पढ़ाई के डर ने बनाया सुधा सिंह को उड़नपरी, एशियन गेम्स में कांस्य के पहले भी देश को दिला चुकी हैं स्वर्ण

रायबरेली। इंडोनेशिया में चल रहे एशियन गेम्स में उत्तर प्रदेश के रायबरेली के एक छोटे से गांव से निकली सुधा सिंह ने भारत को एक और सिल्वर खिताब जीतकर दिया है। सुधा ने ये पदक 3 हजार मीटर स्टीपल्चेज में जीता है। सोनिया गांधी ने सुधा सिंह के लिए शुभकामना संदेश भी भेजा था। इससे पूर्व रियो ओलंपिक 2016 में भी वो 3000 मीटर की दौड़ में भाग लेकर देश का नाम रोशन कर चुकी है। जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सम्मानित किया था।

रायबरेली के भीमा गांव से ताल्लुक रखती हैं सुधा सिंह

रायबरेली के भीमा गांव से ताल्लुक रखती हैं सुधा सिंह

देश-विदेश में उत्तर-प्रदेश का गौरव बढ़ा चुकी रायबरेली की एथलीट खिलाड़ी सुधा सिंह ने बहुत कम समय में कई राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय सम्मान हासिल किए हैं। एक वक्त था, जब गांव में अपने घर से भी सुधा ज्यादा बाहर नहीं निकलती थीं और आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का नाम रोशन कर रही हैं। रायबरेली जिले से 114 किमी. पूर्व दिशा में भीमी गांव में एक मध्यम वर्ग के परिवार की सुधा आज भारतीय एथलेटिक्स की जानी मानी खिलाड़ी बन गई हैं। वो चाहे एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतना हो या फिर शिकागो में नेशनल एथलेटिक चैंपियनशिप में अपना दबदबा कायम करना हो, गांव की यह बेटी हमेशा से ही आगे रही है।

2003 में लखनऊ के स्पोर्ट्स कॉलेज से की थी एथलेटिक्स की शुरुआत

2003 में लखनऊ के स्पोर्ट्स कॉलेज से की थी एथलेटिक्स की शुरुआत

सुधा को एशियन गेम्स में पदक मिलने के बाद रियो ओलंपिक में खेलने का भी मौका मिला, लेकिन वहां जाकर उन्हें स्वाइन फ्लू हो गया, इस कारण उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा। सुधा की इस उपलब्धि से उनके परिवार बहुत खुश है। सुधा के भाई प्रवेश नारायण सिंह ने उनकी इस मुकाम तक पहुंचने में बहुत मदद की। बचपन से ही खेल की शौकीन रही सुधा ने अपनी शिक्षा रायबरेली जिले के दयानंद गर्ल्स इंटर कॉलेज से पूरी की। एथलेटिक्स के क्षेत्र में सुधा की शुरुआत साल 2003 में लखनऊ के स्पोर्ट्स कॉलेज से हुई।

14 वर्ष में ही उन्हें अपना पहला पदक मिला

14 वर्ष में ही उन्हें अपना पहला पदक मिला

स्टेपल चेज (एक प्रकार की दौड़) की खिलाड़ी रही सुधा ने अपनी कामयाबी के बीच किसी को भी आने नहीं दिया। यही वजह है की 14 वर्ष में ही उन्हें अपना पहला पदक मिल गया। सुधा के पिता हरिनारायण सिंह रायबरेली की आईटीआई फैक्ट्री में क्लर्क हैं। इतने कम समय में सुधा को इतना मान सम्मान मिलने से उनके पिता बहुत खुश हैं।

पढ़ाई के डर ने बना दिया एथलीट

पढ़ाई के डर ने बना दिया एथलीट

ओलंपियन सुधा सिंह ने बताया कि बचपन से ही उनका मन पढ़ाई से ज्यादा स्पोर्ट्स में लगता था। गांव में बच्चों से रेस लगाना, पत्थर फेंकना, पेड़ों से कूदना उन्हें पसंद था। कभी-कभी तो घर में सब परेशान हो जाते थे, फिर भी वो उनके स्पोर्ट्स को बढ़ावा देते थे। लेकिन एक बेसिक पढ़ाई तो सभी को करनी होती है, इसलिए उन्हें फोर्स किया जाता था। वो कहती हैं कि ट्यूशन पढ़ने न जाना पड़े इसलिए वो उसके 10 मिनट पहले ही दौड़ने निकल जाती थीं। पढ़ाई से बचने के लिए भागने की आदत ने कब मुझे एथलीट बना दिया मालूम ही नहीं चला। मैं तो सबको पीछे करने का लक्ष्य लेकर दौड़ती हूं, मेडल मिलेगा या नहीं इस बात पर ध्यान नहीं देती।

3 साल तक नहीं दिया मेडल तो नौकरी से बाहर

3 साल तक नहीं दिया मेडल तो नौकरी से बाहर

वो कहती हैं कि जब 2009 में चाइना में मैंने एशिया कप के लिए 3000 मीटर स्टेप चेस रेस दौड़ी, तो उसमें मेरी सेकेंड पोजिशन थी। तभी रेलवे में नौकरी का ऑफर मुंबई से आया, तो मैंने असिस्टेंट टीसी की पोस्ट पर ज्वाइन किया। फिर 2010 में चाइना में एशिया कप में पहली रैंक आई, तो रेलवे ने प्रमोट करके असिस्टेंट स्पोर्ट्स ऑफिसर बना दिया। इसके बाद लगा कि अब नौकरी के साथ अपनी रेस जारी रखूंगी। लेकिन तभी बताया गया कि रेलवे में एक बॉन्ड होता है, जिसमें 3 साल तक रेलवे को मेडल दिलाने के लिए खेलना होता है। नहीं दिला पाने पर नौकरी से बाहर कर दिया जाता है।

देश के लिए दौड़ना अच्छा लगता है

देश के लिए दौड़ना अच्छा लगता है

जापान में एशिया कप होने वाला था, मैंने तैयारी शुरू की और मुझे सेकेंड पोजिशन मिली। मुझे अपने देश के लिए दौड़ना अच्छा लगता है। खास तौर पर जब देश के बाहर बुलाया जाता है। जब वहां कहा जाता है 'सुधा सिंह फ्रॉम इंडिया', तो लगता है कि मैं वाकई स्पेशल हूं। बस यही सुनने के लिए बार-बार खेलने का मन करता है।

घरवाले टीवी पर देखकर होते हैं खुश

घरवाले टीवी पर देखकर होते हैं खुश

मेरा परिवार बहुत बड़ा है, हम 4 भाई-बहन हैं। मैं तीसरे नंबर पर हूं। कई बार घर पर सब आते हैं कि शादी कब कराएंगे लड़की की। तो मां बोलती हैं उसके पास जब समय होगा तब करेगी। घर में सभी मुझे टीवी पर देखकर खुश होते हैं, वो जब भी देखते हैं तो पड़ोस में सभी को बुलाकर बताते हैं, कि आज सुधा टीवी पर आई थी। मेरी ख्वाहिश यूपी के बच्चों को ट्रेनिंग देने की है, इसके लिए मैंने कोशिश भी की है। लेकिन इसके लिए कि‍सी और विभाग में नौकरी करने के लिए मुझे यूपी आना पड़ेगा। कई बार वन विभाग और अन्य जगहों से कॉल आई, लेकिन मैंने मना कर दिया। मुझे सिर्फ खेल विभाग में ही आना है। जिससे बच्चों को सही गाइड कर सकूं। अब सीएम योगी जी से उम्मीद है।

ट्रेनिंग एकेडमी भी खोलना चाहती हैं सुधा

ट्रेनिंग एकेडमी भी खोलना चाहती हैं सुधा

सुधा की सफलता अब स्थानीय लड़कियों की उम्मीद बन रही है। सुधा के बारे में उनके भाई प्रवेश नारायण बताते हैं कि सुधा यहां की लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। वो जब भी घर आती हैं, उनसे मिलने वालों की लाइन लगी ही रहती है। सुधा की देखा-देखी अब यहां की लड़कियों ने भी सुबह सुबह दौड़ना शुरू कर दिया है। सुधा चाहतीं है कि वो वापस आकर यहां की लड़कियों के लिए एक छोटी सी ट्रेनिंग एकेडमी खोलें।

जानें देश-विदेश में कब-कब जीती प्रतियोगिताएं

जानें देश-विदेश में कब-कब जीती प्रतियोगिताएं

वर्ष 2003 - शिकागों में जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में कांस्य पदक।

वर्ष 2004 - कल्लम मे जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में रजत पदक।

वर्ष 2005 - चीन में जूनियर एशियन क्रॉस कंट्री प्रतियोगिता में चयन।

वर्ष 2007 - नेशनल गेम्स में पहला स्थान ।

वर्ष 2008 - सीनियर ओपन नेशनल में पहला स्थान।

वर्ष 2009 - एशियन ट्रैक एंड फील्ड में दूसरा स्थान।

वर्ष 2010 - एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक।

वर्ष 2014 - एशियन गेम्स में कांस्य पदक।

वर्ष 2015 - रियो ओलंपिक में चयन।

वर्ष 2016 - आईएएएफ (आईएएएफ) डायमंड लीग मीट में नेशनल रिकॉर्ड (9:25:55) को तोड़ते हुए इतिहास रचा ।

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