कांग्रेस का बेस वोट बैंक न होने से बैक फायर कर गई प्रियंका गांधी की रणनीति ?
लखनऊ, 21 मार्च: उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुका है। बीजेपी को जहां इस चुनाव ने शानदार सफलता मिली है वहीं कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को राज्य की 403 विधानसभा में केवल 2 सीटों पर जीत हासिल कर पाई है। कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार अपनी रणनीति के हिसाब से काम कर रहीं थीं लेकिन चुनावी रणनीति काम नहीं आई। विधानसभा चुनाव में आए नतीजों के बाद रणनीतिकारों की माने तो यूपी में कांग्रेस का कोई बेस वोट बैंक न होने की वजह से प्रियंका की रणनीति बैकफायर कर गई जिसका परिणाम कांग्रेस को भुगतना पड़ा। यूपी में जब तक कांग्रेस अपना बेस वोट नहीं तैयार करेगी तब तक उसका खड़ा होना काफी मुश्किल है।

यूपी में कांग्रेस खो चुकी है अपना बेस वोट बैंक
उत्तर प्रदेश चुनाव देश का सबसे बड़ा चुनाव होता है। 23 करोड़ की आबादी वाले राज्य में चुनाव लड़ना है तो आपके पास बेस वोट बैंक होना काफी जरूरी है। बिना बेस वोट बैंक के चुनाव लड़ना और जीतना एक तरह से असंभव है। यही स्थिति इस समय यूपी में कांग्रेस की है। एक समय था जब कांग्रेस के कोर वोटर हुआ करते थे लेकिन समय के साथ ही कांग्रेस कमजोर होती चली गई और उनका कोर वोटर दूसरी पार्टियों में शिफ्ट हो गया। प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में पश्चिम से लेकर पूरब तक कड़ी मेहनत करने में जुटी हुई हैं लेकिन उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जा रहा है क्योंकि उसके पास अपना कोर वोटर नहीं है। प्रियंका हर जिले में कांग्रेस को खड़ा करने में तो कामयाब हो रहीं हैं लेकिन पार्टी अपने बेस वोटर पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रही है जिसकी वजह से उसे चुनाव दर चुनाव निराशा हाथ लग रही है।

बीजेपी, सपा, बीएसपी के पास है अपना कोर वोट
यूपी के चुनाव में एक तरफ जहां कांग्रेस के पास बेस वोट बैंक का अभाव है वहीं दूसरी ओर बीजेपी, एसपी, बीएसपी के पास उनका अपना कोर वोटर है जो हर परिस्थिति में पार्टी का साथ देता है। उदाहरण के तौर पर देखें तो 2014 के लोक सभा चुनाव में बीएसपी को भले ही एक भी सीट नहीं आई लेकिन उस बुरे दौर में भी मायावती का कोर वोटर पार्टी को छोड़कर नहीं गया। बीएसपी के पास जहां दलित के तौर पर एक बेस वोट बैंक है जिसके सहारे वो चुनाव में ताल ठोंकती है। उसी तरह अखिलेश यादव के साथ यादव वोट बैंक है। ये ऐसा बेस वोट है जिसमे सेंधमारी करना किसी के लिए भी आसान काम नहीं है। इसी तरह बीजेपी ने गैर यादव ओबीसी, ब्राह्मण, ठाकुर, भूमिहार, पटेल और निषाद के अलावा छोटी छोटी जातियों का वोट बैंक तैयार कर लिया है जिसकी वजह से वो विरोधियों से इस मामले में काफी आगे दिखाई देती है और यही बीजेपी की सफलता की यूएसपी भी है।

मुस्लिम, ब्राह्मण, ठाकुर और दलित कभी कांग्रेस का कोर वोटर था
उत्तर प्रदेश में एक समय था जब राम मंदिर आंदोलन या यूं कहें कि 90 के दशक में कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था। योगी सरकार ने 37 साल बाद जिस रिकॉर्ड को तोड़ा है वो कांग्रेस के ही नाम था। ये रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश में एक ही पार्टी की बैक टू बैक सरकार बनाने का था। तब कांग्रेस के पास के बेस वोट बैंक हुआ करता था जिसका तोड़ निकलना विरोधियों के लिए आसान नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र अग्रिहत्री कहते हैं कि, 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन से पहले ब्राह्मण, ठाकुर, मुस्लिम और दलित ये कांग्रेस का बेस वोट बैंक हुआ करते थे। मंदिर आंदोलन और मंडल कमंडल की राजनीति ने कांग्रेस का काफी नुकसान किया और ये सारे वोट बैंक खिसकते चले गए। इसके अलावा गठबंधन की राजनीति ने भी कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया। कांग्रेस का वोट बैंक एक बार खिसका तो अब तक जुड़ नही पाया है, जिसका खामियाजा कांग्रेस आज तक भुगत रही है।

लोकसभा 2019 के बाद से ही सक्रिय थीं प्रियंका
उत्तर प्रदेश चुनाव में यूं तो इस बार कांग्रेस के पास करने के लिए बहुत कुछ था लेकिन उसको वो परिणाम हासिल नहीं हुआ जैसी उसे आशा थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका को पश्चिम का प्रभार सौंपा गया था। प्रियंका ने इस दौरान सड़क पर उतरकर काम तो किया लेकिन सारी कहानी बेस वोट बैंक पर ही आकर अटक गई। चुनाव के नतीजे आए और कांग्रेस सिर्फ रायबरेली सीट बचाने में सफल रही। इसके बाद प्रियंका को समय रहते ही उत्तर प्रदेश का प्रभार सौप दिया गया। प्रभार मिलने के बाद प्रियंका गांधी ने संगठन में कई तरह के बदलाव किए। प्रदेश अध्यक्ष तक बदला गया। यहां तक की चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने महिलाओं को 40 फीसदी टिकट देने का बड़ा ऐलान किया। इसके आलावा भी कई लोक लुभावने वादे किए गए लेकिन कोई भी वादा कांग्रेस की किस्मत चमकाने में असफल साबित हुआ। इसकी वजह बेस वोट बैंक का न होना ही था। राजनीतिक पंडितों की माने तो सबसे पहले कांग्रेस को अपने बेस वोट बैंक पर फोकस करना होगा क्योंकि बिना इसके यूपी में कांग्रेस की वापसी की कल्पना करना मुश्किल है।












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