अनोखा स्कूल: यहां सिर्फ 8 बच्चों को पढ़ाने आते हैं 4 टीचर, महीने में खर्च होते हैं लाखों

शाहजहाँपुर। आज हम आपको एक ऐसा सरकारी स्कूल दिखायेंगे जहां बच्चे सिर्फ आठ हैं लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए चार चार सरकारी शिक्षक सहित 6 कर्मचारियों की तैनाती है। आठ बच्चों पर यहां हर महीने दो लाख से ज्यादा सरकारी खर्च किया जा रहा है। सर्व शिक्षा मिशन पर ये एक बड़ा सवाल है कि जिला बेसिक शिक्षा विभाग को इलाके में पढ़ाने के लिए बच्चे ही नहीं मिल रहें हैं। शायद पूरे सूबे में ये सिर्फ अकेला ऐसा स्कूल होगा जहां महज आठ बच्चों को शिक्षा दी जा रही है और उन पर बेसिक शिक्षा विभाग लाखों रूपया खर्च किया जा रहा है। फिलहाल जिला बेसिक शिक्षा विभाग का इस मामले में कुछ अलग ही तर्क पेश कर रहा है।

 पूरे सूबे में इकलौता है ऐसा अद्भुत स्कूल

पूरे सूबे में इकलौता है ऐसा अद्भुत स्कूल

मामला बण्डा ब्लाक के अजोधापुर प्राथमिक विद्यालय का है, जहां जिले में ही नही बल्कि पूरे सूबे में शायद ये ऐसे अकेला स्कूल होगा जहां महज आठ स्कूली बच्चे ही दाखिल है। इन आठ बच्चों को पढ़ाने के लिए यहां चार शिक्षक और दो रसोईयों की तैनाती भी है। यहां कक्षा एक में 2, कक्षा दो में 3, कक्षा तीन में एक भी छात्र नही, कक्षा चार में 1 और कक्षा पांच में 2 छात्र ही पंजीकृत हैं। इन आठ बच्चों पर महीने में सरकार का लाखों रूपया खर्च किया जा रहा है। ऐसे में बेसिक शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या विभाग को स्कूली बच्चे ही नही मिले यहां फिर बच्चों के माता-पिता को जागरूक करने में विभाग फेल साबित हुआ है। क्योंकि आंकड़ों की माने तो गांव में दो 150 से ज्यादा बच्चे है जो स्कूल जाने के बजाए खेती और घरेलू कामों में अपने परिवार का हाथ बंटाते है।

बच्चों को स्कूल लाने की कोशिश हो रही नाकाम

बच्चों को स्कूल लाने की कोशिश हो रही नाकाम

शिक्षा विभाग बच्चों के माता पिता को जागरूक करने के लिए तमाम रैलियां निकालता है लेकिन यहां विभाग की हर कोशिश नाकाम साबित हुई है। आप फोटो में देख सकते है कि एक शिक्षक महज एक ही छात्र को पढ़ा रहा है। ऐसे में अगर स्कूल में छात्रों की संख्या ज्यादा होती तो शायद एक साथ दर्जनों को बच्चों को यही शिक्षा हासिल हो सकती थी। लेकिन स्कूल के शिक्षक सिर्फ बच्चों के ना होने का रोना रो रहे हैं।

प्रिंसिपल नहीं दे रहें जवाब

प्रिंसिपल नहीं दे रहें जवाब

जब कम बच्चों के बारे मे हमने स्कूल के प्रिंसिपल अजय बहादुर सिंह से बात की तो वह कोई जवाब नही दे सके। उनके अलावा शिक्षका कुसुम और शिक्षक कमलेश से बच्चो के बारे में बात लेकिन वो भी कुछ नही बता पाए ऐसे मे सवाल इन शिक्षकों पर उठ रहा है। आखिर बच्चो को स्कूल तक लाने मे ये शिक्षक क्यों नही कामयाब हो पाए और साथ बच्चों के माता-पिता को जागरूक क्यों नही कर पाए।

हर साल लाखों खर्च करता है स्कूल

हर साल लाखों खर्च करता है स्कूल

सरकार की कोशिश रहती है हर बच्चा स्कूल जाए जिसके प्रचार प्रसार के लिए हर साल विभाग लाखों खर्च करता है। स्कूल में सिर्फ आठ बच्चे होने के सवाल पर जिला बेसिक शिक्षा विभाग का तक भी अनोखा है। उनका कहना है कि शिक्षकों के तबादलों पर कोर्ट की रोक है वरना उन्हे हटा दिया जाता। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी राकेश कुमार, स्कूल मे कम बच्चो के अनुसार ज्यादा टीचरों की जानकारी मेरे पास है। जुलाई मे हमने इनके लिए स्थानांतरण के लिए लिखा लेकिन हाईकोर्ट से सटे होने के कारण हो नही पाया था। इससे पूर्व इनके ट्रांसफर सर्टिफिकेट आए। लेकिन इससे पहले उनके हुए ट्रांसफर की जांच सहायक शिक्षक निदेशक बेसिक द्वारा की जा रही है जांच पूरी होने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौपेंगे।

शिक्षा के नाम पर हो रही है खानापूर्ति

शिक्षा के नाम पर हो रही है खानापूर्ति

देश में सभी के लिए शिक्षा का अधिकारी कानून लागू है और सरकार की भी यही कोशिश है कि देश के हर बच्चे को शिक्षा दी जाये। लेकिन इस स्कूल को देखकर यही लगता है कि यहां शिक्षा के नाम पर महज खानापूर्ति की जा रही है और शिक्षा के नाम पर लाखों रूपया पानी की तरह बहाया जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि इलाके के बच्चों और उनके अभिभावको को शिक्षा के लिए जागरूक किया जाये ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाया जाया सके।

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