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तक्षकेश्वर नाथ: जानें 5 हजार साल पुराने इस मंदिर का अद्भुत रहस्य

इलाहाबाद। संगम नगरी में यमुना किनारे अवस्थित सुप्रसिद्ध तक्षकेश्वर नाथ मंदिर विश्व का एकलौता तक्षक तीर्थ स्थल है। वर्तमान में यह स्थान दरियाबाद इलाके में आता है। यह स्थल आदिकाल से संरक्षित है और यहां शेषनाग के अवशेष आज भी मौजूद है। यह यमुना तट पर विशाल घने जंगलों में स्थापित शिवलिंग था। हालांकि भौतिकवाद में यहां अब जंगल का अस्तित्व खत्म हो गया है। प्रयागराज में इस स्थल को "बड़ा शिवाला" के नाम से ख्याति प्राप्त है। इस शिवलिंग की प्राचीनता और पौराणिकता स्वयं पुराणों में दर्ज है। पद्म पुराण के 82 पाताल खंड के प्रयाग महातम्य में 82वें अध्याय में तक्षकेश्वर नाथ का जिक्र मिलता है। मान्यता है कि कि इस मंदिर में भगवान शिव के का जो भी दर्शन कर लेता है उसे व उसके वंशजों को कभी सर्प नहीं डसता है। यानी वह सर्प विष बाधा से मुक्त हो जाता है।

तक्षकेश्वर नाथ की पौराणिक कथा

तक्षकेश्वर नाथ की पौराणिक कथा

मंदिर के पुजारी श्री रवि शंकर जी इस मंदिर की पौराणिकता का वृतांत सुनाते हुए बताते हैं कि तक्षकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास 5000 साल से भी ज्यादा पुराना है। जिसका जिक्र पद्म पुराण के 82 पाताल खंड के प्रयाग महातम्य में 82वें अध्याय में मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा परीक्षित को तक्षक नाग ने डसा था, तो उसी के प्रायश्चित में इन पांचों मूर्तियों को स्थापित किया गया था और वरदान दिया गया था कि जो कोई भी इस मंदिर में जाकर दर्शन करेगा, उसके वंशजों को कभी सर्प की विष बाधा नहीं होगी। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान कृष्ण द्वारा मथुरा से भगाये जाने के पश्चात तक्षक नाग ने इसी स्थान पर वास किया था, जो तक्षक कुंड के नाम से जाना जाता है। पुराणों में बताया गया है कि तक्षक संपूर्ण सर्पजाति के स्वामी हैं कलयुग में श्री तक्षक ही प्रमुख है और आदिकाल से यह धर्म की राजधानी तीर्थराज प्रयाग में निवास कर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि काल सर्पयोग शांति, राहु की महादशा, नागदोष एवं विष बाधा से मुक्ति का मुख्य स्थान तक्षकेश्वर नाथ प्रयाग ही है।

 आधुनिक युग का वृतांत

आधुनिक युग का वृतांत

प्रयागराज में तक्षकेश्वर नाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का क्रम 1992 में भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी के प्रयास से शुरू हुआ तो यहां खुदाई में पौराणिक काल के कुछ अवशेष प्राप्त हुये थे। 20 जनवरी 1992 को खुदाई के दौरान कई पत्थर और प्राचीन मूर्तियां यहां मिलीं और उन पर पर बारीक नक्काशी मौजूदा मानव सभ्यता से भी प्राचीन बताई गई। पुरातत्व विभाग ने भी यहां पत्थरों का अवलोकन किया और अति प्राचीन सभ्यता की कृति होने के कारण आज भी उस पर शोध जारी है।

मूर्ति हुई थी चोरी

मूर्ति हुई थी चोरी

मंदिर के पुजारी श्री रवि शंकर जी बताते हैं कित्ता सन 1981 में श्री तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में चोरी हुई। चोर माँ दुर्गा की मूर्ति उठा ले गये थे। वह मूर्ति दशवीं शताब्दी में अष्टधातु से बनी थी और उसकी लंबाई साढ़े तीन फीट की थी। चोरी होने के बाद 7 जून 1981 को पालम हवाई अड्डा पर यह मूर्ति उस वक़्त तस्कर के साथ बरामद हुई जब इस मूर्ति को न्यूयॉर्क में बेचने के लिए ले जाया जा रहा था। तत्कालीन समय में मूर्ति की कीमत 1 करोड़ रुपये में तय हुई थी।

सांप टहलते रहते हैं

सांप टहलते रहते हैं

स्थानीय लोग बताते हैं कि दो दशक पहले तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में यहां सांपों का आना जाना अत्याधिक बढ़ जाता था। लेकिन, सांप किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते थे। बस शिव दर्शन के बाद यह वापस लौट जाते थे। हालांकि वर्तमान समय में भी यहां सांपो का दिखना बेहद ही सामान्य घटना है। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से कालसर्प दोषों से मुक्ति मिलती है।

ऐसा है स्वरूप

ऐसा है स्वरूप

तक्षकेश्वर नाथ मन्दिर इलाहाबाद शहर के दक्षिणी क्षेत्र में दरियाबाद मुहल्ले में यमुना नदी के किनारे स्थित है। इस मन्दिर से थोड़ी दूर पर यमुना नदी में तक्षक कुण्ड् भी स्थित है। तक्षकेश्वर महादेव के लिंग के चारों ओर तांबे का अर्घ्य बना है। लिंग के ऊपर नागदेवता है। मन्दिर में गणेश, पार्वती व कार्तिकेय की छॊटी-छॊटी प्रतिमाएं हैं। बाहर नन्दी हैं। परिसर में हनुमान जी की मूर्ति है।

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