हेमवती नंदन बहुगुणा की जयंती पर विशेष : विमोचन से पहले क्यों सुर्खियों में आई रीता जोशी की किताब, जानिए
लखनऊ, 25 अप्रैल: उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा की आज जयंती है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने सुबह ही उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किया। एक समय था जब हेमवती नंदन बहुगुणा को कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में गिना जाता था। उनकी बेटी और अब प्रयागराज की सांसद रीता बहुगुणा जोशी ने अपने पिता के राजनीतिक सफर को उजागर करती हुई एक किताब लिखी है। इस किताब को उन्होंने 'हेमवती नंदन बहुगुणा: भारतीय जनचेतना के संवाहक' का नाम दिया है। हालांकि इस किताब का विमाचन चार मई को होना है लेकिन इस किताब में कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी समेत तमाम नेताओं का जिक्र है। किताब में इस बात का खुलासा किया गया है कि बहुगणा और इंदिरा गांधी के बीच कई मुद्दों पर भारी मतभेद हुआ करता था। इन गहरे मतभेदों को भी किताब में शामिल किया गया है।

एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी हेमवती को नहीं हरा पाईं इंदिरा
इलाहाबाद की सांसद डॉ. रीता ने अपनी किताब में कई खुलासे भी किए हैं। किताब में इस बात का जिक्र किया गया है कि कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा का इंदिरा गांधी से मतभेद खुलकर सामने आने के बाद 1980 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। 1981 में गढ़वाल में हुए उपचुनाव में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे और तब की पीएम इंदिरा गांधी ने उन्हें हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उन्होंने तब कुल 34 चुनावी सभाएं की थी। यह उप चुनाव दस महीने इसलिए चला क्योंकि इसे एक बार रद्द किया गया, तो दो बार तारीख बदली गई। इसके बाद भी स्थानीय स्तर पर लोगों ने नारा दिया 'गढ़वा का चंदन हेमवती नंदन'। उस चुनाव में बहुगुणा भारी मतों से विजयी रहे। यह हार बहुत दिनों तक पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा को चुभती रही।

वीपी सिंह पर भी किताब में साधा निशाना
अपनी किताब में रीता ने कांग्रेस के कई दिग्गजों का जिक्र हेमवती नंदन बहुगुणा के संदर्भ में किया है। उन्होंने लिखा है कि हेमवती नंदन नहीं चाहते थे कि पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को देश की बागडोर मिले। उनका मानना था कि वह कुंठित मानसिकता के व्यक्ति हैं। यदि वो शीर्ष पद पर बैठे तो देश बर्बाद हो जाएगा। यह भी बताया है कि वीपी सिंह को कांग्रेस की सदस्यता और पहली बार टिकट भी उनकी मां कमला बहुगुणा ने दिलाया था।

हमेवती नंदन बहुगुणा ने किया था इमरजेंसी का वरोध
रीता बहुगुणा जोशी ने अपनी किताब में इस बात का भी जिक्र किया है बहुगुणा और इंदिरा के मतभेद बढ़ चुके थे। कांग्रेस छोड़ने से पहले उन्होंने 1980 के चुनाव में तीस लोगों के लिए टिकट मांगा। इंदिरा ने मना कर दिया, तब कांग्रेस पर संजय गांधी का खूब प्रभाव था। लोग उनके आगे-पीछे ही घूमते थे। बहुगुणा ने अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया और संजय गांधी के पास टिकट के लिए नहीं गए। इमरजेंसी का भी उन्होंने विरोध किया था। फोन पर इंदिरा से कहा था कि ये क्या कर दिया। वह फासीवादी विचारधारा के सख्त खिलाफ थे।

अमिताभ बच्चन से हारने के बाद काफी आहत हुए थे बहुगुणा
हेमवती नंदन बहुगुणा कभी नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे राजनीति में आएं। वे इस क्षेत्र को बहुत कठिन मानते थे और अवसरवाद के सख्त खिलाफ थे। 1984 में जब अमिताभ बच्चन उनके सामने चुनाव लड़े तो वे आश्वस्त थे कि जीत उन्हीं की होगी, लेकिन हारने के बाद बहुत आहत हुए। उसके बाद से उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी। प्रोफेसर रीता बहुगुणा जोशी की इस किताब का विमोचन उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू 4 मई को दिल्ली में करेंगे।

किताब में हेमवती नंदन बहुगुणा के संघर्षों की कहानी
किताब में इमरजेंसी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। आजादी की लड़ाई के समय किस तरह से नेताओं ने अपने लक्ष्य बनाए इसके बारे में भी लिखा गया है। कैसे राष्ट्रभक्ति और सिद्धांतों के आधार पर नेताओं ने राजनीति की, इसके बारे में लिखा गया है। कैसे जनता पार्टी बनी और टूटी, इसके बारे में जिक्र किया गया है। रीता जोशी के मुताबिक, इस किताब का पहला संस्करण 1997 में आया था, लेकिन तब इसका विमोचन नहीं हुआ था। किताब में 50 साल का इतिहास है। उनके पिता के संघर्ष का इतिहास है।












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