33 सालों से कोई भेद नहीं पाया गोरखपुर सदर का अभेद्य किला, क्या इस बार सहानुभूति के सहारे टूटेगा रिकॉर्ड

लखनऊ, 2 मार्च: उत्तर प्रदेश में पांचवें चरण के चुनाव के बाद अब छठे चरण में योगी सरकार की अग्नि परीक्षा होगी। गोरखपुर सीट उन 57 सीटों में भी शामिल है जहां छठे चरण में मतदान होना है। इस बार गोरखपुर से खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनावी मैदान में हैं। सीएम योगी पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। गोरखपुर सदर विधानसभा सीट के इतिहास की बात करें तो यह सीट भगवा खेमे का ऐसा अभेद्य गढ़ है, जिसे पिछले 33 साल से कोई भेद नहीं पाया है। लेकिन समाजवादी पार्टी ने इस बार कभी बीजेपी से लोकसभा का चुनाव लड़े दिवंगत उपेंद्र शुक्ला को मैदान में उतारकर योगी के खिलाऊ ब्राह्मणों की नाराजगी भुनाने की कोशिश की है। शुक्ला की पत्नी भी इलाके में पति की मौत का हवाला देकर भावुक अपील कर रही हैं।

33 सालों से गोरखपुर सदर सीट पर नहीं जीता विपक्ष

33 सालों से गोरखपुर सदर सीट पर नहीं जीता विपक्ष

मुख्यमंत्री योगी गोरखपुर सीट से 1998 से 2017 तक सांसद रहे हैं। उन्होंने पहली बार यहां से 1998 में भाजपा उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में उन्होंने बहुत कम अंतर से जीत हासिल की थी, लेकिन उसके बाद हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर बढ़ता गया। वह 1999, 2004, 2009 और 2014 में सांसद चुने गए। राजनीतिक पंडितों की माने तो 33 साल से आज तक इस सीट की रणनीति और समीकरण गोरखनाथ मंदिर तय करते हैं। इन 33 वर्षों में कुल आठ चुनाव हुए, जिनमें से भाजपा और हिंदू महासभा (योगी आदित्यनाथ के समर्थन से) ने सात बार जीत हासिल की है। 2002 में डॉ. राधा मोहन दास अग्रवाल ने अखिल भारतीय हिंदू महासभा के बैनर तले इस सीट से जीत हासिल की थी लेकिन जीत के बाद वे भाजपा में शामिल हो गए। तब से आज तक इस सीट पर उनका कब्जा है।

गोरखपुर सीट से चंद्रशेखर समेत 12 प्रत्याशी

गोरखपुर सीट से चंद्रशेखर समेत 12 प्रत्याशी

गोरखपुर जिले की सभी 9 विधानसभा सीटों के लिए कुल 109 उम्मीदवार मैदान में हैं। गोरखपुर सदर सीट से सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कुल 12 उम्मीदवार हैं। ये 12 उम्मीदवार ज्यादातर राजनीति के नए खिलाड़ी हैं। सपा ने गोरखपुर सदर सीट से भाजपा के पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र शुक्ला की पत्नी शुभावती शुक्ला को मैदान में उतारा है। जबकि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से ख्वाजा शमसुद्दीन और कांग्रेस से चेतना पांडे मैदान में हैं। वहीं, भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के साथ खेल रहे हैं।

 क्या योगी से लेंगी पति के अपमान का बदला

क्या योगी से लेंगी पति के अपमान का बदला

सपा ने योगी को टक्कर देने के लिए सुभावती शुक्ला को मैदान में उतारा है। इन्होंने अभी एक महीने पहले ही समाजवादी पार्टी का दामन थामा है। इनके पति स्वर्गीय उपेंद्र दत्त शुक्ल भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता से लेकर प्रदेश के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके निधन के बाद सीएम योगी की उपेक्षा से आहत होकर पत्नी सुभावती शुक्ला ने सपा का दामन थाम लिया। सुभावती चुनाव प्रचार के दौरान यह चुनौती देती रही हैं कि वह योगी आदित्यनाथ को हराकर अपने पति का सम्मान वापस लाएंगी। साथ ही अपमान का भी बदला लेंगी। हालांकि बात इनके राजनीतिक कॅरियर की करें, तो सुभावती शुक्ला की अपनी कोई पहचान नहीं है। उपेंद्र दत्त शुक्ल जैसे प्रखर और मजबूत भाजपा नेता की पत्नी होना ही इनकी पहचान है।

सपा से हार गए थे उपेंद्र शुक्ल

सपा से हार गए थे उपेंद्र शुक्ल

उपेंद्र शुक्ल योगी आदित्यनाथ के उत्तराधिकारी के रूप में साल 2018 का लोकसभा उपचुनाव गोरखपुर से लड़े थे। मगर, महज 26 हजार वोटों से इन्हें सपा प्रत्याशी से हार का सामना करना पड़ा था। यही हार उपेंद्र शुक्ल के जीवन के लिए काल बन गई। वह स्वास्थ्य से परेशान होते चले गए। करीब 20 महीने पहले हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया। सुभावती और उपेंद्र शुक्ल के 2 बेटे अरविंद और अमित शुक्ल हैं। पिता की मौत के बाद मां के साथ उनके दोनों बेटे लगातार संघर्षों में बने रहे।

सुभावती ने योगी पर लगाया उपेक्षा करने का आरोप

सुभावती ने योगी पर लगाया उपेक्षा करने का आरोप

सुभावती शुक्ला और उनके बच्चों का सबसे बड़ा दुख इस बात का था कि योगी आदित्यनाथ और भाजपा के लिए उपेंद्र शुक्ल दिन-रात एक करते थे। पुलिस की लाठियां खाईं, जेल में भी रहे। फिर भाजपा और योगी मिलकर उन्हें 2018 का लोकसभा उपचुनाव में जीत क्यों नहीं दिला पाए। जबकि खुद योगी इस सीट को तीन लाख से अधिक मतों से जीतते थे। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में एक बाहरी नेता के रूप में रवि किशन ने भी करीब 4 लाख वोटों से जीत दर्ज की थी।

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