चाचा-भतीजे के हाथ तो मिले लेकिन दिल नहीं मिले, मैनपुरी रैली में शिवपाल की गैर मौजूदगी ने उठाए कई सवाल
लखनऊ, 21 दिसंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव अब महज कुछ ही महीने दूर हैं। जनवरी के पहले सप्ताह तक चुनाव आचार संहिता लगने की अटकले लगाईं जा रही हैं। इधर पीएम मोदी और सीएम योगी पूरे यूपी में लगातार कार्यक्रम कर पूर्व सीएम और समाजवादी पार्टी के सीएम अखिलेश यादव पर निशाना साध रहे हैं। वहीं दूसरी ओर अखिलेश दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए समाजवादी विजय यात्रा निकाल रहे हैं। मंगलवार को सपा के गढ़ मैनपुरी में अखिलेश की यात्रा में यूं तो भारी भीड़ जुटने के दावे किए जा रहे हैं लेकिन गठबंधन के ऐलान के बावजूद शिवपाल का अखिलेश के साथ मंच शेयर न करना चुनावी विश्लेषकों को खटक रहा है। सूत्रों की माने तो चाचा- भतीजे के हाथ तो मिल गए हैं लेकिन शायद दिल अभी नहीं मिले हैं।

रैली में दिखी शिवपाल की होर्डिंग्स, लेकिन वह नहीं
यूपी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी जीत की पुरजोर कोशिश में लगी है. ऐसे में सपा मुखिया अखिलेश यादव का यूपी दौरा जारी है। इसी क्रम में वह मंगलवार को मैनपुरी में रैली में पहुंचे जहां भारी भीड़ जमा हुई थी। बड़ी बात यह है कि इस रैली से पहले सपा समर्थकों ने क्रिश्चियन मैदान को सपा के होर्डिंग्स और बैनरों से पाट दिया था। वहीं रैली में होर्डिंग्स पर चाचा शिवपाल को भी जगह दी गई थी। अखिलेश ने मंच से ही योगी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि मैनपुरी की रैली में जिस तरह की भीड़ आई है उससे लग रहा है कि यूपी में ऐतिहासिक बदलाव आएगा।

शिवपाल के कितने चाहने वालों को मिलेगा टिकट यह अभी भी सवाल
प्रसपा के सूत्रों के अनुसार गठबंधन को लेकर अखिलेश यादव और शिवपाल यादव में पेंच अब भी फंसा है। आज अखिलेश यादव अपने गढ़ में चुनाव प्रचार कर रहे थे। चाचा शिवपाल यादव को भी उनके साथ होना था लेकिन ऐसा न हो सका। इसके पीछे की वजह ये बताई जा रही है कि हाथ तो मिले पर दिल अभी मिलने बाकी हैं। शिवपाल यादव तो समाजवादी पार्टी में अपनी पार्टी के विलय तक की बात कर चुके हैं लेकिन उनके कितने लोगों को टिकट मिलेगा इस पर विवाद बना हुआ है। अखिलेश यादव की तरफ से तो उनके बेटे अंकुर यादव तक को टिकट न देने की बात कही गई है. कहा गया है कि जब राज्य में सरकार बनेगी तो उन्हें ऐडजस्ट कर लिया जाएगा।

अखिलेश को शिवपाल ने सौंपी है लंबी सूची
शिवपाल ने अपने समर्थकों की लंबी लिस्ट भेजी है जिनके लिए वे टिकट चाहते हैं लेकिन अखिलेश अधिक सीटें देने को तैयार नहीं हैं। वैसे तो पिछले लोकसभा चुनाव में शिवपाल के अलग रहने से समाजवादी पार्टी कन्नौज, फिरोज़ाबाद और बदायूं जैसी सीटें भी हार गई थी। लेकिन सूत्रों का यह भी कहना है कि जल्द ही शीट शेयरिंग को लेकर दोनों के बीच समझौता हो जाएगा और इसकी घोषणा भी की जाएगी। हालांकि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के प्रमुख शिवपाल सिंह यादव ने शुक्रवार को ही कहा था कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे को लेकर कोई समस्या नहीं होगी क्योंकि वह किसी भी "बलिदान" के लिए तैयार हैं।

गठबंधन के ऐलान के दौरान दिखा था कार्यकर्ताओं में उत्साह
दोनों पार्टियों के सैकड़ों समर्थक गुरुवार को शिवपाल यादव के घर के बाहर जमा हो गए थे और 'चाचा-भतीजा जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। पीएसपी-एल ने लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 में से 56 सीटों पर चुनाव लड़ा था और असफल रही थी। कुछ महीने पहले हुए पंचायत चुनावों के दौरान, इटावा में सपा और पीएसपी-एल एक साथ आए थे, जहां उन्होंने 24 में से 18 वार्ड जीते थे और बीजेपी को वहां सिर्फ एक सीट मिली थी। यादवो के बारे में कहा जाता है कि वे राज्य की आबादी का लगभग 9 प्रतिशत हैं। 2022 के यूपी चुनावों में भाजपा के खिलाफ आक्रामक रूप से खुद को खड़ा करते हुए, सपा ने पहले ही राष्ट्रीय लोक दल, ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल (कृष्णा पटेल), जनवती पार्टी (समाजवादी) और महान दल के साथ गठबंधन कर लिया है।

राजभर के साथ मंच शेयर करने में दिक्कत नहीं तो शिवपाल से क्यों
सपा के चीफ अखिलेश यादव की मैनपुरी रैली में शिवपाल यादव नहीं शामिल हुए या उन्हें बुलाया नहीं गया था यह बड़ा सवाल है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो अखिलेश और शिवपाल के हाथ तो मिल गए हैं लेकिन दिल मिलना अभी बाकी है। यदि दोनों के दिल मिल गए होते तो अखिलेश के मंच पर शिवपाल जरूर नजर आते और वह भी उस इलाके में जो सपा का मजबूत गढ़ रहा है। दूसरा सवाल यह है कि यदि गठबंधन के तहत ही अखिलेश यादव ओम प्रकाश राजभर को अपनी विजय यात्रा में शामिल कर सकते हैं तो फिर अपने चाचा से उन्होंने दूरी क्यों बनाई। यह एक बड़ा सवाल है। इसके पीछे एक ही वजह हो सकती है कि कि दोनों के बीच सीटों को लेकर अभी तालमेल नहीं हो पाया है।












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