यूपी चुनाव 2022: दलित वोटों का झुकाव अगर सपा की तरफ हुआ तो भाजपा को हो सकता है बड़ा नुकसान

लखनऊ, 22 दिसंबर। उत्तर प्रदेश में साल 2022 के विधानसभा चुनाव का मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच माना जा रहा है। सपा मुखिया अखिलेश यादव अपनी विजय रथयात्रा में जुट रही भीड़ से उत्साहित दिख रहे हैं। भाजपा की योगी सरकार ने भी चुनाव में सारा दम झोंक दिया है। भाजपा भी प्रदेशभर में जनविश्वास यात्रा निकाल रही है। इन दोनों पार्टियों के मुकाबले के बीच कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने महिलाओं को साधने के लिए 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान चला रही है। कांग्रेस इस चुनाव में अलग रणनीति से चल रही है जिसका असर अन्य पार्टियों पर भी पड़ता दिख रहा है। इस बार कांग्रेस भी चुनाव मैदान में लड़ती दिख रही है। सिर्फ बसपा अभी तक शांत नजर आ रही है। मायावती ट्वीट कर भाजपा, कांग्रेस और सपा पर निशाना साधती रही है लेकिन जनता के बीच फिलहाल नहीं जाती दिख रही हैं। बहरहाल इस बार दलित वोटबैंक को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि बसपा से छिटककर इस बार अगर यह सपा के पाले में गया तो भाजपा को इससे नुकसान हो सकता है।

सपा मुखिया अखिलेश इस बार जीत को लेकर कर रहे दावा

सपा मुखिया अखिलेश इस बार जीत को लेकर कर रहे दावा

उत्तर प्रदेश में चुनाव के बाद मिले जनादेश पर गौर करें तो पता चलता है कि पिछले तीन चुनावों से किसी एक पार्टी को जनता ने बहुमत दिया है। साल 2007 में बसपा, साल 2012 में सपा और साल 2017 में भाजपा को जनता ने बहुमत देकर जिताया। 1993 से लेकर 2002 तक के चुनावों में जनता ने किसी को बहुमत नहीं दिया था और गठबंधन की सरकार बनती रही थी। इन दस सालों की अवधि में यूपी में तीन चुनाव हुए और आठ बार मुख्यमंत्री बदले गए। इसी दौरान मायावती तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठी थी। लेकिन 2007 के चुनाव में बसपा की सरकार बनी। इसके बाद जनता ने सपा को मौका दिया और 2017 में भाजपा को प्रचंड बहुमत दिया। साल 2022 के चुनाव में सपा मुखिया अखिलेश यह दावा कर रहे हैं कि इस बार जनता भाजपा का सफाया करेगी। अखिलेश ने पूर्वांचल को साधने के लिए सुभासपा जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन किया है। पश्चिमी यूपी के लिए सपा का रालोद के साथ तालमेल हुआ है। चाचा शिवपाल के साथ आने से यादव वोटों का बिखराव अखिलेश रोक पाएंगे। मुस्लिमों का वोट सपा को मिलेगा, इसकी उम्मीद अखिलेश को है लेकिन दलितों का वोट किधर जाएगा, इसको लेकर अभी कोई भी पक्ष आश्वस्त नहीं दिख रहा है।

बसपा के वोटर क्या पार्टी को ही वोट करेंगे?

बसपा के वोटर क्या पार्टी को ही वोट करेंगे?

पिछले कई चुनावों में यूपी में भाजपा, सपा और बसपा के बीच मुकाबला होता आया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 312, सपा को 47 और बसपा को 19 सीटें मिली थी। इसमें यूपी की 86 रिजर्व सीटों पर 69 पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। बसपा को दो रिजर्व सीट पर विजय मिली थी। सपा को 10 सीट, अपना दल (एस) को 2 और सुभासपा को 3 आरक्षित सीट मिली थी। इससे स्पष्ट था कि 2017 के चुनाव में भाजपा को दलितों का वोट मिला था। वोट प्रतिशत के लिहाज से यूपी चुनाव 2017 में बसपा दूसरे नंबर की पार्टी थी। भाजपा को जहां 39.67 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं बसपा को 22.23 प्रतिशत वोट हासिल हुआ था। सपा को उस चुनाव में 21.82 प्रतिशत और कांग्रेस को 6.25 प्रतिशत वोट मिले थे। यूपी चुनाव 2022 में कांग्रेस, सपा और भाजपा तो बहुत एक्टिव हैं लेकिन मायावती फिलहाल एक्टिव नहीं दिख रही हैं। अब सबकी नजर बसपा के उस वोटबैंक पर है जो उसको 2017 चुनाव में हासिल हुए थे। अगर बसपा के वोटर सपा की तरफ गए तो इससे भाजपा को ही नुकसान होगा।

2017 में 60 प्रतिशत वोट भाजपा के खिलाफ था

2017 में 60 प्रतिशत वोट भाजपा के खिलाफ था

वोट प्रतिशत के लिहाज से करीब 40 प्रतिशत वोट ही भाजपा को हासिल हुए थे। बाकी 60 प्रतिशत वोट सपा, बसपा, कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों के बीच बिखर गए थे। साल 2022 चुनाव के लिए बसपा और मायावती क्या तैयारी कर रही हैं ये तो आगे आने वाले दिनों में पता चलेगा लेकिन फिलहाल इस पार्टी की हालत कमजोर दिख रही है। पिछली बार 7 सीट लाने वाली कांग्रेस बसपा से कहीं आगे चुनाव अभियानों में दिख रही है। बसपा अपने कई विधायकों को पार्टी से निकाल चुकी है। फिलहाल दलित वोटों को रिझाने के लिए सपा, कांग्रेस और भाजपा भी जोर लगा रही है। मायावती के अलावा दलित युवा नेता चंद्रशेखर अपनी पार्टी के साथ चुनाव मैदान में हैं लेकिन अभी तक उनका किसी के साथ गठबंधन नहीं हो पाया है। सपा गठबंधन के नेता भी दलितों को साधने में लगे हैं। यूपी में अनुसूचित जाति के लिए 84 सीट और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीट आरक्षित है। इन सीटों पर जिस पार्टी का वर्चस्व रहता है, अक्सर देखा गया है कि सरकार उसी की बनती है। भाजपा को इन आरक्षित सीटों पर बेहतर प्रदर्शन करना ही होगा। भाजपा के लिए सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि अगर मुस्लिम और दलित वोटों का झुकाव सपा की ओर हुआ तो उसे कई सीटों का नुकसान हो सकता है।

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