मुलायम के जन्मदिन पर भी नहीं मिले चाचा भतीजे के दिल, जानिए सपा पर कितना पड़ेगा इसका असर
लखनऊ, 23 नवंबर 2021 : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव जनता से संवाद स्थापित करने की अपेक्षा अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव को झटके पर झटका दे रहें हैं। अखिलेश यादव ने लखनऊ में सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के मनाए गए जन्मदिन समारोह और प्रो रामगोपाल यादव के अमृत महोत्सव पर आयोजित सम्मेलन में अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाया। जबकि बीते दो माह से सपा नेताओं की तरफ से यह संदेश दिया जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर अखिलेश अपने चाचा शिवपाल के साथ चुनावी तालमेल होने का ऐलान करेंगे, लेकिन अखिलेश यादव ने इस मामले में चुप्पी साधते हुए अपने चाचा शिवपाल सिंह को फिर झटका दे दिया।

सपा के नेताओं की माने तो सपा समर्थक भी यही चाहते हैं कि अखिलेश और शिवपाल मिलकर यूपी में चुनाव लड़े, ताकि पार्टी का वोटबैंक बटे नहीं। इस लड़ाई के चलते सपा को वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में नुकसान उठाना पड़ा था। सपा नेताओं का यह भी मानना है कि अखिलेश तथा शिवपाल के बीच छिड़ी जंग के चलते सपा के पारंपरिक कहे जाने वाले इस वोट बैंक में फैली सियासी अनिश्चितता से बसपा सहित अन्य विपक्षी दल खासे उत्साहित हैं। यह सभी दल सपा के इन वोटरों की सेंधमारी में जुटे हैं।
शिवपाल ने अखिलेश को दिया एक सप्ताह का समय
वहीं दूसरी ओर ओवैसी भी सपा से खफा मुस्लिम नेताओं को अपने साथ जोड़ने की जुगत में लग गए हैं। जिसका अहसास होने पर अखिलेश ने शिवपाल सिंह यादव से चुनावी तालमेल कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, पर अब वह इस मामले में अपने कदम पीछे खींच रहे हैं। ताकि शिवपाल सिंह यादव सपा से चार पांच सीटें मिलने पर भी सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सहमत हो जाए। शिवपाल सिंह यादव को अखिलेश यादव का यह प्रस्ताव मंजूर नहीं है। जिसके चलते ही उन्होंने गत सोमवार को यह ऐलान कर दिया कि अखिलेश यादव एक हफ्ते में उनके साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला कर लें।
लंबे समय से यूपी की राजनीति पर लिखने वाले राजनीतिक विश्लेषक वीएन भट्ट कहते हैं कि,
''अखिलेश यादव से चुनावी तालमेल ना होने पर शिवपाल सिंह यादव भले ही संगठन के दम पर अखिलेश यादव का कुछ ज्यादा नुकसान न कर पाएं, लेकिन खेल खराब करने की क्षमता उनमें है। ठीक उसी तरह से शिवपाल सिंह सपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं जैसे कल्याण सिंह ने बीजेपी से अलग होने के बाद बीजेपी का खेल खराब किया था। बीते विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सपा को हुआ नुकसान इसका सबूत है। बीते विधानसभा चुनाव में शिवपाल सिंह यादव से हुए संघर्ष के चलते सपा 47 सीटों पर ही सिमट गई थी। जबकि लोकसभा चुनावों में बसपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने के बाद भी सपा को पांच सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी।''
शिवपाल सिंह ने हालांकि हर मंच से यह कहा कि वह सपा से गठबंधन चाहते हैं, लेकिन अखिलेश यादव की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। जानकारों की मानें तो इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, एटा, बदायूं, कन्नौज, फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, आजमगढ़, गाजीपुर जौनपुर, बलिया वगैरह में शिवपाल सिंह यादव का प्रभाव है जिसकी वजह से अखिलेश को नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि अखिलेश ने हमेशा यह कहा है कि वह चाचा और उनकी पार्टी को पूरा सम्मान देंगे।
हालांकि बीजेपी के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने इस मामले को लेकर अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि,
''जिसने राजनीति में खुद को पार्टी का मुखिया बनने के लिए राजनीति का ककहरा सीखने वाले अपने पिता की बेइज्जती की हो, चाचा को पैदल किया हो उससे इससे अधिक की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। खुद के हित में घर वालो की पीठ में भी खंजर भोंककर आप इसे साबित भी कर चुके हैं। बीजेपी नेताओं के ऐसे सियासी हमले के बाद भी अखिलेश यादव के व्यवहार में बदलाव नहीं दिखा है। वह जनता के बीच जाकर जनता के सरोकार की बातें करने के बजाए अपने उस चाचा शिवपाल सिंह को झटका देने में जुटे हैं जिसने उनकी पढ़ाई का ध्यान रखा था।''












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