यूपी चुनाव: BSP का अस्तित्व बचाना मायावती के लिए क्यों है मुश्किल ? ये हैं 5 बड़ी चुनौतियां
लखनऊ, 26 नवंबर: बसपा प्रमुख मयावती को यूपी की सत्ता से बेदखल हुए 2022 के विधानसभा चुनाव होने तक 10 साल पूरे हो जाएंगे। इस एक दशक में बीएसपी सुप्रीमो का साथ छोड़ने वाले पार्टी के दिग्गज नेताओं की लगभग सेंचुरी पूरी हो चुकी है। 2012 में जब समाजवादी पार्टी ने उसे सत्ता से बेदखल किया तो वह 80 सीटें लेकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। लेकिन, 2014 के लोकभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर में यह 'हाथी' भी बह गया। 2017 आते-आते इस पार्टी की हैसियत महज 19 विधायकों तक सिमट गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में सारा मान-सम्मान और गेस्ट हाउस की कड़वी यादों को भुलाकर 'हाथी' को साइकिल पर बिठाने की कोशिश की गई तो वो किसी तरह से 10 सीटें तो निकाल लाईं, लेकिन इसमें बहुजन समाज पार्टी का कितना योगदान रहा, ये हमेशा के लिए एक सवाल बन गया। क्योंकि, इसके कुछ ही समय बाद विधानसभा उपचुनाव हुए तो बीएसपी अपनी सीट भी गंवा बैठी और इसके विधायकों का आंकड़ा घटकर 18 रह गया। आज की तारीख ये कहती है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में बहनजी की पार्टी की ताकत अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल और कांग्रेस से भी कम हो गई है और वह ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा के बराबर आ गई है।

विधायकों का पार्टी छोड़ने का सिलसिला-पहली चुनौती
इस साल जून से लेकर अबतक बसपा से कुल 10 विधायक या तो निकाल-बाहर किए जा चुके हैं या फिर उन्होंने खुद ही पार्टी के साथ काम नहीं करने का फैसला किया है। इनमें से तो दो पार्टी के विधानमंडल दल के नेता रहे हैं। लालजी वर्मा को मायावती ने खुद दल-विरोधी गतिविधियों के कारण निकाला था और शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली गुरुवार को नेतृत्व से असंतुष्टि जताकर हाथी से उतरने का ऐलान कर चुके हैं। चर्चा है कि उनकी भी सेटिंग पार्टी के बाकी विधायकों की तरह अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से हो चुकी है। यूपी के सबसे अमीर विधायक शाह आलम से एक दिन पहले आजमगढ़ की सगड़ी सीट से पार्टी एमएलए वंदना सिंह भी निकल चुकी हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य में माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई करके जो माहौल बनाया है, उसके चलते विधायक मुख्तार अंसारी को पार्टी पहले ही दूर कर चुकी है। यानी सुखदेव राजभर के निधन के बाद पार्टी के पास प्राभावी तौर पर चार ही विधायक बचे हैं।

दलित वोट बैंक में सपा की सेंधमारी- दूसरी चुनौती
संविधान दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में शुक्रवार को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव शुक्रवार को लखनऊ के अंबेडकर स्मृति उपवन में जिस मंच पर मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे थे, वह भी बसपा सुप्रीमो के लिए कम टेंशन की वजह नहीं है। इस मंच पर डॉक्टर भीम राव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर तो थे ही, भाजपा की पूर्व दलित सांसद सावित्रीबाई फुले को जिस अंदाज में प्रोजक्ट किया गया, वह भी उनके दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति है। 2018 में फुले ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा था, लेकिन फिर कांशीराम बहुजन समाज पार्टी बना ली। तस्वीरें बयां कर रही हैं कि यह दोनों पार्टियां चुनावों के लिए किसी तरह से साथ आ रही हैं। यही नहीं अखिलेश ने एक दिन पहले ही अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा है कि वह हर महीने की 30 तारीख को 'हाथरस की बेटी स्मृति दिवस' आयोजित करें। गौरतलब है कि हाथरस की पीड़िता गैर-जाटव वाल्मीकि समाज से थी। सपा की रणनीति के पीछे एक वजह ये भी है कि वह मानकर चल रही है कि 2019 में जिस तरह से दोनों दलों का गठबंधन हुआ था, उसमें बीएसपी का कोर वोटर (जाटव) का वोट ट्रांसफर नहीं होने का मिथक कुछ हद तक जरूर टूटा है। (ऊपर वाली तस्वीर सौजन्य-अखिलेश यादव का ट्विटर हैंडल)
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जाटव वोट के लिए भाजपा का मास्टर प्लान- तीसरी चुनौती
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने मायावती के कोर दलित वोट बैंक (जाटव) में अपनी पैठ बनाने के लिए खास तौर पर उत्तराखंड की पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को चुनाव अभियान में उतार दिया है। जब से वह यूपी आई हैं, बीजेपी उन्हें बेबी रानी मौर्य 'जाटव' के तौर पर सामने ला रही है। प्रदेश में जाटवों की जनसंख्या 10% है और बेबी रानी मौर्य का टारगेट है कि इसका एक बड़ा हिस्सा वह बीएसपी से बीजेपी के साथ ले आएंगी। यूपी के बाकी दलित समाज में बीजेपी ने पहले से ही सेंध लगा रखी है।

कांशीराम का परिवार- चौथी चुनौती
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की छोटी बहन और भांजा मायावती को हराने के मिशन पर निकल चुका है। उनका आरोप है कि मायावती ने अपने परिवार वालों के लिए पार्टी हड़प ली है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में जो भी मायावती को हराने में सक्षम होंगे, वह उनका समर्थन करेंगे। संविधान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए वह खासतौर पर लखनऊ पहुंचे हैं। कांशीराम फाउंडेशन की प्रमुख और कांशीराम की बहन स्वर्ण कौर ने कहा है, 'मायावती संविधान-विरोधी हैं और कांशीरामजी ने जो पार्टी बनाई थी, उसे खत्म कर दिया है। उन्होंने पार्टो को एक पारिवारिक कंपनी बना दी है और गरीबों के लिए कुछ भी नहीं कर सकती हैं। ' उनके भांजे लखबीर सिंह ने कहा है कि 'यूपी चुनाव में, हम बीएसपी को हराने के लिए किसी को भी समर्थन दे सकते हैं। हम पंजाब में भी बीएसपी के खिलाफ प्रचार करेंगे.....'

भीम आर्मी- पांचवीं चुनौती
वैसे अभी तक भीम आर्मी (आजाद समाज पार्टी (कांशीराम))का किसी चुनाव में कोई राजनीतिक वजूद नहीं दिखा है, लेकिन इसके चीफ चंद्रशेखर आजाद उसी कोर बैंक को टारगेट करते हैं, जिसके दम पर तीन दशकों से बीएसपी राजनीति करती आई है। हालांकि, चंद्रशेखर खुद मायावती को टारगेट करने से बचते हैं, लेकिन बीएसपी सुप्रीमो कभी उन्हें भाजपा का तो कभी कांग्रेस का एजेंट बता चुकी हैं। कुल मिलाकर उन्होंने राजनीति में चंद्रशेखर आजाद का उभरना कबूल नहीं किया है और कुछ समय पहले भीम आर्मी छोड़कर कुछ लोग बसपा में गए थे तो उन्होंने इसे घर वापसी बताया था। जाहिर है कि भीम आर्मी के मुखिया का कद अभी मायावती के सामने कुछ भी नहीं है, लेकिन जिस तरह से वह दलितों में युवा वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं और आक्रामक बयानबाजी करते हैं, उससे अगर नुकसान होना होगा तो वह सबसे ज्यादा बीएसपी के जनाधार को ही हो सकता है।












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