यूपी चुनाव: मुस्लिम और दलित वर्ग को साधने से ही मिलती है प्रदेश की सत्ता, आंकड़े हैं गवाह
यूपी में करीब 120 से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटरों का दबदबा है, ऐसे ही प्रदेश की 85 विधानसभा सीटें आरक्षित वर्ग की हैं।
लखनऊ। यूपी में सियासी जंग का आगाज हो चुका है। पहले चरण के मतदान के साथ ही सियासी दल अपने नफा-नुकसान के आंकलन का गुणा-गणित बिठाने में जुट गए हैं। यूपी विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जिस तरह से बंपर वोटिंग हुई है उससे एक बात तो साफ हो गई कि इस बार वोटर पूरे जोश में हैं, उन्होंने भी कुछ तय कर लिया है। फिलहाल यूपी चुनाव के इतिहास पर गौर करें तो 1990 के बाद से अब तक में यहां तीन बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनी है।
यूपी की जीत में सोशल इंजीनियरिंग का मुख्य रोल
पहली बार 1991 में बीजेपी ने यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, इसके बाद 2007 में बहुजन समाज पार्टी और 2012 में समाजवादी पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर यूपी की सत्ता पर काबिज हुई। इन तीनों ही चुनाव में जीत का गणित साफ दर्शाता है कि इसमें मुस्लिम वोटरों और दलित वर्ग के वोटबैंक का खास योगदान रहा। जिस भी दल ने सोशल इंजीनियरिंग का दांव साधा उसे कामयाबी मिली।

2007 में मायावती ने बनाई थी पूर्ण बहुमत की सरकार
यूपी में करीब 120 से ज्यादा विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटरों का दबदबा है, ऐसे ही प्रदेश की 85 विधानसभा सीटें आरक्षित वर्ग की हैं। अगर कोई भी सियासी दल इन दोनों वर्गों को साध ले तो यूपी की सत्ता में उनका आना लगभग तय है। 2007 में जब मायावती ने यूपी में सत्ता संभाली थी तो उस समय सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला ही काम कर गया था। ऐसे ही 2012 में समाजवादी पार्टी को भी कामयाबी मिली। इससे पहले 1991 में बीजेपी ने भी इन सीटों पर बड़ी जीत हासिल की थी।

मायावती ने इस बार 99 उम्मीदवारों को दिया है टिकट
बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस बार भी इस वर्ग को साधने की पूरी कोशिश की है। इसीलिए पार्टी ने रिकॉर्ड 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं दलित वोट पर उनका दावा हमेशा से रहा है। ऐसे में माना यही जा रहा है कि इस बार बीएसपी को फिर से सोशल इंजीनियरिंग के कामयाबी की उम्मीद है।

मुस्लिमों मतों के बंटने से होता है बीजेपी को फायदा
बीजेपी की बात करें तो उसे मुस्लिम बहुल सीटों पर सीधा फायदा मुस्लिम वोटरों के बंटवारे से मिलती है। यूपी में मुस्लिम वोटर बीएसपी और सपा के मजबूत उम्मीदवार को देखते हुए अपना वोट देता है। ऐसी सूरत में उनका वोट बंट जाता है और बीजेपी इसका फायदा उठा ले जाती है। एक बार फिर से उसे इसी गणित के कामयाब होने की उम्मीद है। बीजेपी ने दलित वोटरों को अपने साथ जोड़ने के लिए भी खास कवायद की है।

सपा-कांग्रेस के साथ आने का कितना होगा फायदा?
यूपी में सत्ता संभाल रही समाजवादी पार्टी ने इस बार सियासी गणित को साधने के लिए कांग्रेस से गठबंधन किया है। पार्टी को उम्मीद है कि इस गठबंधन से ब्राह्मण और वैश्य वोट बैंक उनके समर्थन में आ सकता है। मुस्लिम वोटर से समाजवादी पार्टी के समर्थन में नजर आते रहे हैं। ऐसे में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने पिछड़े और दलित वर्ग को भी अपने साथ लाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
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