Atiq Ahmed: अपराध से राजनीति में अतीक की एंट्री की फिल्मी कहानी, 9 दिन की दूल्हन को होना पड़ा था विधवा
Atiq Ahmed: महज 17 साल की उम्र में हत्या का आरोप लगने के बाद अतीक अहमद ने कभी मुड़कर नहीं देखा, उसपर सैकड़ों केस दर्ज हुए। पढ़िए अतीक के अपराध से राजनीति के शिखर तक पहुंचने का सफर

Atiq Ahmed: माफिया अतीक अहमद जिसके बारे में इस वक्त हर कोई चर्चा कर रहा है। तमाम विपक्षी दल फिर वह समाजवादी पार्टी हो या बहुजन समाज पार्टी अतीक अहमद, उसके भाई अशरफ अहमद और अतीक के बेट असद की हत्या को लेकर प्रदेश सरकार पर सवाल खड़ा कर रहे हैं।
फिल्मी है अतीक के अपराध की दुनिया
लेकिन अतीक अहमद जिस तरह से अपराध की दुनिया के शिखर पर पहुंचा इसमे तमाम राजनीतिक दलों का भी बड़ा हाथ था। अपराध की दुनिया में अतीक के शीर्ष पर पहुंचने की कहानी काफी फिल्मी है। गैंग्स ऑफ वासेपुर, मिर्जापुर जैसी तमाम फिल्मों की कहानी भी अतीक की कहानी के सामने बौनी नजर आती है।
17 साल की उम्र में हत्या
राजनीति की कीचड़ में किस तरह से माफियाओं को वोट बैंक की राजनीति के लिए पोषित किया जाता है उसका ज्वलंत उदाहरण अतीक अहमद है। यूपी की राजनीति में अपराध और माफिया की एंट्री की शुरुआत अतीक की एंट्री से ही होती है। महज 17 साल की उम्र में हत्या का केस दर्ज होने के बाद अतीक ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा, लेकिन अंत में उसका वही हाल हुआ जो अमूमन तमाम माफिया-डॉन का होता है।
अपराध और राजनीति
दरअसल जब इलाहाबाद में जब अतीक अपराध की दुनिया में अपने पैर पसार रहा था तो उसने राजनीति में एंट्री करके इसे और मजबूत करने की कोशिश की। पहली बार उसने इलाहाबाद पश्चिम से 1989 में चुनाव लड़ा और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की। इस चुनाव में अतीक को तकरीबन 26000 वोट मिले जबकि उसके प्रतिद्वंदी चांद बाबा को तकरीबन 9000 वोट मिले।
अतीक का वर्चस्व
इस जीत के बाद उसने इलाहाबाद के माफिया डॉन चांद बाबा को कथित रूप से मौत के घाट उतार दिया। चांद बाबा की हत्या के बाद अतीक ने अपने वर्चस्व को बढ़ाने का काम शुरू किया। लगातार तीन बार अतीक ने विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद पश्चिम से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की।
मुलायम सिंह की वोटबैंक की राजनीति
अतीक की बढ़ती ताकत और मुस्लिम वोटों को अपनी ओर करने की रणनीति के तहत सपा सुप्रीम मुलायम सिंह यादव ने उसे अपनी पार्टी में शामिल किया और 1996 में अतीक ने सपा के टिकट पर इलाहाबाद पश्चिम से चौथी बार चुनाव में जीत दर्ज की।
अशरफ को राजू पाल ने हराया
लेकिन जब 2002 में अतीक ने अपना दल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया तो उसने विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया और इस सीट से उसने अपने भाई अशरफ अहमद को मैदान में उतारा। इस सीट पर अतीक को बसपा नेता राजू पाल से चुनौती मिल रही थी। हालांकि 2002 में अतीक अहमद के सामने राजू पाल को हार का मुंह देखना पड़ा था।
अशरफ की हार के बाद राजू पाल की हत्या
लेकिन जब 2004 में अतीक अहमद ने लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया और विधानसभा सीट से इस्तीफा दिया तो उसके भाई अशरफ ने यहां से उपचुनाव में ताल ठोकी। नवंबर 2004 में अशरफ अहमद को राजू पाल के सामने हार का मुंह देखना पड़ा। इस हार से अतीक अहमद इतना नाराज हुआ कि कुछ ही दिनों बाद राजू पाल की हत्या करवा दी गई।
शादी के 9 दिन बाद पूजा हो गईं विधवा
दिलचस्प बात है कि उपचुनाव में जीत के बाद राजू पाल की पूजा पाल से शादी हुई थी और शादी के 9 दिन बाद राजू पाल की हत्या हो गई। पति की हत्या के बाद पूजा पाल को बसपा ने उपचुनाव में मैदान में उतारा।
चुनाव प्रचार के दौरान पूजा पाल ने अपने हाथ की मेंहदी दिखाकर लोगों से भावुक अपील की थी। लेकिन बावजूद इसके उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा और अशरफ अहमद की चुनाव में जीत हुई। हालांकि 2007 में पूजा पाल को बसपा के टिकट पर बड़ी जीत मिली।
अतीक को 2012 में हराया था पूजा ने
वर्ष 2012 में पूजा पाल ने अतीक अहमद के सामने ताल ठोकी और इस चुनाव में उन्होंने अतीक अहमद को मात दी। लातार दो बार पूजा पाल बसपा के टिकट पर विधायक बनीं। लेकिन 2017 में सपा के टिकट पर उन्हें भाजपा के सिद्धार्थ नाथ सिंह के सामने हार का मुंह देखना पड़ा।
अतीक के खिलाफ लड़ती रहीं पूजा
यहां गौर करने वाली बात है कि जिस अतीक अहमद पर पूजा के पति राजू पाल की हत्या का आरोप था। राजू पाल की हत्या के मुख्य चश्मदीद उमेश पाल की भी पिछले दिनों अतीक के गुर्गों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। पहले पति और फिर बाद में देवर की हत्या के बाद पूजा पाल लगातार अतीक के खिलाफ लड़ती रहीं।
उफ्फ ये राजनीति
लेकिन कहते हैं ना राजनीतिक सिर्फ अपने फायदे को देखती है। जिस बसपा ने पहले राजू पाल की विधवा पूजा पाल अपनी पार्टी में शामिल किया। उसी बसपा ने अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन को अपनी पार्टी में शामिल करके महापौर का प्रत्याशी घोषित कर दिया।
हालांकि पूजा पाल ने 2017 में बसपा का हाथ छोड़ दिया था और वह उसी सपा में शामिल हो गईं, जिसने अतीक अहमद को ताकत देने का काम किया था। बहरहाल अब जब अतीक और अशरफ की हत्या हो चुकी है देखने वाली बात यह है कि आने वाले दिनों में राजनीति किस ओर करवट लेती है।












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