UP News: आप भी बदलवा सकते हैं अपना नाम ? जानिए बोर्ड के ख़िलाफ़ याचिका पर HC ने क्या दिया निर्णय

Allahabad high court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है पसंद का नाम रखना सबका मौलिक अधिकार है और इससे किसी को वंचित नहीं किया। यूपी बोर्ड के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह बातें कहीं हैं।

हाईकोर्ट

Allahabad high court: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाम बदलने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। यदि आप भी अपना नाम बदलना चाहते हैं तो उसमें बदलाव कर सकते हैं। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि पसंद का नाम रखने या व्यक्तिगत वरीयता के अनुसार इसे बदलने का अधिकार भारत के संविधान में निहित मौलिक अधिकारों के दायरे में आता है और यह अधिकार सबके पास है।

अदालत ने माध्यमिक शिक्षा परिषद के आदेश को किया रद्द

समीर राव द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति अजय भनोट ने क्षेत्रीय सचिव, माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड), क्षेत्रीय कार्यालय, बरेली, यूपी द्वारा पारित 24 दिसंबर, 2020 के एक आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता ने अपना नाम "शाहनवाज" से बदलकर "मोहम्मद समीर राव" करने और उक्त परिवर्तन को शामिल करते हुए नए हाई स्कूल और इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र जारी करने का आवेदन दिया था जिसे बोर्ड ने खारिज कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने बोर्ड में किया था नाम बदलने का आवेदन

याचिकाकर्ता ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के परीक्षा प्रमाणपत्रों में अपना नाम बदलने का अनुरोध करने वाले उसके आवेदन को खारिज करने की यूपी बोर्ड की कार्रवाई को चुनौती दी थी। अदालत ने फैसला सुनाया कि पसंद का नाम रखने या व्यक्तिगत पसंद के अनुसार नाम बदलने का अधिकार अनुच्छेद 19 (1) (ए) (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के दायरे में आता है।

हाईस्कूल और इंटरमीडिएट में दर्ज नाम में बदलाव की मांग

दरअसल याचिकाकर्ता का नाम क्रमशः 2013 और 2015 में यूपी बोर्ड द्वारा जारी किए गए हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के प्रमाणपत्रों में "शाहनवाज" के रूप में दर्ज था। सितंबर-अक्टूबर 2020 में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कानूनी तरीकों से अपना नाम "शाहनवाज़" से "मोहम्मद समीर राव" कर लिया था। उन्होंने वर्ष 2020 में बोर्ड में अपना नाम "शाहनवाज" से "मोहम्मद समीर राव" करने के लिए आवेदन किया। उक्त आवेदन को बोर्ड ने नियमों का हवाला देते हुए अस्वीकार कर दिया था।

बोर्ड का नियम-तीन साल के भीतर ही करना होता है आवेदन

आवेदन के जवाब में बोर्ड ने बताया था कि उम्मीदवार द्वारा परीक्षा में उपस्थित होने के तीन साल के भीतर नाम परिवर्तन के लिए एक आवेदन दायर किया जाना चाहिए। हालाँकि, इस मामले में, याचिकाकर्ता द्वारा क्रमशः हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में उपस्थित होने के सात साल और पांच महीने बाद आवेदन दायर किया गया था।

अदालत ने बोर्ड की दलील को किया खारिज

अदालत ने बोर्ड की दलील को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों पर कोईर् प्रतिबंध लागू नहीं होगा। भारत के संविधान के मौलिक अधिकारों के तहत अपना नाम चुनने और बदलने का अधिकार सबके पास है।

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