कॉमन सिविल कोड को लेकर गरमाई सियासत, 2024 के लिए अभी से एजेंडा सेट करने में जुटी है BJP ?
लखनऊ, 25 अप्रैल: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद अब अचानक यह मांग उठी है कि देश के सभी राज्यों में समान आचार संहिता (कॉमन सिविल कोड) लागू किया जाना चाहिए। यूपी में भी इसको लेकर कई नेता आवाज उठा चुके हैं। सबसे पहले प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुखिया शिवपाल यादव ने अचानक इसका राग छेड़ दिया। उसके बाद बीजेपी के वरिष्ठ नेता और डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने भी कॉमन सिविल कोड लागू किए जाने क वकालत की। आखिर अचानक देश में कॉमन सिविल कोड की मांग ने क्यों जोर पकड़ लिया है। क्या कॉमन सिविल कोड से देश के मुसलमानों का नुकसान होगा या फायदा। इन बातों को लेकर कई तरह का भ्रम पैदा हुआ है। इस बीच कई राजनीतिक पंडितों ने भी इसकी वकालत करते हुए कहा है कि इससे मुस्लिम समाज को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा।

गृहमंत्री ने दिए थे कॉमन सिविल कोड लागू करने के संकेत
दरअसल, देश के गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भोपाल दौरे के दौरान देश के सभी राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने के संकेत दिए। इसके बाद से उत्तर प्रदेश में भी माहौल बनने लगा है। उत्तर प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भी समान नागरिक संहिता लागू होनी चाहिए। क्या अमित शाह का संकेत अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में माहौल गरमाने को लिए उठाया गया है या वाकई मोदी सरकार इसको लेकर गंभीर है। कुछ लोगों का मानना है कि अगले आम चुनाव से पहले देश में कॉमन सिविल कोर्ड लागू हो सकता है।

कॉमन सिविल कोड पर केशव मौर्य का बयान
डिप्टी सीएम केशव प्रयाद मौर्य ने कहा है कि ''हर कोई कॉमन सिविल कोड की मांग कर रहा है। मैं इसका स्वागत करता हूं। उन्होंने लखनऊ में मीडिया से बात करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार भी इस दिशा में विचार कर रही है। हम इसके समर्थन में हैं। यह उत्तर प्रदेश और देश के लोगों के लिए भी जरूरी है।" डिप्टी सीएम ने यह भी कहा कि कॉमन सिविल कोड का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख वादों में से एक है। डिप्टी सीएम के इस बयान पर सियासत गरमा गई है. उत्तराखंड की बीजेपी सरकार ने इस दिशा में काम शुरू कर दिया है. ऐसे में डिप्टी सीएम के बयान से साफ है कि यूपी में भी इस दिशा में काम शुरू हो रहा है या होने वाला है।

उत्तराखंड सरकार ने किया है समिति बनाने का फैसला
फिलहाल यह कानून सिर्फ एक राज्य में लागू है। देश का यह राज्य है गोवा। इसे पुर्तगाली शासन के दौरान ही लागू किया गया था। 1961 में, कॉमन सिविल कोड के साथ गोवा सरकार का गठन किया गया था। सामान्य नागरिक संहिता पर कार्रवाई शुरू करने वाला उत्तराखंड दूसरा राज्य बन गया है। वहां पुष्कर सिंह धामी सरकार ने शपथ लेने के बाद कैबिनेट बैठक में इसके लिए कमेटी बनाने का फैसला किया। यह कमेटी राज्य में कॉमन सिविल कोड लागू करने का मसौदा तैयार करेगी।
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क्या 2024 के लिए अभी से एजेंडा सेट करने में जुटी है बीजेपी
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो कॉमन सिविल कोड को लेकर जो माहौल गरमाया जा रहा है वह नाहक ही नहीं है। इसके पीछे बीजेपी और आरएसएस की सोची समझी रणनीति काम कर रही है। बीजेपी कॉमन सिविल कोर्ड का माहौल बनाकर हिन्दुओं के एक वर्ग में यह परेशप्सन बनाना चाहती है कि यह मुसलमानों के खिलाफ है। यही कार्य धारा 370 हटाने से पहले किया गया। प्रोफेसर मनीष हिन्दवी कहते हैं, '' कॉमन सिविल कोड का शिगूफा 2024 के लिए छोड़ा जा रहा है। बीजेपी अगला आम चुनाव राम मंदिर निर्माण और कॉमन सिविल कोड पर ही लड़ेगी। बीजेपी के एजेंडे में पहले राम मंदिर और धारा 370 और जैसे मुद्दे थे जो हल हो चुके हैं। कॉमन सिविल कोड हटाने का शिगूफा छोड़कर वह सियासी तापमान नापने में लगी हुई है। निश्चित तौर पर पीएम मोदी तीसरी बार पीएम बनकर एक बड़ी लकीर खींचने का प्रयास कर हैं और यह उसी की एक्सरसाइज है। कॉमन सिविल कोड में किसी के नुकसान की तो बात ही नहीं है। इससे एक निशान और एक विधान की बात है।''

कॉमन सिविल कोड क्या मुस्लिम के हित में होगा ?
कॉमन सिविल कोड (यूसीसी) एक ऐसा कानून है जो विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने जैसे मामलों में सभी धार्मिक समुदायों पर लागू होगा। संहिता संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत आती है, जो यह बताती है कि भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा। वहीं यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक परवेज अहमद कहते हैं, " उत्तर भारत के मुसलमानों से गुजारिश है- "कॉमन सिविल कोड" की पैरवी शुरू करें। जो मुसलमान (5 हज़ार रुपया वाला) विद्वान टीवी पर बिल का विरोध करे, उसका व उस खबरिया चैनल के बहिष्कार की मेहरबानी करें। ड्राफ्ट नहीं बना है पर दूर दृष्टि डालिये ये बिल मुस्लिम हित में होगा।"












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