बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में जीत के लिए अपनाए ये 10 फॉर्मूले
403 विधानसभा सीटों वाली उत्तर प्रदेश में 312 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने ये कमाल कैसे किया...जानिए वो 10 फॉर्मूले...
लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी ने फिर से नॉकआउट प्रदर्शन करते हुए विधानसभा चुनाव के ताजा दौर में विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया। अमित शाह की चुनावी रणनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आगे सभी सियासी दलों की चुनावी रणनीति फेल हो गई। सियासी तौर पर बेहद अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के शानदार प्रदर्शन ने चुनावी जानकारों को भी हैरान कर दिया।
क्या वजहें थी जिसने बीजेपी को बनाया सबसे बड़ी पार्टी
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इतनी बड़ी जीत की उम्मीद तो शायद पार्टी को भी नहीं रही होगी। हालांकि इस जीत के लिए बीजेपी आलाकमान ने बेहद खास रणनीति बनाई थी। चाहे नोटबंदी हो या फिर सर्जिकल स्ट्राइक, मोदी सरकार के दौरान किए गए कार्यों को लोगों के बीच पहुंचाने का कोई भी मौका पार्टी ने हाथ से जाने नहीं दिया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सोशल इंजीनियरिंग का ऐसा ताना-बाना बुना कि दूसरे दल कहीं टिक ही नहीं सके। 403 विधानसभा सीटों वाली उत्तर प्रदेश में 312 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने ये कमाल कैसे किया...जानिए वो 10 फॉर्मूले...

इन फैक्टर ने बीजेपी के पक्ष में बनाया माहौल
1- भारतीय जनता ने यूपी में जीत के लिए जातीय गणित को साधने की बेहद खास रणनीति पर काम किया। बीजेपी को पता था कि यूपी चुनाव में यादव जाति का वोट समाजवादी पार्टी को ही जाता है। ऐसे में पार्टी ने गैर-यादव पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों पर अपना दांव लगाया। पार्टी ने 130 से ज्यादा सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया।
2- बीजेपी ने गैर-जाटव दलित वोटरों को साधने की कोशिश की। 25 टिकट गैर जाटव दलित और करीब 9 टिकट धोबियों को दिया गया। इसके साथ-साथ अमित शाह ने जिस तरह से केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया ये भी अहम कदम था। उनकी नजर सीधे तौर पर पिछड़ी जातियों को अपने हक में करने की थी। ये फैसला इसी की ओर इशारा करता है।
3- अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव को अपने साथ जोड़ने के लिए ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में कृष्णा राज, साध्वी निरंजन ज्योति और अपना दल की अनुप्रिया पटेल को शामिल कराया गया। जिससे इन वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल सके।

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक के फैसलों को बनाया आधार
4- बीजेपी ने चुनाव से पहले ही अपनी रणनीति को मजबूत बनाना शुरू कर दिया था। यही वजह है कि पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के बड़े नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी बीजेपी में न केवल शामिल कराया, उन्हें पार्टी का उम्मीदवार भी बनाया। बीजेपी आलाकमान के इस कदम के बाद बीएसपी केवल जाटवों की पार्टी बन कर रह गई। पार्टी ने यही रणनीति अखिलेश यादव के साथ भी निभाई, ऐसे में सपा केवल यादवों के भरोसे ही रह गई।
5- बीजेपी ने नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक के फैसलों को जनता में भुनाने की कोशिश की। उन्होंने ये जताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे नेता हैं जो जनता के हित के लिए और गरीबों के लिए बड़े फैसले लेने में सक्षम हैं।

जनता से जुड़े अहम ऐलान ने बनाया माहौल
6- जनता के हित के लिए उठाए गए कदम जैसे उज्ज्वला योजना, शौचालय बनवाने के लिए सब्सिडी और यूरिया की बेहतर सप्लाई के तेजी से क्रियान्वयन को भी उन्होंने आधार बनाया। पार्टी ने चुनाव में कई अहम ऐलान किए जैसे जिनमें कृषि ऋण में छूट और ब्याज रहित लोन शामिल है। इन ऐलानों ने चुनाव नतीजों पर असर दिखाया।
7- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अमित शाह ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव की सरकार पर निशाना साधते हुए नौकरी में भेदभाव का आरोप लगाया। सपा सरकार पर मुस्लिम और यादवों को फायदा का पहुंचाने के आरोप लगे। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने रोजगार और एफआईआर में भेदभाव को समाप्त करने का वादा किया।

मोदी फैक्टर का दिखा असर
8- हिंदुओं को साधने की कवायद में पार्टी की ओर से सरकार बनने पर अवैध बूचड़खानों को लेकर तय मापदंडों के तहत कार्रवाई और एंटी रोमियो स्क्वैड को स्थापित करना अहम ऐलान थे। जिसका फायदा उन्हें चुनावों में मिला।
9- मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं देने का फायदा भी पार्टी को हुआ, इससे वोटरों में बीजेपी के हिंदू पार्टी होने का संदेश गया।
10- बीजेपी ने चुनाव में मुख्यमंत्री उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया। किसी भी नेता को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट नहीं किया गया। मोदी के चेहरे पर चुनाव में उतरी पार्टी को सीधा फायदा मिला। अखिलेश और मायावती के सामने बीजेपी का सीएम उम्मीदवार घोषित नहीं करना पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित हुआ।












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