बिहार और यूपी चुनाव में वो समानताएं, जो कर सकती है बीजेपी को परेशान
वर्तमान स्थिति में कई ऐसी समानताएं बिहार और यूपी चुनाव में नजर आ रही हैं जो बीजेपी को परेशान कर सकती है। देखिए बड़े मुद्दे...
नई दिल्ली। यूपी की सत्ता हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी हरसंभव कोशिश में जुटी हुई है। विरोधी दलों को परास्त करने के लिए पार्टी लगातार अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है। बीजेपी की योजना थी कि वो सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के मुद्दे को यूपी की चुनाव में लेकर जाएगी लेकिन पार्टी के रुख में बदलाव आया है। अब पार्टी हिंदू वोटों की बात कर रही है, साथ ही उसकी नजर ध्रुवीकरण की रणनीति पर टिकी हुई है।
पार्टी की स्थिति बिहार चुनाव से काफी मिलती-जुलती नजर आ रही है। वहां भी बीजेपी के सामने आरजेडी-जेडीयू-कांग्रेस का महागठबंधन था अब यूपी चुनाव में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन सामने आ गया है। वर्तमान स्थिति में कई ऐसी समानताएं बिहार और यूपी चुनाव में नजर आ रही हैं जो बीजेपी को परेशान कर सकती है...

नेतृत्व की परेशानी
बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार के पीछे जो वजहें थी उसमें एक वजह पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं था जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाता। उत्तर प्रदेश में भी पार्टी के सामने यही संकट है। यही वजह है कि पार्टी ने यूपी चुनाव में किसी भी चेहरे को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे नहीं बढ़ाया है। एक बार फिर से बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। बिहार में भी नीतीश के मुकाबले में पार्टी ने मोदी को ही सामने किया था। यूपी के कुछ पोस्टर ऐसे लगे हैं जिनमें लिखा है... 'माया, मुलायम बार-बार, अबकी बार मोदी सरकार'।

प्रदेश इकाई है नाखुश
उम्मीदवारों के चयन को लेकर उत्तर प्रदेश में बीजेपी कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखी जा रही है। अलग-अलग इलाकों में ये कार्यकर्ता पार्टी नेतृत्व के फैसलों का विरोध कर रहे हैं। 2015 के बिहार चुनाव किसी भी पार्टी कार्यकर्ता ने आलाकमान के फैसलों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई थी। हालांकि उस समय भी कई नेताओं के बयान में नाराजगी देखी जा रही थी। यूपी चुनाव में भी कई नेताओं का आरोप है कि प्रदेश के नेताओं से बिना बात किए उम्मीदवारों को टिकट दिया गया।

मुख्यमंत्री का मतदाताओं पर प्रभाव
अगर आप यूपी के औसत वोटरों की बात करें तो उनका पहली प्रतिक्रिया यही होगी कि यूपी में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए लहर है। हालांकि जल्द ही वो ये भी कहते नजर आते हैं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अच्छा काम किया है। बिल्कुल ऐसा ही हाल बिहार चुनाव में भी दिखा था। उस समय भी नीतीश कुमार ने अच्छा काम किया था लेकिन उनके लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलने के बाद सवाल उठाए जा रहे थे।

गठबंधन बढ़ाएगा परेशानी
बिहार में महागठबंधन की तर्ज पर यूपी में भले ही महागठबंधन नहीं हो पाया हो लेकिन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने बीजेपी आलाकमान को चौंका जरुर दिया है। बिहार में नीतीश और लालू के साथ आने को लेकर बीजेपी नेता आश्वस्त नजर आ रहे थे कि वो साथ नहीं आएंगे लेकिन आखिरकार वो एक साथ आ गए। इस बार भी कांग्रेस-सपा एक साथ सामने आ गए हैं। इसका बीजेपी की रणनीति पर जरुर होगा।

रणनीतिकारों की रणनीति
रणनीतिकारों का भी चुनावी जीत-हार में अहम योगदान होता है। बिहार चुनाव में नीतीश कुमार के गठबंधन में प्रशांत किशोर की टीम बड़ा योगदान था। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-सपा के गठबंधन को लेकर कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर और सपा के रणनीतिकार स्टीव जार्डिंग का रोल बेहद अहम है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को कुछ ओपिनियन पोल में बीजेपी की बढ़त नजर आ रही है। इसी तरह 2015 के बिहार चुनावों में भी बीजेपी को ओपिनियन पोल में जीता हुआ दिखाया जा रहा था। हालांकि चुनाव के नतीजे बिल्कुल अलग आए थे।

नेताओं की बयानबाजी और उसका असर
बिहार चुनाव के दौरान नवंबर 2015 में बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अभिनेता शाहरुख खान को लेकर विवादित बयान दिया था। उन्होंने शाहरुख को राष्ट्र विरोधी करार देते हुए कहा था कि उनकी आत्मा पाकिस्तान में होने का आरोप लगाया था। इसी तरह से यूपी चुनाव की शुरुआत में कैलाश विजयवर्गीय ने शाहरुख को लेकर विवादित बयान दिया। उन्होंने बॉलीवुड अभिनेता का नाम लिए बिना उनकी फिल्म 'रईस' को लेकर बिना नाम लिए 'राष्ट्र विरोधी' करार दिया। आरक्षण को लेकर बिहार चुनाव में बयानबाजी हुई थी इस बार भी आरक्षण के मुद्दे पर बयानबाजी हुई जब आरएसएस नेता मनमोहन वैद्य ने इस मुद्दे पर टिप्पणी की। जिसके बाद विपक्ष ने इसे मुद्दा बना लिया।












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