यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जानें क्यों बसपा सुप्रीमो को फिर आई ब्राह्मणों की याद
लखनऊ, 19 जुलाई। उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव से पहले यूपी में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ चुकी हैं। समाजवादी पार्टी ने जहां अभी से अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी कर दिया है, वहीं बहुजन समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मायावती को लगभग 14 साल बाद अचानक से ब्राह्मणों की याद गई है। 23 जुलाई को बासपा ने राम नगरी अयोध्या में ब्राह्मण सम्मेलन करने जा रही हैं। आखिर क्या कारण हैं जो मायावती के लिए अचाकन ब्राह्ममण महत्पवूर्ण हो गए हैं। अब क्या फिर से यूपी में क्या मायावती चुनाव में ब्राह्ममण वोटरों को भाजपा से तोड़ पाएंगी? जानिए वनइंडिया हिंदी से एक्सक्लूसिव बातचीत में उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने क्या कहा?

राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने कहा यूपी जहां हमेशा से जाति और धर्म के नाम पर राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीतिक करते आए है, वहीं नजारा इस बार 2022 के चुनाव से पहले नजर आने लगा है। 2007 में मायावती को सीएम की कुर्सी पर बैठाने में यूपी के ब्राह्ममण वोटरों का बहुत बड़ा योगदान था। उस समय मायावती ने ब्राह्मण-दलित कार्ड खेल कर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुईं थी ये यूपी में ये वो समय था जब बड़ी संख्या में उन्होंने मायावती को वोट दिया था और प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक पार्क में बड़ी संख्या में ब्राहमणों ने बसपा ज्वाइन किया था।

क्या मायावती भाजपा के ब्राह्मण वोटरों को तोड़ पाएंगी ?
वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने कहा यूपी में चूंकि 13 प्रतिशत ब्राहमण वोटर हैं लेकिन ब्राहमण वोटरों में ताकत हैं जो चुनावी फिजा को बदलने की ताकत रखते हैं। ये बात एक बार सपा नेता मुलायम सिंह ने कही थी उन्होंने कहा था ब्राहमण चुनाव में माहौल बनाते हैं। वहीं अगर 2022 में 14 साल बाद एक बार फिर मायावती का ध्यान फिर से ब्राह्ममणों पर इसलिए आया है क्योंकि सपा आने वाले चुनाव में भाजपा की मुख्य विरोधी पार्टी की भूमिका में होगी, ऐसे में ब्राह्मण वोटरों को रिझाकर सपा और भाजपा दोनों का नुकसान कर सकती है।
भाजपा से क्या नाराज हैं यूपी के ब्राहमण?
के विक्रम राव ने कहा वर्तमान सरकार में ब्राहमण नाराज इसलिए है क्योंकि उन्हें योगी सरकार में दरकिनार कर क्षत्रियों को अहमियत दी गई। योगी कैबिनेट में महज 8 ब्राहमणों को मंत्रीमंडल में शामिल किया। जबकि 2017 में 56 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार जीते थे इनमें 44 भाजपा के थे। योगी मंत्रीमंडल में जिन 8 मंत्रियों को शामिल किया गया दो को छोड़कर किसी ब्राह्मण को अहम विभाग नहीं दिए गए वहीं क्षत्रिय मंत्रियों को मलाईदार विभाग दिए गए वहीं सरकारी नियुक्तियों में भी भाजपा सरकार पक्षपात का आरोप लगा। केंद्र में कोई तबज्जों हीं मिली है। इसके साथ ही ब्राह्मणों पर सबसे अधिक एससी, एसटी केस योगी सरकार में दर्ज हुए। ब्राहृामण एनकांटर भी खूब हुए। ये वो कारण है जिसने ब्राहम्णों को नाराज किया।
2007 के जैसे 2022 में ब्राह्मण - दलित सोशल इंजीनियरिंग क्या रंग लाएगी?
2007 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जब प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस पार्टी पीछे थी और मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी समाजवादी पार्टी थी, तब मायावती ने ब्राह्मण-दलित के साथ मुसलमानों को टॉरगेट करते हुए चुनाव लड़ा था और प्रदेश में 83 टिकट ब्राह्मणों को दिए थे जिसमें वो सफल हुई थीं। सपा से नाराजगी और ब्राहमण- दलित सोशल इंजीनियरिंग ने ब्राहमण वोटरों को रिझाया और मायावती ने जीत हासिल की लेकिन बाद में मायावती ने दो बार ब्राह्मणों को धोखा दिया। ब्राहमण नेता बृजेश पाठक हो या मुसलमान विधायक नसिमुद्दीन सिद्धिकी वो बसपा से अलग हो गए, महज सतीश चंद्र मिश्रा ही ब्राह्मण नेता शेष बचे हैं, लेकिन मायावती 2022 चुनाव में ब्राह्ममण नेताओं को टिकट देकर वो एक और दांव खेलने की तैयारी कर रही हैं।
मायावती की बीएसपी से किस पार्टी को अधिक है खतरा?
के विक्रम राव ने कहा अभी तो चुनाव को लगभग छह महीने बाकी हैं, राजनीति में ये अवधि बहुत होती है। ऐसे में आगे क्या परिस्थिति बदलेगी ये अभी से अनुमान लगाना बेकार होगा लेकिन मायावती इस ब्राह्मण सम्मेलन में जुटने वाली भीड़ से ये जरूर अंदाजा लगा सकेंगी कि उनका ये चुनावी पैतरा कितना काम आने वाला है, क्योंकि 2007 और वर्तमान समय में बहुत परिवर्तन आ चुका है। ब्राह्मणों और मुसलमानों को साधने में अगर बसपा कामयाब हो जाती है तो सपा और भाजपा दोनों का वोट कटेंगे। वहीं यूपी में आवैसी भी मुसलमानों का वोट काट कर सपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।












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