समय में आया है जब वह आगामी निकाय चुनावों और लोकसभा चुनावों से पहले फिर से उभरने की कोशिश कर रही थी। रालोद और जयंत दोनों के लिए यह समय काफी कठिन है। ऐसे समय में जयंत के राजनीतिक कौशल की परीक्षा होगी क्योंकि उनपर पार्टी को फिर से पुराना रूतबा दिलाने की जिम्मेदारी और दबाव दोनो होगा।












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