बीजेपी उत्तर प्रदेश हारी तो क्या होगा और जीती तो क्या?
क्या होगा अगर भाजपा उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतती है, हार के बाद कैसे बढ़ेगी पार्टी की मुश्किलें, 2019 का रास्ता साफ कर सकते हैं यूपी के नतीजे
लखनऊ। उत्तर प्रदेश चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए काफी अहम हैं, देश के सबसे बड़े राज्य जहां से 80 सांसद लोकसभा जाते हैं और 30 राज्यसभा सांसद यहां से जाते हैं, इस लिहाज से केंद्र की राजनीति में उत्तर प्रदेश की सियासत किसी भी दल के लिए काफी अहम है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में यूपी ने अहम भूमिका निभाई है और भाजपा व सहयोगी दलों को 73 सीटें देकर तमाम राजनीतिक दलों को चौंका दिया।

यूपी में पार्टी ने झोंकी पूरी ताकत
उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से ताबड़तोड़ रैलियां की और सातवें चरण के प्रचार के लिए पीएम ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में लगातार तीन दिन तक डेरा डाला, दो रोड शो के साथ रैलियों को संबोधित किया वह साफ जाहिर करता है कि यूपी पीएम के लिए क्या महत्व रखता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को लंबे समय के बाद फिर से सत्ता में लाने के लिए ना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बल्कि तमाम कैबिनेट मंत्रियों जिसमें राजनाथ सिंह, कलराज मिश्रा, उमा भारती, पीयूष गोयल, अरुण जेटली जैसे आला मंत्रियों ने अपनी भूमिका निभाई।

पीएम के तमाम फैसलों को मिलेगा जनसमर्थन
उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का भी विषय बन गया है, माना जा रहा है कि नोटबंदी के बाद यूपी का चुनाव प्रधानमंत्री के लिए एक जनमत का भी काम करेगा, ऐसे में अगर यूपी में भाजपा को हार का सामना करना पड़ता है तो सबसे बड़ा सवाल प्रधानमंत्री मोदी के उन फैसलों पर खड़ा होगा, नोटबंदी पर प्रधानमंत्री तमाम रैलियों में कहते रहे हैं कि उनके इस ऐतिहासिक फैसले को जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त है और देश की गरीब जनता ने उनका इस फैसले में साथ दिया है।
उत्तर प्रदेश के चुनाव में जीत ना सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन तमाम फैसलों पर जनता के समर्थन की मुहर लगाएगी बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के लिए एक मजबूत नींव भी खड़ी करेगी। जिस तरह से 2014 में भाजपा ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया उसके बाद पीएम से लोगों को काफी अपेक्षाएं थी, ऐसे में नोटबंदी, सर्जिकल स्ट्राइकल जैसे मुद्दे भाजपा के लिए अहम साबित साबित हो सकते हैं। ऐसे में अगले लोकसभा चुनाव के लिए पीएम मोदी का रास्ता निसंदेह काफी आसान हो जाएगा और यह विपक्षी दलों की मुश्किल बढ़ा सकता है।

भाजपा के लिए ब्रांड मोदी और मजबूत होगा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए ताबड़तोड़ प्रचार किया और पार्टी के लिए एक जबरदस्त लोकप्रिय चेहरे के तौर पर उभरे, उनकी लोकप्रियता आगामी कई चुनावों में भी कायम रही, लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते ही पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत में आई, जिसके बाद, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा में पार्टी को जीत हासिल हुई, यही नहीं महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में भी भाजपा ने जबरदस्त जीत हासिल की, ओड़िशा के निकाय चुनाव में पहली बार भाजपा ने 300 से अधिक सीटें हासिल की जोकि पार्टी के लिए काफी उत्साहित करने वाला फैसला था। यूपी चुनाव में भी प्रधानमंत्री मोदी पार्टी के लिए एकमात्र सबसे लोकप्रिय चेहरे के तौर पर लोगों के सामने आए और उन्होंने प्रदेश में 25 रैलियों को संबोधित किया और दो रोड शो किया। पीएम की रैलियों व रोड शो में जबरदस्त भीड़ इस बात की तस्दीक करती है कि पीएम की लोकप्रियता कि स्तर पर है, हालांकि पीएम की रैलियों व रोड शो में आने वाली भीड़ के समर्थन की पुष्टि का फैसला चुनाव के नतीजों के बाद ही आएगा।

पार्टी पर मोदी-शाह की बढ़ेगी पकड़
प्रधानमंत्री मोदी के साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने यूपी के चुनाव में काफी अहम भूमिका निभाई है, उन्हें पार्टी के सबसे बड़ी रणनीतिकार के तौर पर देखा जाता है, यूपी में जिस तरह से पिछड़ी जाति के समीकरण को साधने के लिए अमित शाह ने उन तमाम छोटे दलों के साथ गठबंधन किया वह पार्टी के लिए काफी अहम साबित हो सकता है। एक तरफ जहां प्रधानमंत्री मोदी बड़ी रैलियों को संबोधित कर रहे थे तो दूसरी तरफ अमित शाह ने छोटी-छोटी रैलियों के जरिए पार्टी के लिए जनसमर्थन हासिल करने की कोशिश की। शाह की रणनीति पर नजर डालें तो इस बार भाजपा ने तकरीबन 70 बाहरी उम्मीदवारों को टिकट दिया जो दूसरे दलों से पार्टी में आए, यहां यह गौर करने वाली बात यह है कि इन उम्मीदवारों को वहां से टिकट दिया गया है जहां भाजपा की जमीन काफी कमजोर है यहां उसे कभी जीत हासिल नहीं हुई। ऐसे में यूपी में जीत एक बार फिर से पीएम मोदी और शाह की ना सिर्फ प्रतिष्ठा को फिर से स्थापित करेगा बल्कि पार्टी पर उनकी पकड़ को भी मजबूत करेगा।

आलोचकों की बढ़ेगी मुश्किल
जिस तरह से 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने पार्टी की कमान अपने हाथों में ली है, उसने पार्टी के भीतर एक धड़ा ऐसा भी खड़ा किया है जो इनका विरोध करता है, शत्रुघन सिन्हा, कलराज मिश्रा, जसवंत सिन्हा, कीर्ति आजाद, अरुण शौरी सहित तमाम ऐसे नेता हैं जो पार्टी के भीतर शाह और मोदी के अधिपत्य की परोक्ष या अपरोक्ष रूप से आलोचना करते हैं, ऐसे में यूपी जैसे बड़े राज्य में पार्टी की जीत आलोचकों के लिए भी काफी मुश्किल खड़ी कर सकती है।

राज्यसभा में नंबर का गणित
उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से अपनी पूरी ताकत झोंकी उसके पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि पार्टी राज्यसभा में अपने नंबर को बढ़ाना चाहती है, तमाम ऐसे विधेयक और नए प्रस्ताव जिसे पार्टी लोकसभा में तो बहुमत के चलते पास करा लेती है लेकिन उसे राज्यसभा में मुश्किल का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि पार्टी किसी भी कीमत पर यूपी के चुनाव में जीत हासिल करना चाहती है ताकि लोकसभा के साथ वह राज्यसभा में भी नंबर हासिल कर सके और उन तमाम कानूनों को पास करा सके जिसे पार्टी देश के विकास के लिए काफी अहम बताती आई है।

राष्ट्रपति चुनाव की राह होगी आसान
राज्यसभा में नंबर के साथ ही यूपी चुनाव पार्टी के लिए एक और वजह से काफी अहम है, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का कार्यकाल इसी वर्ष जुलाई माह में समाप्त हो रहा है, यही नहीं नए राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया भी शुरु हो चुकी है, राष्ट्रपति के चुनाव में प्रदेश के विधानसभा सदस्य काफी अहम भूमिका निभाते हैं, इस लिहाज से यूपी में भाजपा की जीत उसे अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनने में भी मदद करेगा। बहरहाल यूपी चुनाव में पीएम मोदी की लोकप्रियता और अमित शाह की रणनीति की लोकसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ी परीक्षा है, जिसका फैसला दोनों ही नेताओं के आगामी भविष्य में काफी अहम भूमिका निभाएगा।












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