क्या अखिलेश यादव को है चुनाव बाद जयंत चौधरी के गठबंधन से हट जाने का डर? इस बात से तो लगता है
लखनऊ, 25 नवंबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी कोई कसर बाकी रखती नहीं दिख रही है। अखिलेश यादव प्रदेश में छोटे-छोटे दलों को साथ लाकर एक मोर्चा बना रहे हैं। अखिलेश यादव की हाल के दिनों में जयंत चौधरी, ओम प्रकाश राजभर, कृष्णा पटेल और संजय सिंह से मुलाकातें हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा निगाहें पश्चिम उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी की पार्टी रालोद से उनके गठबंधन पर है। जिसमें फिलहाल सीटों के बंटवारें पर बात हो रही है। इसमें कुछ ऐसी बातें सामने आई हैं, जिससे लगता है कि अखिलेश चुनावके बाद तक की स्थितियों को ध्यान में रखकर चल रहे हैं।

रालोद के सिंबल पर अपने कैंडिडट लड़ाना चाहते हैं अखिलेश!
सपा और रालोद को लेकर कहा जा रहा है कि सीटों के बंटवारे को लेकर तकरीबन सहमति बन गई है। जानकारी के मुताबिक, जयंत चौधरी 50 सीटों की मांग रहे थे लेकिन आखिर में वो 36 सीटों पर मान गए। सूत्रों के मुताबिक, इसमें सपा की ओर से एक खास शर्त रखी गई है कि इनमें से तीस सीटों पर रालोद लड़ेगी। वहीं छह ऐसी सीटों पर रालोद के सिंबल पर सपा के उम्मीदवार उतरेंगे। माना जा रहा है कि इसी हफ्ते दोनों दल साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गठबंधन का ऐलान कर सकते हैं।

चुनाव बाद की स्थितियों को ध्यान में रख रहे अखिलेश, या अविश्वास?
राष्ट्रीय लोकदल के सिंबल पर छह कैंडिडेट लड़ाने के पीछे अखिलेश यादव के फैसले को लेकर कई तर्क दिए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अखिलेश का ये फैसला चुनाव बाद की स्थिति को ध्यान में रखकर लिया गया है। माना जा रहा है कि आने वाले चुनाव में शायद किसी दल को बहुमत ना मिले। ऐसे में भाजपा या सपा बहुमत से कुछ सीट कम रहती है तो उनको छोटे दलों के समर्थन की जरूरत होगी। माना जा रहा है कि जयंत चौधरी चुनाव बाद सरकार बनाने के करीब जो पार्टी होगी, उसके साथ जा सकते हैं। ऐसे में अखिलेश अभी से ये चाहते हैं कि उनके साथी चुनाव बाद भी उनके साथ ही रहें।

'तुम्हारा पार्टी हमारा कैंडिडेट' से दोस्ती का मैसेज जाएगा?
बताया गया है कि अखिलेश यादव पश्चिम में रालोद के सिंबल पर अपने कुछ कैंडिडेट लड़ाना चाहते हैं तो पूर्व में कृष्णा पटेल और राजभर के दल के साथ भी वो ये फॉर्मूला अपनाना चाहते हैं। इसे राजनीतिक विश्लेषक जहां चुनाव बाद साथियों के दूसरे दलों के साथ चले जाने के डर से जोड़ रहे हैं, वहीं एक और तर्क भी दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को करीब लाने और वोट ट्रांसफर में आसानी होगी। इससे आम जनता में भी दोनों दलों के बीच 'पक्की दोस्ती' का मैसेज जाएगा।












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