UP में मुस्लिम लीडरशिप की डिमांड कर ओवैसी ने बढ़ाई सपा-बसपा और कांग्रेस की टेंशन, जानिए इसकी वजह
लखनऊ, 27 सितंबर: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव से पहले ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी के 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को नेतृत्व देने की बहस ने उन पार्टियों में बेचैनी पैदा कर दी है जो उन्हें अपना मुख्य वोट बैंक मानती हैं। जाटवों, यादवों, राजभरों और निषादों सहित विभिन्न जातियां, जो उत्तर प्रदेश की आबादी का एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा हैं, कमोबेश उनका अपना नेतृत्व है, लेकिन मुसलमान, जो जनसंख्या का 19 प्रतिशत से अधिक है, ऐसा कोई नहीं देखते हैं। ओवैसी अब इसी बात को लेकर सपा-बसपा और कांग्रेस को सियासी तौर पर घेरने में जुटे हैं कि जब इतनी बड़ी आबादी है तो अपना नेतृत्व क्यों नहीं ?

राज्य की करीब 130 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता राजनीतिक किस्मत बनाने या बिगाड़ने की स्थिति में हैं, लेकिन उनके पास राजनीतिक भागीदारी के नाम पर कुछ भी नहीं है। मुसलमानों के सबसे ज्यादा वोट पाने वाली समाजवादी पार्टी हो या सामाजिक न्याय के लिए दलित-मुस्लिम एकता की बात करने वाली बसपा, किसी ने भी मुसलमानों को नेतृत्व नहीं दिया।
नेतृत्व की बात पर इतना हंगामा क्यों
ओवैसी इसे राज्य में अपने चुनाव प्रचार का आधार बना रहे हैं। एआईएमआईएम के चीफ ओवैसी अपनी जनसभाओं में कहते हैं कि उनकी पार्टी का मुख्य लक्ष्य मुसलमानों के बीच उनके समुदाय की प्रगति और बेहतर भविष्य के लिए राजनीतिक सोच और नेतृत्व पैदा करना है। छोटी छोटी जातियों के नेता अपने अपने लीडर चुनते हैं और सरकार अपन दबाव डालकर अपनी मांगें मनवा लेते हैं। लेकिन मुस्लिम समाज ऐसा क्यों नहीं कर पाता ?
सुल्तानपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में ओवैसी ने कहा कि,
"तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों, जिन्हें मुसलमानों का वोट मिल रहा था, उन्होंने कभी भी मुस्लिम नेतृत्व को उभरने नहीं दिया। अब जब ओवैसी मुसलमानों को नेतृत्व देने की बात कर रहे हैं तो उन पार्टियों में हंगामा मच गया है जो इस समुदाय को अपना राजनीतिक गुलाम मानते हैं। ये लोग चाहते हैं कि मुस्लिम समुदाय हमेशा बैंड-बाजा और बारात का ही हिस्सा रहे। लेकिन अब हमें अपना नेतृत्व खुद पैदा करने के लिए सोचना होगा।''

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मुसलमानों को उनकी अहमियत समझाने में जुटे ओवैसी
इस सवाल पर विशेषज्ञों की राय अलग है कि क्या हिंदुत्व की राजनीति के उदय के बाद मुसलमान अपना स्वीकार्य नेतृत्व बनाने के लिए पर्याप्त जागरूक हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषक अवनीश उपाध्याय कहते हैं कि,
'ओवैसी फैक्टर' का असर विधानसभा चुनाव पर जरूर पड़ेगा। इसका कारण यह है कि देश में कट्टर हिंदुत्व की राजनीति के उदय के बाद, मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अपने अलग नेतृत्व के महत्व को समझने लगा है। सपा, बसपा और मुस्लिम हितैषी होने का दावा करने वाली पार्टियों ने मुसलमानों के मुद्दों पर चुप्पी साध रखी है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय में अब यह विचार जोर पकड़ रहा है कि अगर इसका अपना कोई नेतृत्व नहीं है, तो उनके खिलाफ कथित अत्याचार केवल बढ़ेंगे।''
उपाध्याय ने कहा कि यही कारण है कि इस बार ओवैसी बीजेपी के निशाने पर नहीं हैं बल्कि उन पार्टियों के निशाने पर हैं जो अब तक वोटरों में बीजेपी का डर पैदा कर मुस्लिम वोट हासिल करने की कोशिश करती रही हैं। उन्होंने कहा, "ये पार्टियां ऐसा प्रचार कर रही हैं कि ओवैसी राज्य में मुस्लिम वोटों को काटकर भाजपा को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। मुसलमानों का एक वर्ग इस बात पर विचार कर रहा है कि भाजपा ने उनका क्या नुकसान किया है।

योगी शासन से ज्यादा पिछले सरकारों में परेशान था मुसलमान
उन्होंने कहा कि, "मुजफ्फरनगर दंगे, जिसने मुसलमानों के मन में भय की छाप छोड़ी, वह भाजपा शासन के दौरान नहीं बल्कि सपा शासन के दौरान हुआ था। योगी आदित्यनाथ के शासन काल में ऐसा कोई दंगा नहीं हुआ था जिसमें मुसलमानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया हो। राज्य में सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी दो प्रतिशत से भी कम है, जबकि कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपा सरकारों ने राज्य में सबसे लंबे समय तक शासन किया है।''
यूपी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 19.26 फीसदी
जनगणना-2011 के आंकड़ों के अनुसार राज्य की जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी 19.26 प्रतिशत है। राज्य के 403 में से 82 विधानसभा क्षेत्रों में मुसलमान निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। रामपुर में मुसलमानों की आबादी 50.57 प्रतिशत है। इसके अलावा मुरादाबाद में 47.12 फीसदी, बिजनौर में 43.04 फीसदी, सहारनपुर में 41.95 फीसदी, मुजफ्फरनगर में 41.30 फीसदी, अमरोहा में 40.78 फीसदी और बलरामपुर, आजमगढ़, बरेली, मेरठ, बहराइच में 30 फीसदी से ऊपर हैं।

राजनीतिक विश्लेषक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रह चुके प्रो सिराज सिद्दीकी कहते हैं कि,
''राज्य में कमोबेश हर विधानसभा चुनाव में मुसलमानों को नेतृत्व देने का मुद्दा सामने आया है, लेकिन यह कभी हवा नहीं लगी और मुसलमान अक्सर सपा या बसपा को वोट देते हैं। मुसलमानों के विभिन्न वर्ग और उनकी अपनी आकांक्षाएँ भी उन्हें एक सार्वभौमिक नेतृत्व देने के रास्ते में एक बाधा रही हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों में नेतृत्व तैयार करने को लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं है।''
सिद्दीकी ने कहा कि ओवैसी बिहार और महाराष्ट्र में पिछले विधानसभा चुनाव के मॉडल पर प्रयास कर रहे हैं। उन्हें बिहार में सफलता मिली क्योंकि उन्हें कुछ अच्छे उम्मीदवार मिले थे जिनका अपना जनाधार था। लेकिन उत्तर प्रदेश में ओवैसी को ज्यादा सफलता मिलती नहीं दिख रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश में ज्यादातर मुसलमान उसी पार्टी को वोट कर रहे हैं जो बीजेपी को हराने में सक्षम है।












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