जाट बहुल सीटों को रैली के लिए चुन अपना ही नुकसान तो नहीं कर रहे जयंत-अखिलेश!

जाट बहुल सीटों को रैली के लिए चुन अपना नुकसान तो नहीं कर रहे जयंत और अखिलेश

लखनऊ, 23 दिसंबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए सभी दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव रखने वाली राष्ट्रीय लोकदल ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया है। दोनों दलों के मुखिया यानी जयंत चौधरी और अखिलेश यादव ने साझा रैलियां भी शुरू कर दी हैं। मेरठ के दबथुआ में रैली करने के बाद आज (23 दिसंबर) जयंत और अखिलेश अलीगढ़ के इगलास में संयुक्त रैली करने जा रहे हैं। खास बात है कि दोनों ही बार रैली के लिए जाट बहुल इलाकों को चुना गया है।

 सिवाल खास और इगलास दोनों रालोद के प्रभाव वाले क्षेत्र

सिवाल खास और इगलास दोनों रालोद के प्रभाव वाले क्षेत्र

यूपी चुनाव के लिए सपा और रालोद की पहली संयुक्त रैली मेरठ की सिवालखास विधानसभा सीट में आने वाले कस्बा दबथुवा में 7 दिसंबर को हुई थी। सिवाल खास लोकसभा में बागपत का हिस्सा है और ये क्षेत्र चरण सिंह के समय से ही खास रालोद का गढ़ रहा है। वहीं अलीगढ़ का इगलास भी चरण सिंह के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है। इगलास को मिनी छपरौली तक कहा जाता है। जाहिर है राजनीतिक दल अपने प्रभाव वाले क्षेत्र को ही रैली के लिए चुनते हैं और इसमें कोई खराबी नहीं है लेकिन इससे सपा-रालोद और खासतौर से रालोद को एक नुकसान हो सकता है।

जाटों तक सीमित हो सकती है रालोद!

जाटों तक सीमित हो सकती है रालोद!

जयंत चौधरी इस समय राष्ट्रीय लोकदल को खड़ा करने की कोशिश में लगे हैं। रालोद को लेकर जब भी कहा जाता है कि ये जाटों की पार्टी है तो जयंत इसका समर्थन नहीं करते हैं। उनका कहना है कि ये सभी वर्गों की पार्टी है। चरण सिंह को किसान मजदूरों का समर्थन मिलता भी था। ऐसे में जब जयंत पार्टी को फिर से खड़ा कर रहे हैं तो जाट बहुल इलाकों में उनकी रैलियों को पार्टी के 'जाटों की पार्टी' कहे जाने को फिर ताकत देगी। ऐसे में दूसरे वर्ग शायद उनसे उस तरह से ना जुड़ सकें।

भाजपा भी उठाएगी लाभ

भाजपा भी उठाएगी लाभ

सपा रालोद का सीधा मुकाबला इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से दिख रहा है। पश्चिम यूपी में रालोद-सपा की इन रैलियों के जाट बहुल इलाकों में होने का भाजपा भी लाभ ले सकती है। बीजेपी इसके जरिए रालोद को जाटों तक सीमित कर तमाम दूसरे वर्गों को अपने से जोड़ने का अभियान चला सकती है। जैसा कि भाजपा का प्रचार तंत्र यादवों को सपा और जाटवों को बसपा से जोड़ पहले भी कर चुका है। ऐसे में जयंत चौधरी को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।

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