डीपी यादव के जरिये मुलायम ने की थी जब अजीत सिंह के खेमे में सेंधमारी, नहीं बनने दिया सीएम
लखनऊ, 08 फरवरी। क्या जयंत चौधरी उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बनेंगे ? उनकी पार्टी रालोद, सपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ रही है। अगर 2022 के चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन को जीत मिली तो क्या अखिलेश, यादव जयंत चौधरी को डिप्टी सीएम बनाएंगे ? पिछले एक हफ्ते में यह सवाल कई बार जयंत चौधरी पूछा गया है। इस मामले में जयंत चौघरी का कहना है, "न मुझे कोई प्रस्ताव मिला है, न मैंने सपा के सामने कोई शर्त रखी है। हमारा एकमात्र लक्ष्य भाजपा को हराना है।"

अमित शाह कई बार जयंत चौधरी पर तंज कस चुके हैं कि अखिलेश यादव उन्हें कभी डिप्टी सीएम नहीं बनाएंगे। अगर मौका मिला तो वे आजम खां को अपने बगल में बैठाएंगे। इस आरोप प्रत्यारोप के बीच राजनीतिक गलियारे में कई कयास लगने लगे हैं। 1989 में मुलायम सिंह यादव ने ऐसा राजनीतिक पासा फेंका था कि अजीत सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी के नजदीक पहुंच कर भी मौका चूक गये थे। अब ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या इसी तर्ज पर 2022 में अखिलेश यादव भी जयंत चौधरी का रास्ता रोक कर इतिहास को दोहराएंगे ?

मुलायम सिंह और अजीत सिंह में जंग
जेपी के जन्मदिन पर 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल का गठन हुआ था। लोकदल अ, लोकदल ब, जगजीवन कांग्रेस और जनमोर्चा के विलय के बाद जनता दल का निर्माण हुआ था। 1989 के लोकसभा चुनाव के बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में जनमोर्चा की सरकार बनी थी। 143 सीटों के साथ जनता दल जनमोर्चा का सबसे बड़ा घटक दल था। 1989 में ही उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हुआ था। जनता दल को सबसे अधिक 208 सीटें मिली थीं। उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 425 थी। बहुमत के लिए 213 सीटें चाहिए थीं। यानी जनता दल को सरकार बनाने के लिए 5 और विधायकों का समर्थन चाहिए था। जनता दल में मुख्यमंत्री बनने के लिए दो दावेदार थे। मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजीत सिंह। दिग्गज किसान नेता चौधरी चरण सिंह का दो साल पहले ही निधन हुआ था। अजीत सिंह अपने पिता चौधरी चरण सिंह की विरासत संभाल रहे थे। इसकी वजह से जाट समुदाय और किसानों में अजीत सिंह के प्रति सहानुभूति थी। मुलायम सिंह और अजीत सिंह, दोनों सीएम बनने के लिए जोड़तोड़ करने लगे।

जब मुलायम सिंह ने अजीत सिंह को नहीं बनने दिया था CM
उस समय वीपी सिंह भारत के प्रधानमंत्री बन चुके थे। अजीत सिंह वीपी सिंह के करीबी थे। यूपी में जनता दल की जीत के साथ वीपी सिंह ने घोषणा कर दी कि अजीत सिंह मुख्यमंत्री बनेंगे। मुलायम सिंह यादव को उपमुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया। मुलायम सिंह ने इसे ठुकरा दिया। अब सवाल पैदा हो गया कि विधायक दल का नेता कैसे चुना जाए ? अजीत सिंह और मुलायम सिंह यादव आमने सामने थे। तब तय हुआ कि गुप्त मतदान के जरिये विधायक दल के नेता का चुनाव कराया जाय। मुलायम सिंह ने अजीत के किले में सेंध लगाने की तैयारी शुरू कर दी। यूपी के बाहुबली नेता डीपी यादव 1989 में बुलंदशहर से जीते थे। कहा जाता है कि मुलायम सिंह ने डीपी यादव को अजीत सिंह गुट के विधायकों को तोड़ने की जिम्मेदारी दी थी। जिस दिन विधायक दल के नेता का चुनाव होना था उस दिन डीपी यादव ने अजीत सिंह गुट के 11 विधायकों को मुलायम सिंह के पाले में कर दिया था। चुनाव हुआ। अजीत सिंह पांच वोट से हार गये। मुलायम सिंह नेता चुने गये और मुख्यमंत्री बने। अगर डीपी यादव ने 11 विधायकों को तोड़ा नहीं होता तो अजीत सिंह ही 1989 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते।

अखिलेश क्यों मजबूर हुए रालोद से दोस्ती के लिए ?
2017 के चुनाव में अजीत सिंह जिंदा थे। उन्होंने अकेले चुनाल लड़ने का फैसला किया था। रालोद ने 277 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे जिसमें से सिर्फ एक पर जीत मिली थी। सपा शासन में थी और उसने कांग्रेस से गठबंधन किया था। इस चुनाव में सपा की भी करारी हार हुई। कांग्रेस की तो दुर्गति ही हो गयी। इस हार ने अजीत सिंह की साख को मिट्टी में मिला दिया था। चौधरी अजीत सिंह के निधन के बाद जब रालोद की कमान जयंत चौधरी के हाथों में आयी तो उन्होंने पार्टी को उबारने के लिए सपा की बैसाखी थाम ली। 2017 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 23 वैसी सीटें थी जहां अगर सपा-रालोद का सम्मिलित वोट भाजपा से अधिक था। इस गणितीय सच्चाई ने अखिलेश को भी रालोद से दोस्ती के लिए मजबूर कर दिया। 2022 के विधानसभा चुनाव में रालोद- सपा गठबंधन मजबूत स्थिति में दिख रहा था लेकिन बसपा ने खेल खराब कर दिया। बसपा ने अधिकतर सीटों पर जाट और मुस्लिम उम्मीदवार उतार कर समीकरण को प्रभावित कर दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 58 सीटों पर पहले चरण के तहत 10 फरवरी को वोटिंग है। इसलिए जयंत चौधरी का राजनीतिक भविष्य पहले चरण के चुनाव पर निर्भर है।
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