फूलपुर उपचुनाव : भाजपा प्रत्याशी तय करेगा कि कौन बनेगा विपक्ष का कैंडिडेट
इलाहाबाद। फूलपुर लोकसभा का नया सांसद कौन होगा? कौन किसे पटकनी देगा और अबकी बार किसकी गणित सटीक बैठेगी? आपके जेहन में यही सवाल फिलहाल गूंज रहे होंगे लेकिन आपने जरा सोचा कि इस वक्त राजनैतिक पार्टियों के भीतर क्या चल रहा है? नहीं न, तो हम आपके के लिये अपनी इस विशेष रिपोर्ट में अंदर की पूरी जानकारी ले आये हैं। जिसका सार है - भाजपा का ढूंढना है काट, इसलिये विपक्ष जोह रही प्रत्याशी की बाट।

भाजपा ने बढ़ाई दलों की धड़कन
इलाहाबाद की फूलपुर लोकसभा में विपक्ष का कैंडिडेट सत्तारूढ़ भाजपा के प्रत्याशी से ही तय होगा, ऐसा माना जा रहा है। भाजपा जिस गणित से अपना प्रत्याशी घोषित करेगी, उस गणित की काट जिस प्रत्याशी के अंदर होगी उसे विपक्ष अपना कैंडिडेट बनाएगा। भाजपा जानबूझकर अपने प्रत्याशी का नाम देरी से घोषित कर रही है ताकि विपक्ष को तैयारियां करने का मौका ना मिले, साथ ही वह प्रत्याशियों के बीच अंतर्कलह से जूझे। भाजपा की इसी देरी ने अब विपक्षी दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। हलांकि भाजपा की यह देरी उसके लिए खुद भी परेशानी का सबब है लेकिन विपक्षियों की नब्ज टटोल रही भाजपा संगठन खुद ऐसा मैच जिताऊ और टिकाऊ खिलाड़ी क्रीज पर उतारना चाहती है, जो केशव की तरह रिकार्ड तोड़ जीत भले ही न हासिल करे, लेकिन केशव की छोड़ी सीट को फिर से वापस ला सके और दुबारा फूलपुर में कमल का फूल खिला सके।

टारगेट सिर्फ जातिगत समीकरण
फूलपुर लोकसभा में जो सबसे पहली गणित होती है वह जातिगत समीकरण में बनती है। ऐसे में विपक्ष के सभी दल भाजपा के इसी जातिगत समीकरण पर नजर बनाए हुए हैं। विपक्ष भाजपा प्रत्याशी के जातिगत वोट बैंक को टारगेट करेगा और ठीक उसके विपरीत वह दूसरे जातिगत वोट बैंक को अपनी ओर मोड़ने के लिए प्रत्याशी उतारेगा। इसका सीधा सा मतलब है कि जब तक भाजपा अपना प्रत्याशी घोषित नहीं करेगी तब तक विपक्ष का कोई भी दल अपने पत्ते नहीं खोलने वाला है। भाजपा जो भी जातिगत समीकरण अपने प्रत्याशी के माध्यम से बनाएगी उसे बिगाड़ने और साथ ही दूसरी जाति के समीकरण को अपनी ओर मोड़ने के लिए विपक्ष अपनी पूरी ताकत झोंक देगा।

क्या है रणनीति
विपक्ष ने जो समीकरण तैयार किए हैं उसके अनुसार फूलपुर लोकसभा सीट से अगर भाजपा ब्राम्हण वोट बैंक को साधने के लिए ब्राह्मण प्रत्याशी घोषित करती है, तब विपक्ष बैकवर्ड प्रत्याशी उतारेगा। अगर भाजपा बैकवर्ड प्रत्याशी मैदान में उतरता है तब विपक्ष अपना दांव ब्राम्हण प्रत्याशी पर लगाएगा। वहीं अगर भाजपा दलित कार्ड से इस सीट को साधने का प्रयास करेगी तब विपक्ष बैकवर्ड प्रत्याशी के सहारे मैदान में उतरेगा। दरअसल यह सारा समीकरण मौजूदा विपक्षी दलों का है और उनके संगठन की चल रही बैठकों में इन्हीं बिंदुओं पर अभी चर्चा हो रही है। विपक्ष के सभी दलों ने अलग-अलग जातिगत समीकरण वाले प्रत्याशियों की सूची एकत्रित कर ली है और अब उन नामों पर चर्चा भी लगभग पूरी हो गई है। अब इंतजार है तो सिर्फ भाजपा के प्रत्याशी घोषित करने का। भाजपा जैसे ही अपना प्रत्याशी घोषित करेगी विपक्ष उसकी काट में जातिगत समीकरण बैठाने वाले प्रत्याशी का नाम सामने रखेगा । इस बाबत जब सपा के जिलाध्यक्ष कृष्णमूर्ति यादव से बात की गई तो उन्होंने भी यह साफ कहा कि हम भाजपा प्रत्याशी के घोषित हो जाने के बाद अपना प्रत्याशी घोषित करेंगे। अगर भाजपा पटेल, मौर्य, कुशवाहा प्रत्याशी उतारेगी तो हम ब्राम्हण प्रत्याशी पर दांव लगाएंगे ।

क्या है फूलपुर सीट पर जीत के मायने
भाजपा के कब्जे में रही फूलपुर लोकसभा अब हर राजनीतिक दल के लिए ऐसी सीट है जिसे जीतकर हर कोई अपनी ताकत दिखाना चाहता था। अगर यह सीट भाजपा जीतती है तो मत एकदम स्पष्ट है योगी लहर काम कर रही है और मोदी का जलवा बरकरार है। यानी आने वाला लोकसभा चुनाव में भाजपा का डंका बजेगा। यह सीट अगर सपा अपने खाते में ले जाती है तो कहा जाएगा कि योगी सरकार के कामकाज से जनता नाखुश है और मोदी लहर खत्म हो चुकी है। यानी मुलायम सिंह के पीएम बनने के ख्वाब को फिर से सांसे मिल जायेंगी। वहीं अगर यह सीट कांग्रेस के पाले में चली जाती है तो एक बार फिर से नेहरू के गढ़ में कांग्रेस जिंदा हो जाएगी और आने वाले लोकसभा चुनाव में करिश्माई जीत की ओर बढ़ने का दावा करेगी। बसपा के लिए तो बीता लोकसभा चुनाव किसी बुरे सपने से कम नहीं था ऐसे में अगर वह यह चुनाव लड़ती है और जीतती है तो निश्चित तौर पर मौजूदा बसपा पार्टी के लिए यह संजीवनी बूटी की तरह काम करेगी और मरणासन्न बसपा फिर से सक्रिय राजनीति में अपना दम दिखा सकेगी।

किस बिरादरी की है बढ़त
फूलपुर लोकसभा क्षेत्र एक समय कुर्मी बाहुल्य इलाका हुआ करता था लेकिन 2009 में परिसीमन के बाद इस पूरे लोकसभा क्षेत्र की जातीय गणित बदल चुकी है। कुर्मी बाहुल्य इलाकों में से गिने जाने वाला प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र व हंडिया विधानसभा क्षेत्र अब फूलपुर लोकसभा का हिस्सा नहीं है जबकि इलाहाबाद लोकसभा क्षेत्र के इलाहाबाद शहर उत्तरी और शहर पश्चिमी विधानसभा को फूलपुर लोकसभा में शामिल कर दिया गया है। शहर उत्तरी में सबसे ज्यादा कायस्थ और ब्राह्मण मतदाता है और शहर पश्चिमी में भी इनकी बहुत बड़ी संख्या है। इन दोनों विधानसभाओं के मतदाताओं ने अब फूलपुर लोकसभा को बैकवर्ड राजनीति से बाहर धकेल दिया है। पहले पूरे लोकसभा में कुर्मी, कुशवाहा और मुस्लिम मतदाता पूरी तरीके से लोकसभा की राजनीति को तय करते थे, लेकिन पिछले चुनाव से यह समीकरण अब बदल चुका है।
1 - शहर पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र
शहर पश्चिमी विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम, पाल, कायस्थ, वैश्य समाज के लोग ज्यादा हैं और यह परिसीमन में अब फूलपुर लोकसभा का हिस्सा है।
2 - शहर उत्तरी विधानसभा क्षेत्र
शहर उत्तरी विधानसभा क्षेत्र में कायस्थ और ब्राम्हण बहुसंख्यक है। यह भी परिसीमन में अब फूलपुर लोकसभा का हिस्सा है और सबसे बडा बदलाव यही से हुआ है। क्योंकि सबसे अधिक मतदाता भी यही हैं।
3 - सोरांव व फूलपुर विधानसभा क्षेत्र
सोरांव व फूलपुर विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी, मौर्य व मुस्लिम मतदाता अधिक है।
4 - फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र
फाफामऊ विधानसभा क्षेत्र में कुर्मी, कुशवाहा, मुस्लिम, ब्राम्हण व यादव मतदाता अधिक संख्या में हैं।
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