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आखिर क्यों यूपी के मुख्यमंत्री पद से दूर रहना चाहते हैं राजनाथ सिंह

यूपी की राजनीति में एक बार फिर से क्यों राजनाथ सिंह वापस नहीं लौटना चाहते हैं, क्यों मुख्यमंत्री के पद से बच रहे हैं राजनाथ

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत के बाद पार्टी मुख्यमंत्री के चेहरे की तलाश कर रही है और इस तलाश में गृहमंत्री राजनाथ सिंह का नाम सबसे उपर है, पार्टी सूत्रों की मानें तो राजनाथ सिंह का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए लगभग फाइनल हो चुका है, लिहाजा जल्द ही उनके नाम का ऐलान हो सकता है, लेकिन इन सबसे इतर राजनाथ सिंह जिन्होंने यूपी चुनाव से पहले इस पद के दावेदार के तौर पर खुद के नाम को खारिज किया था। हालांकि यह समझने वाली बात है कि आखिर क्यों राजनाथ सिंह यूपी के सीएम के पद से दूर रहना चाहते हैं।

यूपी में 15 साल बाद फिर से वापसी

यूपी में 15 साल बाद फिर से वापसी

राजनाथ सिंह यूपी के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं लिहाजा उनके अनुभव को देखते हुए पार्टी उन्हें एक बार फिर से यह जिम्मेदारी देने की तैयारी कर रही है। राजनाथ सिंह 2003 से 2004 के बीच यूपी के सीएम रहे उस वक्त केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, वहीं 2014 में जब भाजपा को लोकसभा चुनाव में जीत हासिल हुई तो राजनाथ सिंह भाजपा के अध्यक्ष थे और उन्हें देश का गृहमंत्री बनाया गया, ऐसे एक बार फिर से प्रदेश की राजनीति में जाना राजनाथ सिंह के लिए 15 साले पुरानी राजनीति में वापस जाने जैसा है।

देश के गृहमंत्री का पद कहीं बड़ा

देश के गृहमंत्री का पद कहीं बड़ा

देश के गृहमंत्री का पद प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से कहीं उपर होता है, देश के गृहमंत्री को तमाम राज्यों के गृह मंत्री और प्रदेश के पुलिस मुखिया रिपोर्ट करते हैं, यही नहीं गृहमंत्री को देश के तमाम राज्यों के राज्यपाल भी रिपोर्ट करते हैं, ऐसे में एक प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर उन्हे एक राज्य में सीमित होना पड़ेगा। हालांकि यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है लेकिन बावजूद इसके देश के गृहमंत्री का पद इससे कहीं बड़ा है।

राजनीतिक अवसान

राजनीतिक अवसान

राजनाथ सिंह ने अपने राजनीतिक पारी की शुरुआत 1984 में भाजपा के यूथ विंग के अध्यक्ष के तौर पर की थी और पहली बार वह यूपी के मुख्यमंत्री 2000 में बने थे, इसके बाद वह केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। राजनाथ सिंह के राजनीतिक जीवन एक और बड़ा मुकाम तब आया जब उन्हें 2006 से 2009 तक पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया और दोबारा उन्हें 2014 में पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। ऐसे में राजनीतिक जीवन में इतना सफर तय करने के बाद एक बार फिर से यूपी की राजनतीति में वापस जाना राजनाथ सिंह के लिए राजनीतिक अवसान का भी काम कर सकता है।

विकास कार्यों का श्रेय मिलना मुश्किल

विकास कार्यों का श्रेय मिलना मुश्किल

यूपी में भाजपा की प्रचंड जीत का श्रेय पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर पर बंध चुका है, ऐसे में अगर राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते भी हैं तो उन्हें इसका श्रेय नहीं मिलेगा। 2014 में राजनाथ सिंह की अगुवाई में ही भाजपा ने प्रदेश में 71 सीटें हासिल की थी लेकिन उसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी को मिला था। ऐसी परिस्थिति में प्रदेश में जो भी विकास के काम होंगे वह प्रधानमंत्री के नाम पर ही जाएंगे।

2019 के लिए काफी चुनौतीभरा यूपी

2019 के लिए काफी चुनौतीभरा यूपी

यूपी में भाजपा के लिए काफी चुनौती है, एक तरफ जहां प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का सबसे बड़ा लक्ष्य है तो दूसरा प्रदेश में बेरोजगारी और आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाना है। प्रदेश में पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान कई सांप्रदायिक घटनाएं भी हुई, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश काफी चुनौतियों वाला प्रदेश है। इन तमाम परिस्थतियों में राजनाथ सिंह हमेशा ही प्रदेश और देश की सियासत में कसौटी पर रहेंगे। 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में एक बाऱ फिर से उत्तर प्रदेश काफी अहम भूमिका निभाएगा।

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