UP Election: किसके खाते में आएगा OBC वोट बैंक? जानिए, योगी-अखिलेश में किसका पलड़ा भारी
लखनऊ, 29 जनवरी। उत्तर प्रदेश में अब कुछ दिनों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होने वाले हैं। 7 चरणों में होने वाली वोटिंग के लिए 10 फरवरी से पहले चरण के मतदान शुरू होंगे। इसके ठीक एक महीने बाद यानी 10 मार्च को यूपी समेत अन्य पांच राज्यों के नतीजों का ऐलान किया जाएगा। उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव में कड़ी टक्कर की उम्मीद जताई जा रही है। यूपी हमेशा से ही ध्रुवीकरण और जातिगत राजनीति के लिए जाना जाता रहा है, यहां उम्मीदवारों की जीत और हार इसी पर निर्भर करती है।

दोनों ही ओबीसी वोट के लिए बेताब
हालांकि, साल 2022 का विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों से काफी अलग है। इस बाद प्रदेश के दो दो मुख्य दावेदारों में एक ही वर्ग का समर्थन पाने को लेकर होड़ मची हुई है। सीएम योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव दोनों ही पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के साथ अपना जुड़ाव दिखाने और समर्थन हासिल करने के लिए बेताब हैं। गौरतलब है कि यूपी में जाति का ध्रुवीकरण एक ऐसी ताकत बन गया है जो अपने आप को और मजबूत करती है, दुश्मनी पैदा करती है, उससे ताकत हासिल करती है।

मुलायम सिंह यादव की चतुराई का है ये असर
ओबीसी का एक बड़ा हिस्सा आमतौर पर समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ चला जाता है, जो पार्टी के चतुर नेता मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में बिछाई गई बिसात का परिणामस्वरूप है। उन्होंने 'सामाजिक न्याय' की शुरुआत की और 1990 के दशक की शुरुआत में मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के साथ ही इस वोट-बैंक पर काम किया। फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक और इंडोलॉजिस्ट क्रिस्टोफ जैफ्रेलॉट बताते हैं, मंडल ने ओबीसी को राजनीतिक सत्ता जीतने में सक्षम बनाया।

क्यों अहम है ओबीसी वोट बैंक?
उन्होंने 1990 के दशक में यह उपलब्धि हासिल करना शुरू कर दिया था। आपको बता दें कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश की आधी से अधिक आबादी (54.5 प्रतिशत) ओबीसी वर्ग से आती है। यही कारण है कि सभी राज्य पार्टी प्रमुख ओबीसी हैं। प्रमुख चार दलों के प्रदेश अध्यक्ष भी ओबीसी से हैं। बीजेपी के पास यूपी में सबसे ज्यादा 102 विधायक हैं, उसके बाद सपा के 12, बसपा और अपना दल के पांच-पांच विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास एक है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के अध्ययन से पता चला है कि 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों के बीच भाजपा ने ओबीसी वोटों में 12-14 प्रति प्रतिशत की वृद्धि हासिल की।

किसका पलड़ा भारी?
बीजेपी ने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान ओबीसी मतदाताओं पर अपना दबदबा बनाए रखा, जिसमें जाति वर्ग के करीब 45 प्रतिशत वोट मिले। जबकि पिछले चुनाव में भाजपा से हारने के बावजूद सपा को अभी भी 66 प्रतिशत यादव वोट मिले। लेकिन गैर यादव ओबीसी जाति वर्ग में बीजेपी को करीब 60 फीसदी वोट मिले। यह 'प्रतिबद्ध' उच्च जाति के मतदाता और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं का स्विच था जिसने 14 साल बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता का स्वाद चखाया।
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