कानपुर का वह अलौकिक मंदिर जहां सावन के हर सोमवार सबसे पहले पूजा 'अश्वत्थामा' करते हैं
कानपुर। कानपुर का शिव मंदिर भक्तों के लिए आकर्षण और अलौकिक आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐसी मान्यता है कि महाभारतकालीन योद्धा अश्वस्थामा सावन के हर सोमवार यहाँ शिव जी की पूजा करने आते हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथो में वर्णित है कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग के कुल दस व्यक्ति आज भी सशरीर इस धरती पर अमर रहते हुए मौजूद हैं। इनमें से एक अश्वत्थामा भी हैं। किस तरह होता है इस शिव मंदिर में अश्वस्थामा की उपस्थिति और उनकी शिव भक्ति का एहसास , इसके लिए पढ़िए कानपुर के शिवराजपुर इलाके में स्थित इस प्राचीन शिव मंदिर के बारे में अद्भुत बातें-

अश्वत्थामा शिव जी के भक्त थे यह तो सभी जानते है लेकिन आपसे यह कहा जाए कि अश्वत्थामा भगवान् शिव की पूजा करने के लिए रोज मंदिर आते हैं तो यह सुनकर आप हैरान हो जाएंगे। लेकिन कानपुर में एक भगवान् शिव का एक ऐसा अलौकिक मंदिर है जंहा अश्वत्थामा रोज पूजा करने आते है। कानपुर से 40 किलोमीटर दूर शिवराजपुर में खेरेसवर धाम है इस मंदिर की काफी मान्यता भी हैं। इस मंदिर में जो शिवलिंग है वह स्वयं जमीन से निकला है। यह मंदिर काफी प्राचीन है लगभग 200 वर्ष पुराना है।
कहा जाता है द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य की कुटी यंही पर है इसका जिक्र महाभारत में महाभारत में भी है। अश्वाथामा का जन्म यहीं पर हुआ था और पांडवों ने यहीं पर शिक्षा भी ग्रहण की थी। इसीलिए अश्वत्थामा यहां पूजा करने आते हैं। रात में मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। मंदिर के पट खोले जाते है तो भगवान् शिव के शिवलिंग कि पूजा अर्चना की हुई मिलती है। शिवलिंग पर जल वा अदभुत तरह के फूल चढ़े हुए मिलते हैं। मंदिर के आसपास दुकान लगाने वालों का मानना है कि यह मंदिर काफी प्राचीन है और अश्वत्थामा इस मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। इस मंदिर की प्रसिद्धि अधिक है। इस मंदिर की खास बात यह है कि अगर कोई भी भक्त सच्चे मन से भगवान शिव कि पूजा अर्चना करता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।
मंदिर में भगवान शिव नित्य दर्शन करने आने वाले गोविन्द अवस्थी का कहना है कि यह सिद्ध मंदिर है। यहां पर जो शिवलिंग है उसको किसी ने स्थापित नहीं किया है वो स्यंभू शिवलिंग है। इस मंदिर के आसपास गाय चराने वाले चरवाहे आते थे उनकी गाय एक नियमित रूप से एक खास जगह पर अपना दूध निकाल देती थी जिससे सभी हैरान थे। जिस जगह गाय अपना दूध निकालती थी, जब वहां खुदाई की गई तो वहां पर एक अदभुत शिवलिंग मिली। इस मंदिर में अश्वत्थामा आते हैं लेकिन किसी ने उनको देखा नहीं है। सुबह जब मंदिर के पट खोले जाते है तो शिवलिंग पर अदभुत फूल और कुछ ऐसी चीजें मिलती हैं जो आम आदमी के वश के बाहर हैं।
मंदिर प्रांगण में ओम प्रकाश की 33 पीढ़ियां बीत गई मिठाई बेचने वाले ओम प्रकाश ने एक बार अश्वथामा के दर्शन किए हैं। ओम प्रकाश बताते है कि यह सच है अश्वत्थामा इस मंदिर में सबसे पहले पूजा करने आते हैं। जब उनसे पूछा गया की कभी अश्वत्थामा दिखाई दिए हैं तो ओम प्रकाश ने बताया कि एक बार घटना घटित हुई थी। तीन बजे वे यहीं पर लेटे हुए थे तो सामने से अश्वाथामा जी चले आ रहे थे हमने उनको खूब अच्छी तरह से देखा। जब दरवाजे के सामने आ गए तो उनसे हमारी निगाह में निगाह मिल गई और वो एकदम से अन्दर चले गए। बिलकुल बिजली के समान गए और उसके बाद दिखाई नहीं पड़े।
ओम प्रकाश ने जब अश्वाथामा को देखा था उनका रंग सावला था देखने में उनकी उम्र करीब पचास पचपन साल लग रही थी। वह सफ़ेद वस्त्र पहने हुए थे माथे पर सफ़ेद पट्टी बंधी थी क्योकि उनके मस्तिक में जो मड़ी थी वो निकाल ली गई थी उनके सिर के बाल छोटे छोटे थे उनकी लम्बाई आम आदमी की अपेक्षा अधिक थी।
मंदिर के महंत जगदीश पुरी की 36 पीढ़ियों ने इस मंदिर की सेवा करते आए हैं। अब इस मंदिर की जिम्मेदारी जगदीश पुरी निभा रहे हैं। महंत जगदीश का कहना है कि बाबा शिव का शिवलिंग बहुत पुराना है। सतयुग से यह शिवलिंग स्थापित है। द्वापर में यंहा गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था और उनके पुत्र अश्वाथामा का जन्म भी यहीं हुआ था। जब महाभारत में अश्वाथामा की मणि निकाल ली गई तो उन्होंने कृष्ण भगवान् से कहा की अब मणि की क्षतिपूर्ति कैसे होगी तो भगवान् कृष्ण ने कहा की जंहा पर आपका जन्म स्थल है वंहा जाए। कृष्ण ने उनसे कहा कि भगवान् शिव की नित्य दर्शन करने से मणि की क्षतिपूर्ति हो जाएगी। यह आस्था और विश्वास लोगों में है हमारे पूर्वजों ने अश्वाथामा को देखा भी है। अश्वत्थामा आज भी सबसे पहले दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर में भक्तों को मनोकामनाएं पूरी होती हैं।












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