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मिसाल: उत्तर प्रदेश पुलिस की छवि बदलने में लगी युवा पुलिसकर्मियों की टीम

ये युवा पुलिसकर्मी रात को रास्तों पर निकलते हैं और जरूरतमंदों को तलाशकर उनकी मदद करते हैं। ये यूपी पुलिस की छवि को बदलना चाहते हैं।

झांसी। रात को 2 बज रहे थे। ठण्ड बहुत थी। सड़क के किनारे एक बुजुर्ग महिला बीमारी से कराह रही थी। इसकी सूचना कुछ युवाओं को मिली। मौके पर एम्बुलेंस लेकर गये। महिला को उठाकर अस्पताल पहुंचाया। जरूरत पड़ने पर उसे ब्लड भी डोनेट किया। ये युवा झांसी के पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं। आम लोगों के बीच पुलिस की छवि इतनी अच्छी नहीं है, लेकिन झांसी के युवा पुलिसकर्मियों के बारे में जान आपका नजरिया बदल सकता है। इनको लोगों की तारीफें और दुआएं मिल रही हैं। Read Also: वाराणसी: मेंटली चैलेंज्ड बच्चों के लिए वरदान बने ये दो दिव्यांग दोस्त

पुलिस के प्रति लोगों का नजरिया बदलने का मिशन

पुलिस के प्रति लोगों का नजरिया बदलने का मिशन

ये पुलिसकर्मी अक्सर रात में निकलते हैं। कुछ जरूरत का सामान, खाना, कपड़े, कम्बल आदि साथ रखते हैं। कोई जरूरतमंद दिखता है तो उसे दे देते हैं। टीम का हर सदस्य अपना जन्मदिन गरीब बच्चों के साथ ही मनाता है। कोई गरीब सड़क के किनारे बीमारी की हालत में है तो उसे अस्पताल में भर्ती कराते हैं। उसे बचाने के लिए ब्लड तक दान करते हैं। अब झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने की योजना बना रहे हैं। इस परोपकारी टीम के सदस्य जितेन्द्र यादव कहते हैं कि हम चाहते हैं लोगों का नजरिया पुलिस के प्रति बदले। जब भी समय मिलता है तो लोगों के लिए निकल पड़ते हैं। वह कहते हैं कि अक्सर उनकी टीम रात में निकलती है। उनका मानना है कि ऐसे जरूरतमंदों को तलाशना है जिनके पास ओढ़ने, पहनने, खाने को नहीं और इसके लिए रात से बेहतर समय नहीं हो सकता है।

'उम्मीद रौशनी की' संस्था बनाकर कर रहे काम

'उम्मीद रौशनी की' संस्था बनाकर कर रहे काम

झांसी के पुलिस विभाग में जितेन्द्र यादव डीआईजी कार्यालय से सम्बद्ध हैं। डकोर के रहने वाले जितेन्द्र पांच साल से पुलिस में हैं। वह कहते हैं कि जब पुलिस में नहीं थे, तब पुलिस के लिए कभी अच्छा नहीं सुनते थे। वह नजरिया बदलना चाहते हैं। वह हमेशा से गरीबों की मदद करना चाहते थे। इसी मकसद के साथ उन्होंने 'उम्मीद रौशनी की' नामक संस्था बनाई। बताते हैं कि पुलिस में रहते हुए संस्था बनाने से कोई दिक्कत न हो, इसलिए संस्था को अपने भाई के नाम कर दिया। वह एक तरह से संस्था को सपोर्ट करते हैं।

जितेन्द्र बताते हैं कि वह और उनके तीन साथी हैं - हरीश कुमार, वीर सिंह, रफीकउद्दीन। सभी पुलिस की नौकरी में होते हुए भी हमेशा उनके साथ होते हैं। अच्छे काम को ये लोग बांटते हैं। इसके साथ ही 30 से 40 अन्य युवाओं की टीम है जो उनसे जुड़ी है। जीतेन्द्र बताते हैं कि गरीबों की मदद के लिए वह अपनी सैलरी से हर माह एक-एक हज़ार रुपये जुटाते हैं। इसे संस्था के अकाउंट में जमा करते हैं। फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप पर ग्रुप बनाए हैं। इस माध्यम से कई लोगों ने उन्हें गरीबों के लिए आर्थिक मदद दी है।

इस तरह करते हैं ये लोगों की मदद

इस तरह करते हैं ये लोगों की मदद

'उम्मीद रौशनी की' के बैनर तले ये युवा पुलिसकर्मी बहुत लोगों की दुआएं हासिल कर चुके हैं। कई बार सड़क किनारे बीमार हालत में गरीब पड़े रहते हैं। अगर ऐसे किसी मरीज की सूचना पुलिसकर्मियों को मिलती है तो तुरंत ही यह टीम पहुंचती है। कितनी भी बुरी हालत क्यों न हो, उसे उठाकर अस्पताल ले जाते हैं। टीम के सदस्य व उनके साथ नौकरी करने वाले रफ़ीक बताते हैं कि कुछ दिन पहले उन्हें एक बुजुर्ग बीमार महिला के पड़े होने की सूचना मिली। लोग उनसे दूर भाग रहे थे। इसकी परवाह न कर उन्होंने महिला को उठाया और उसे अस्पताल पहुंचाया। सोमवार की रात ही एक ऐसे ही व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में उसकी मौत हो गयी। उसके अंतिम संस्कार के लिए रुपये दिए।

गरीबों का कराते हैं फ्री इलाज

गरीबों का कराते हैं फ्री इलाज

पुलिस में ही जॉब करने वाले उनकी टीम के सदस्य वीर सिंह व हरीश बताते हैं कि वह चिकित्सा कैंप लगवाते हैं. इसमें गरीबों को फ्री में देखा जाता है। उन्हें दवाइयां दी जाती हैं। इसके साथ ही गरीब बच्चों को जरूरत की चीजें देते हैं। ठण्ड आ गयी है, इसलिए हाल ही में गर्म कपड़े दिए। खाना भी ले जाते हैं, ताकि कोई भूखा हो तो दे सकें। वह बताते हैं कि टीम के सदस्य अपना जन्मदिन गरीब बच्चों के साथ ही मनाते हैं। बच्चों के लिए खाने पीने के सामान व गिफ्ट ले जाते हैं।

टीम के अहम् सदस्य जितेन्द्र बताते हैं कि वह डेढ़ साल से ये सब इसलिए कर रहे हैं ताकि समाज का पुलिस के प्रति नजरिया बदल सके। पब्लिक को लगे कि संवेदनाएं पुलिस विभाग में भी होती हैं। हमेशा गालियां देते सुना है, लेकिन पुलिस दुआओं की हक़दार भी है। अब वह कुछ गरीब बच्चों को पढाये जाने की योजना बना रहे हैं।

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