UP BJP चीफ बना कुर्मी चेहरा, यूपी की राजनीति में कुर्मी जाति कितनी ताकतवर? चौथी बार इस कास्ट पर खेला गया दांव
UP BJP President Pankaj Chaudhary: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर जातीय समीकरण चर्चा के केंद्र में है। 14 दिसंबर को केंद्रीय मंत्री और महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी को भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उत्तर प्रदेश का नया प्रदेश अध्यक्ष घोषित कर दिया। पंकज चौधरी राजनीतिक सफर लंबा और जमीन से जुड़ा रहा है।
इस फैसले के साथ ही बीजेपी ने चौथी बार कुर्मी समाज से आने वाले नेता को प्रदेश संगठन की कमान सौंपी है। इससे पहले विनय कटियार, ओम प्रकाश सिंह और स्वतंत्र देव सिंह भी कुर्मी समाज से आते थे और प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। सवाल साफ है कि आखिर कुर्मी जाति में ऐसा क्या खास है, जिस पर बीजेपी बार-बार भरोसा जता रही है।

उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति का सियासी वर्चस्व कितना?
कुर्मी जाति उत्तर प्रदेश में यादवों के बाद दूसरी सबसे प्रभावशाली ओबीसी जाति मानी जाती है। गैर-आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश की आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीब 7 फीसदी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी दलों से जीतने वाले सांसदों में 11 कुर्मी समुदाय से थे। पूर्वांचल से लेकर अवध और बुंदेलखंड तक इस समाज की मौजूदगी निर्णायक मानी जाती है।
विधानसभा की बात करें तो कुर्मी समाज के 40 से ज्यादा विधायक सदन में हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में 52 ब्राह्मण, 49 ठाकुर विधायक चुने गए, जबकि तीसरे नंबर पर 41 कुर्मी विधायक रहे। मुस्लिम विधायकों की संख्या 34 रही। कुर्मी विधायकों में बीजेपी गठबंधन से 27, समाजवादी पार्टी गठबंधन से 13 और कांग्रेस से एक विधायक जीतकर आया।
कुर्मी समाज को राजनीतिक रूप से बेहद रणनीतिक माना जाता है। समय-समय पर इस समुदाय ने अलग-अलग दलों को समर्थन दिया है। पूर्वांचल में जहां पंकज चौधरी बीजेपी से सांसद हैं, वहीं बस्ती से समाजवादी पार्टी के राम प्रसाद चौधरी भी इसी समाज से आते हैं। यही वजह है कि हर बड़ा दल कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश करता रहा है।
बीजेपी की 2027 की तैयारी
बीजेपी की नजर अब पूरी तरह 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को यूपी में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी और माना जा रहा है कि कुर्मी समाज का एक हिस्सा पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक फॉर्मूले के तहत समाजवादी पार्टी के साथ चला गया। ऐसे में पंकज चौधरी को आगे कर बीजेपी ओबीसी आधार को फिर से मजबूत करना चाहती है।
पार्टी पहले ही केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री बना चुकी है। लोध समुदाय से चौधरी धर्मपाल और संदीप सिंह मंत्री हैं। ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय निषाद की पार्टी से गठबंधन भी इसी सामाजिक संतुलन का हिस्सा है। दारा सिंह चौहान को मंत्री बनाए रखना भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जाता है।
भाजपा की चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि इस फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले के जवाब के तौर पर है, लेकिन इससे कितना फायदा होगा, यह साफ नहीं है। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों का पूर्वांचल से होना केवल ऑप्टिक्स का खेल है।
यह भी चर्चा है कि पंकज चौधरी कुर्मी समाज के सर्वमान्य नेता नहीं माने जाते और उनका प्रभाव मुख्य रूप से गोरखपुर और आसपास के इलाकों तक सीमित है। माना जाता है कि वे योगी आदित्यनाथ से राजनीतिक रूप से वरिष्ठ हैं, लेकिन मुख्यमंत्री के कद के सामने उनकी भूमिका संतुलन साधने की होगी।
पंकज चौधरी क्यों बने भाजप की पहली पसंद?
पंकज चौधरी ने 1989 में गोरखपुर नगर निगम से पार्षद बनकर राजनीति की शुरुआत की और उसी साल डिप्टी मेयर भी बने। 1991 में बीजेपी ने उन्हें महाराजगंज लोकसभा सीट से मौका दिया और महज 27 साल की उम्र में वे संसद पहुंच गए। इसके बाद 1991, 1996, 1998, 2004, 2014, 2019 और 2024 में वे कुल सात बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। बीच में 1999 और 2009 में उन्हें हार का सामना जरूर करना पड़ा, लेकिन हर बार उन्होंने दमदार वापसी की।
संगठन और सरकार दोनों का अनुभव रखने वाले पंकज चौधरी 2021 से नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं और फिलहाल केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पार्टी और संघ के साथ उनके रिश्ते मजबूत माने जाते हैं, यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने उन पर बड़ा दांव लगाया है।
बड़ा दांव, बड़ा सवाल
कुल मिलाकर बीजेपी ने एक बार फिर कुर्मी कार्ड खेला है। चौथी बार प्रदेश अध्यक्ष इसी समाज से बनाकर पार्टी ने साफ संदेश दिया है कि ओबीसी राजनीति अभी भी उसके एजेंडे के केंद्र में है। अब देखना यह होगा कि पंकज चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी कुर्मी वोट बैंक को कितना मजबूती से जोड़ पाती है और क्या यह दांव 2027 में सत्ता की राह आसान कर पाएगा या नहीं।












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