कांगेस के पुराने गढ़ बुंदेलखंड में सियासी जमीन तलाशने में जुटीं प्रिंयका गांधी, जानिए कितनी बची हैं संभावनाएं

लखनऊ, 17 नवंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले बुंदेलखंड में भी सभी सियासी पार्टियां जोर लगा रही हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने अपनी सोची समझी रणनीति के तहत ही चित्रकूट के रामघाट पर महिलाओं के साथ संवाद किया। इस कार्यक्रम के कई सियासी मायने हैं। यूं कहें तो जिस बुंदेलखंड में नब्बे के दशक में कभी कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था अब वो कांग्रेस से काफी दूर जा चुकी है। जातीय समीकरणों के सहारे बीजेपी ने इस गढ़ में अपनी अच्छी पैठ बना ली है। लेकिन चुनौतियों के बीच प्रियंका गांधी बुंदेलखंड में अपनी खोई हुई जमीन की तलाश में जुटी हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि बुंदेलखंड में अब कांग्रेस के लिए कितनी संभावनाएं बची हैं।

 चित्रकूट के रामघाट पर महिलाओं के साथ प्रियंका ने किया संवाद

चित्रकूट के रामघाट पर महिलाओं के साथ प्रियंका ने किया संवाद

प्रियंका ने महिलाओं के साथ संवाद में कहा कि, ''आपके लिए कोई और संघर्ष करने नहीं आएगा यह लड़ाई हम बहनों को हम महिलाओं को खुद ही लड़नी होगी। महिला का संघर्ष उसका अपना संघर्ष होता है न, उसे अपनी शक्ति पहचानी होती है शक्ति के बल पर संघर्ष करना होता है। मैंने इसीलिए कहा कि 40% महिलाओं को राजनीति में आना चाहिए और इस विधानसभा चुनाव में रहते हैं जब तक महिलाएं आपकी तरह राजनीति में नहीं आएगी जब तक आगे नहीं बढ़ेंगे। जब तक आपके यहां से विधानसभा में महिला नहीं पहुंचेगी तब तक आपके दुख दर्द को जानने वाला कोई नहीं होगा आप के पक्ष में नीतियां बनाने वाला कोई नहीं होगा।''

नब्बे के दशक में कांग्रेस का था दबदबा

नब्बे के दशक में कांग्रेस का था दबदबा

दरअसल, नब्बे के दशक तक बुंदेलखंड में कांग्रेस का दबदबा था, बाद में इस क्षेत्र पर सपा और बसपा का कब्जा रहा। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में यहां की सभी सीटों पर बीजेपी का कब्जा था। अब प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक गढ़ को फिर से हासिल करने की पुरजोर कोशिश कर रही है। कांग्रेस पार्टी द्वारा पूर्व में निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रियंका गांधी को भगवान राम की पावन भूमि चित्रकूट से कांग्रेस पार्टी की चुनावी जीत का बिगुल फूंकना था।

प्रियंका गांधी को कैश नहीं करा पा रही कांग्रेस

प्रियंका गांधी को कैश नहीं करा पा रही कांग्रेस

बुंदेलखंड की राजनीति को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र कृष्ण तिवारी ने कहा कि, '' इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुंदेलखंड में प्रियंका गांधी काफी मेहनत कर रही हैं। दरअसल कांग्रेस अपने संगठन की कमी की वजह से राष्ट्रीय नेताओं के दौरों को कैश नहीं करा पा रहा है। रही सही कसर जातीय गणित पूरी कर दे रही है। अभी बुंदेलखंड में सपा और बीजेपी में ही टक्कर है। उसके बाद बसपा का नंबर है। कांग्रेस यहां चौथे स्थान पर है। अपने लिए जनाधार की तलाश में जुटी प्रियंका के लिए बुंदेलखंड में फिलहाल संभावनाएं न के बराबर हैं। बुंदेलखंड में जिला और बूथ लेवल पर संगठन पूरी तरह से कमजोर है इसलिए प्रियंका की मेहनत का सार्थक परिणाम नहीं मिल पा रहा है।''

कांग्रेस को भरोसा- महिलाओं का होगा कांग्रेस से जुड़ाव

कांग्रेस को भरोसा- महिलाओं का होगा कांग्रेस से जुड़ाव

कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना ​​है कि प्रियंका गांधी के 40 फीसदी चुनावी टिकट देने की घोषणा के बाद से महिलाओं को अपनी पार्टी से खास जुड़ाव महसूस होने लगा है। इसलिए यहां रामघाट पर महिलाओं की भारी भीड़ के साथ कांग्रेस महासचिव के संवाद की तैयारी की गई थी। साथ ही भाजपा के धार्मिक कार्ड को टक्कर देने के लिए धार्मिक महत्व के स्थानों पर प्रियंका गांधी की उपस्थिति दर्ज कराने की योजना भी तैयार की गई है।

 पिछले चुनाव में बीजेपी ने जीतीं 19 विधानसभा सीटें

पिछले चुनाव में बीजेपी ने जीतीं 19 विधानसभा सीटें

गौरतलब है कि साल 2017 में बुंदेलखंड क्षेत्र की सभी 19 विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी। बुंदेला योद्धाओं की भूमि के मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए कांग्रेस ने कई रणनीतियां बनाई हैं। कांग्रेस इस क्षेत्र की उन सीटों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित कर रही है जहां पार्टी की स्थिति उसके विश्लेषण में मजबूत है; इनमें झांसी सदर, गरौठा, ललितपुर सदर सीट, उरई, कालपी, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट सदर सीट शामिल हैं।

बुंदेलखंड में कांग्रेस की कामयाबी काफी मुश्किल

बुंदेलखंड में कांग्रेस की कामयाबी काफी मुश्किल

हालांकि बुंदेलखंड में कांग्रेस की कामयाबी की योजना को साकार करना बेहद मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषक कुमार पंकज के अनुसार नब्बे के दशक के मंडल और मंदिर युग के दौरान बुंदेलखंड पर सपा-बसपा और भाजपा की पकड़ मजबूत हो गई, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस के पारंपरिक मतदाता इन पार्टियों में चले गए। अब उन्हें अपने खेमे में वापस लाना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। साथ ही दिग्गज क्षेत्रीय नेताओं को पार्टी से अलग होने से रोकना भी कांग्रेस के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं है।

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