Kargil Vijay diwas 2025: 'मैं परमवीर चक्र विजेता बनना चाहता हूं', चाचा ने बताई कैप्टन मनोज के हौसलों की कहानी
Kargil Vijay diwas 2025: उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के रूठा गांव के रहने वाले देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडेय की कहानी खुद उनके चाचा की जुबानी सुनिए। उन्होंने बताया किस तरह उनके बेटे ने देश की रक्षा की और क्या सपने अभी और देखे थे।
मनोज पांडे का जन्म 1975 में सीतापुर के छोटे से गांव रूठा में एक साधारण परिवार में हुआ था। मनोज के चाचा बताते हैं कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव पर ही हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने लखनऊ जाना उचित समझा।

लखनऊ में उनका दाखिल एक सैनिक स्कूल में कराया गया। अन्य करियर विकल्प होने के बावजूद, मनोज पांडे ने सेना में शामिल होने का विकल्प चुना।
मनोज शुरू से देश के लिए कुछ करना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने सेना में शामिल होने का अपना देखा और इसे पूरा करने के लिए जी जान से लग गए। सेना ने शामिल होने के लिए वह खुद को मजबूत करनें में लग गए। नित्य व्यायाम और दौड़ करने लगे।
उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, जहां साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया कि वह सेना में क्यों शामिल होना चाहते हैं। उन्होंने आत्मविश्वास से उत्तर दिया, "मैं परमवीर चक्र विजेता बनना चाहता हूं।"कारगिल युद्ध के दौरान भीषण स्थिति के कारण सैनिकों की सभी छुट्टियाँ रद्द कर दी गई थीं। 24 साल की उम्र में कैप्टन मनोज पांडे को ऑपरेशन विजय के तहत बारोटोप पर कब्ज़ा करने का महत्वपूर्ण काम दिया गया था।
कैप्टन मनोज पांडे का हौसला कभी नहीं डिगा। युद्ध के बीच उन्होंने अपने विचारों को अपनी डायरी में दर्ज किया। 3 जुलाई 1999 को उन्हें खालुबार को दुश्मन से आज़ाद कराने का मिशन सौंपा गया। जब उनके सैनिकों ने बाईं ओर से दुश्मन पर हमला किया, तो उन्होंने दाईं ओर से हमला किया, एक बाघ की क्रूरता के साथ अपने सैनिकों का नेतृत्व किया, दुश्मन के बंकरों को नष्ट कर दिया और पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में जीत हासिल की।












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