वाराणसी: मेंटली चैलेंज्ड बच्चों के लिए वरदान बने ये दो दिव्यांग दोस्त
संतोष और बबलू अपने गांव में एक स्कूल चला रहे हैं जहां दिव्यांग बच्चों को मुफ्त में शिक्षा दी जाती है और उनको फ्री में खाना भी मिलता है।
वाराणसी। पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के आयर गांव में दो दिव्यांग दोस्त संतोष और बबलू ने बिना सरकारी मदद के दिव्यांग बच्चों के भविष्य को संवारने का बीड़ा उठाया है। ये वो बच्चे हैं जिनका मेंटली और फिजिकली, दोनों तरह से डेवलपमेंट नहीं हुआ है। इन दोनों के लिए सबसे बड़ा चैलेंज 28 साल की सुमन है, जिसका फिजिकली और मेंटली डेवलपमेंट बहुत ही कम हुआ है। अपनी मेहनत के दम पर दोनों ने अंग्रेजी-हिंदी अक्षरों का ज्ञान सुमन को दिया है। इतना ही नहीं, यहां शिक्षा के साथ फ्री में खाना भी दिया जाता हैं। Read Also: पीएम नरेंद्र मोदी के क्षेत्र का पहला कैशलेस गांव, कार्ड से कर रहे लोग पेमेंट

अपने दर्द ने कराया ये काम
संतोष ने विकलांगता के जीवन के दर्द को महसूस किया और छोटे से परचून की दुकान से बच्चों के लिए स्कूल चलाने का सपना बुना। वे गांव में लीज की जमीन पर स्कूल खोलकर 100 से ऊपर बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। इनमें लगभग 20 बच्चे दिव्यांग हैं। उनका मकसद है कि यहां आने वाले बच्चे के जीवन के लिए गरीबी और विकलांगता अभिशाप न बने। खुद के साधन से विकलांग बच्चों को स्कूल लाया जाता है। उसकी लगन को देखते हुए आयर गांव की कई महिलाएं भी इस स्कूल में नि:शुल्क पढ़ाने आती हैं। यह स्कूल लोगों और संस्थाओं की मदद से चलता है। कुछ संस्थाए बच्चों के लिए पढ़ाई का सामान देती हैं।

ऐसे मिला संतोष को स्कूल का आइडिया
संतोष ने बताया कि गरीबी के चलते बड़ी मुश्किल से इंटर तक पढाई हो पायी। पिता बुनकरी कर परिवार चलाते थे और मेरे लिए गांव में ही छोटी सी परचून की दुकान खुलवा दी। सन 2011-12 में गांव में ही छोटी सी जमीन पर बच्चों को अकेले पढ़ाना शुरू किया। विकलांग होने की वजह से अपने जैसे बच्चों को ही खोजकर उन्हें पढ़ाना शुरू किया। बच्चों की पढाई के लिए ट्रैक्टर लोन पर खरीदा। खेतों में काम करना शुरू किया पर कर्ज ना भर पाने पर टैक्टर भी जब्त हो गया पर मैंने साहस नहीं छोड़ा।

'बच्चों के स्कूल के लिए भीख तक मांगी'
संतोष ने कहा कि इन बच्चों के लिए भीख तक मांगी फिर आइडिया आया और 2015 में ही एक हजार के किराये पर लीज पर जमीन लेकर यह स्कूल खोला जो आज आपके सामने है। इस स्कूल में गरीब बच्चों को फ्री में पढ़ाया जाता है और पढ़ाई का सामान मुहैया कराया जाता है। साथ में इंटरवल में भोजन की भी व्यवस्था है। हमारे स्कूल में ऐसे भी बच्चे हैं जिनके अभिभावक सक्षम हैं तो फीस के रूप में 50 रुपये देते हैं, जिससे मदद हो जाती है।

संतोष के मार्गदर्शन पर बबलू
बबलू ने बताया विकलांग होने की वजह से जीने का रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा था पर संतोष के दृढ़ निश्चय से जिंदगी में एक नई राह खुल गयी है। मेरे दोस्त की लगन और कुछ ग्रामीणों की मदद से यह स्कूल बन कर तैयार हो पाया है। हमारे यहां आज सिलाई प्रशिक्षण, कम्प्यूटर के साथ ही मेंटली चैलेंज्ड बच्चों को अलग से पढ़ाया जाता है।
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