Mulayam Singh Yadav:करहल जैन इंटर कॉलेज में टीचर से लेकर अबतक की यात्रा- पूरी Timeline

मुलायम सिंह यादव ने अपने करियर की शुरुआत शिक्षा के क्षेत्र से की थी। समाजवादी पार्टी के संस्थापक ने राजनीति से अपने जीवन पथ पर चलना शुरू नहीं किया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के करहल में जैन इंटर कॉलेज से करियर शुरू किया था, बाद में यही मैनपुरी ने उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान दिलाई। वहां उनपर छात्रों को हिंदी और सोशल साइंस पढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली थी और जानकारी के मुताबिक बहुत कम समय में ही वे छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए थे। हालांकि, उन्हें तो नेता बनकर देश सेवा करनी थी, इसलिए ज्यादा दिन तक उसमें मन नहीं लगा और फिर लंबी राजनीतिक यात्रा पर निकल गए।

10 बार विधायक और 7 बार सांसद रहे मुलायम

10 बार विधायक और 7 बार सांसद रहे मुलायम

22 नवबंर, 1939 को यूपी के इटावा जिले के सैफई गांव में जन्मे मुलायम सिंह यादव कुल तीन बार उत्तर प्रदेश जैसे सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य के मुख्यमंत्री रहे। वे 10 बार विधायक/विधान पार्षद और 7 बार संसद सदस्य रहे। सुघर सिंह और मूर्ति देवी के बेटे मुलायम ने 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की थी। अगर साल-दर-साल टाइम लाइन के रूप में उनके जीवन का विस्तार देखें तो अंदाजा लग जाता है कि एक ग्रामीण परिवेश से लेकर उन्होंने कैसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना एक व्यक्तित्व निर्माण किया और कैसे उनका जीवन और उनका संघर्ष लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का कारण बन गया।

मास्टरजी से नेताजी बन गए मुलायम

मास्टरजी से नेताजी बन गए मुलायम

1963) मुलायम सिंह यादव इटावा में अपने शुरुआती दिनों से ही कुश्ती में पारंगत थे। फिर उन्होंने मैनपुरी के करहल स्थित जैन इंटर कॉलेज में हिंदी और सोशल साइंस में अध्यापन का कार्य शुरू किया।

1667) शिक्षा के क्षेत्र से वह कम ही समय जुड़े रहे और इस साल वे मैनपुरी की जसवंतनगर सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अपना पहला विधानसभा चुनाव जीत लिया। 1993 तक वे जसवंतनगर से ही 6 बार और चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे। लेकिन, इस दौरान उनकी पार्टियां बदलती रही। यानी 1974 में भारतीय किसान दल, 1977 में भारतीय लोक दल, 1985 में लोकदल, 1989 में जनता दल, 1991 में समाजवादी जनता पार्टी और 1993 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर सफल हुए।

1977) मुलायम सिंह यादव को लोकदल का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

1980) जनता दल के अध्यक्ष बने। लेकिन, जसवंतनगर सीट से ही सिर्फ एक बार कांग्रेस के बलराम यादव के हाथों हार का सामना करना पड़ा।

1982) विधान परिषद के सदस्य बने और वहां विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई।

1985) जसवंतनगर विधानसभा सीट पर दोबारा जीत दर्ज की और अब विधानसभा में विपक्षी दल के नेता चुने गए।

मुलायम तीन बार रहे यूपी के मुख्यमंत्री

मुलायम तीन बार रहे यूपी के मुख्यमंत्री

1989) मुलायम सिंह यादव को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। उन्होंने जनता दल सरकार की अगुवाई की, जिसे बीजेपी का समर्थन हासिल था।

1990) बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर मुलायम सिंह यादव सरकार से समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस के समर्थन से सरकार किसी तरह एक साल और चली। अयोध्या में कार सेवा करने पहुंचे कार सेवकों पर गोली चलवाने का आदेश दिया। इसमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए। उस दौरान मुलायम ने घोषणा की थी कि अयोध्या में तब के विवादित स्थल पर 'परिंदा भी पर नहीं मार सकता है।' उनके इस फैसले से उन्हें मुसलमान वोटरों का ऐसा साथ मिला, जो आज भी किसी ना किसी रूप में उनकी पार्टी के साथ बरकरार है।

1992) मुलायम सिंह यादव ने जनता दल से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बनाई और उसे समाजवादी पार्टी नाम दिया।

बसपा से गठबंधन करके दूसरी बार सीएम बने थे मुलायम

बसपा से गठबंधन करके दूसरी बार सीएम बने थे मुलायम

1993) मुलायम सिंह यादव ने तब कांशीराम और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया और सपा-बसपा गठबंधन सरकार में दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गए।

1995) लखनऊ के कुख्यात गेस्ट हाउस कांड में बसपा नेता मायावती के साथ सपा कार्यकर्ताओं द्वारा हुई अभद्रता के बाद बीएसपी ने गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लिया। मुलायम की सरकार गिर गई और यहां से सपा-बसपा के बीच कटु संघर्ष का दौर शुरू हो गया, जो अगले 24 साल तक चलता रहा।

प्रधानमंत्री बनने की चाहत रखकर रक्षा मंत्री बने थे मुलायम

प्रधानमंत्री बनने की चाहत रखकर रक्षा मंत्री बने थे मुलायम

1996) मुलायम ने पहली बार मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद की सदस्यता ग्रहण की। इस साल मुलायम ने प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचने के लिए भी हाथ-पैर मारे लेकिन, उन्हें दो साल तक देश के रक्षा मंत्री के पद पर रहने का अवसर जरूर मिल गया।

1998) उन्होंने मैनपुरी लोकसभा सीट से एक बार फिर से जीत दर्ज की।

1999) मुलायम ने इस बार संभल और कन्नौज दोनों सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों पर ही जीत दर्ज की।

2004) इससाल वे वापस मैनपुरी से चुनाव जीते और 2009, 2014 और 2019 में भी यह सिलसिला बरकरार रखा। 2014 में वे मैनपुरी के अलावा आजमगढ़ से भी जीते थे और मैनपुरी सीट छोड़ दी थी।

मुलायम सिंह यादव तीसरी बार बने यूपी के मुख्यमंत्री

मुलायम सिंह यादव तीसरी बार बने यूपी के मुख्यमंत्री

2003) मुलायम सिंह यादव बसपा-भाजपा गठबंधन सरकार के गिरने के बाद तीसरी बार बीएसपी के एक गुट और कांग्रेस के कुछ बागियों के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने 2007 तक अपना तीसरा कार्यकाल पूरा किया।

2004) मुलायम के नेतृत्व में यूपी में लोकसभा चुनावों में सपा का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन हुआ और पार्टी ने 80 में से 36 सीटें जीत लीं।

2007) समाजवादी पार्टी बीएसपी से विधानसभा चुनाव हारकर सत्ता से बाहर हो गई। 1991 के बाद पहली बार मायावती के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। मुलायम 2009 तक विपक्ष के नेता की रोल में रहे।

मुलायम ने अपनी जगह बेटे अखिलेश को बनवाया मुख्यमंत्री

मुलायम ने अपनी जगह बेटे अखिलेश को बनवाया मुख्यमंत्री

2012) मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में आखिरी बार समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और पार्टी 224 सीटें जीतकर यूपी की सत्ता में वापस हुई। लेकिन, मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री घोषित किया और खुद पार्टी के संरक्षक की भूमिका में रह गए।

2014) समाजवादी पार्टी का औपचारिक कमान अब अखिलेश यादव के हाथों में थी और 2014 की मोदी लहर में सपा को लोकसभा में सिर्फ 5 सीटें मिलीं। सिर्फ मुलायम के परिवार के सदस्य ही पार्टी के टिकट पर संसद के निचले सदन तक पहुंच सके थे। खुद मुलायम आजमगढ़ और मैनपुरी दोनों सीटों से जीते थे, उनकी बहू डिंपल यादव कन्नौज से और उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव को क्रमश: बदायूं और फिरोजाबाद से सफलता मिली थी।

मुलायम के कुनबे में शुरू हुई जंग

मुलायम के कुनबे में शुरू हुई जंग

2016) मुलायम के कुनबे की अंदरूनी लड़ाई पहली बार खुलकर सार्वजनिक हुई। मुलायम की राजनीतिक विरासत संभालने के लिए उनके भाई शिवपाल यादव और बेटे अखिलेश यादव के बीच खुली जंग छिड़ गई। शुरू में मुलायम ने तटस्थ रहने का संकेत दिया, लेकिन आखिरकार बेटे के पक्ष में ही झुकना पड़ गया।

2017) विधानसभा चुनावों से पहले अखिलेश यादव ने पार्टी की अध्यक्षता पिता के हाथों से लेकर खुद संभाल ली। पिता के विरोध के बावजूद अखिलेश ने चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और पार्टी की लुटिया पूरी तरह से डुबो दी। भाजपा और उसके सहयोगी 325 सीटें जीतकर सपा की राजनीति का पत्ता साफ कर दिया।

राजनीतिक सफर छोड़, अनंत सफर पर निकल चुके हैं मुलायम

राजनीतिक सफर छोड़, अनंत सफर पर निकल चुके हैं मुलायम

2019) यूपी में बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए सारी सियासी दुश्मनी भुलाकर लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा एकबार फिर साथ आ गए और गठबंधन करके चुनाव लड़ा। मायावती की पार्टी ने सारा फायदा उठाया और समाजवादी पार्टी फिर भी पांच सीटों से ज्यादा नहीं जीत पाई।

2022) 2019 के लोकसभा चुनावों में अखिलेश के नेतृत्व में सपा ने जो 5 सीटें जीती भी थीं, उनमें से उपचुनावों में रामपुर और आजमगढ़ की अपनी परंपरागत सीट भी भाजपा के हाथों हार बैठी।

10 अक्टूबर, 2022) दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम स्थित मेदांता हॉस्पिटल में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने आखिरी सांसें लीं और पार्टी को अखिलेश के भरोसे छोड़कर हमेशा के लिए अंतिम सफर पर निकल गए।

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