Mahakumbh 2025: संगम क्षेत्र को जोड़ते 30 पुल, 5 टन वजनी-डूबते नहीं, झेल रहे 45Cr भक्तों का भार, जानें रहस्य
Mahakumbh 2025: प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ 2025 के लिए पांटून पुल (पीपे वाला पुल) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इन पुलों को अस्थायी रूप से गंगा नदी पर बनाया जाता है, जो श्रद्धालुओं को संगम और मेला क्षेत्र में आसानी से आने-जाने की सुविधा देते हैं। इस बार 30 नए पांटून पुल बनाए गए हैं, जिन पर लगभग 17 करोड़ 31 लाख रुपये खर्च हुए हैं। यह पुल गंगा के दोनों किनारों को जोड़ते हैं।
खास बात यह है कि एक पुल में लगभग 2213 पांटून लगाए गए हैं। इनका वजन करीब 52 क्विंटल 69 किलो है। यह 5 टन लोहे से बना है। आइए आपको रूबरू कराते हैं इस रहस्य से? साथ ही बात करेंगे कि इनकी शुरुआत कब और कैसे हुई? जानते हैं सबकुछ..

क्या हैं पांटून पुल (Pontoon Bridge) और क्यों हैं खास?
पांटून पुल, जिसे फ्लोटिंग ब्रिज भी कहते हैं, पानी की सतह पर तैरते हुए लोहे के पीपों पर बने होता है। यह पुल आर्किमिडीज के सिद्धांत पर आधारित है। पीपे पानी को विस्थापित करते हैं, जिससे पुल तैरता रहता है।
- कैसे तैरते हैं: पांटून (लोहे के पीपे) के अंदर खाली जगह होती है, जो पानी में हल्के घनत्व का प्रभाव बनाती है। इस कारण यह पानी में डूबने के बजाय तैरता है।
- भार क्षमता: हर पांटून 5 टन तक का भार सह सकता है। इसके ऊपर भीड़ को लगातार चलते रहने की सलाह दी जाती है ताकि ज्यादा भार एक जगह न पड़े।
पांटून पुल का निर्माण कैसे होता है?
पानी में फ्लोटिंग पोंटून (धातु के बड़े खाली कंटेनर) रखे जाते हैं। इन पोंटून को एकसाथ जोड़कर स्थिरता प्रदान की जाती है। इनके ऊपर सड़क जैसी संरचना बनाई जाती है। एंकर और केबल की मदद से इसे स्थान पर स्थिर रखा जाता है। हर 5 मीटर पर लोहे का एक पांटून लगाया जाता है।
- सुरक्षा का इंतजाम: पीपों को लकड़ी के बड़े टुकड़ों और रस्सों से बांधकर पानी में स्थिर किया जाता है।
- सड़क का निर्माण: पीपों के ऊपर लकड़ी, मिट्टी और धातु की प्लेटें लगाई जाती हैं ताकि यह एक सड़क की तरह काम कर सके।
- वन-वे पुल: इस बार के पुलों को वन-वे रखा गया है, जिससे भीड़ को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सके।
पांटून पुल बनाने की चुनौती
- खर्च : 30 नए पुल बनाने में 17 करोड़ 31 लाख रुपये का खर्च हुआ।
- अस्थाई उपयोग: मेले के बाद इन पुलों को अलग कर स्टोर कर लिया जाता है। इन्हें दूसरे जिलों में भी आपातकालीन जरूरतों के लिए उपयोग किया जाता है।
पांटून पुल का ऐतिहासिक महत्व?
- शुरुआत: पांटून पुल का उपयोग 2500 साल पहले (480 ईस्वी पूर्व) में फारसी इंजीनियरों ने किया था।
- प्राचीन युद्ध: मिस्र, ईरान-इराक युद्ध, और द्वितीय विश्व युद्ध में भी ऐसे पुलों का इस्तेमाल हुआ।
- भारत में उपयोग: प्रयागराज, हरिद्वार और अन्य धार्मिक आयोजनों में पांटून पुलों का प्रमुखता से उपयोग होता है।
दुनिया के कुछ प्रसिद्ध पांटून पुल
- शिज़िगुआन फ्लोटिंग ब्रिज (चीन): इसे "ड्रीम ब्रिज" भी कहा जाता है। यह पुल नदी के साथ हरे-भरे जंगलों के बीच स्थित है।
- राइन नदी के पुल (जर्मनी): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए।
- टेम्स नदी (लंदन): अस्थायी पांटून पुल का उपयोग युद्धकाल में हुआ।
महाकुंभ के बाद पांटून का क्या होता है?
- प्रयागराज के कनिहार, परेड ग्राउंड और त्रिवेणीपुरम में इन पीपों को स्टोर किया जाता है।
- यूपी के दूसरे जिलों में नदी पार करने के अस्थायी उपायों के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है।

भारत में कहां-कहां पोंटून पुल?
भारत में पोंटून पुल मुख्य रूप से मेले, धार्मिक आयोजनों और आपातकालीन परिस्थितियों के लिए बनाए जाते हैं।
- प्रयागराज (इलाहाबाद): कुंभ मेले और अर्धकुंभ मेले के दौरान गंगा नदी पर कई पोंटून पुल बनाए जाते हैं।
- हरिद्वार: कुंभ मेले के समय तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए गंगा नदी पर पोंटून पुल बनाए जाते हैं।
- लखनऊ: यूपी की राजधानी लखनऊ में भी कुड़िया घाट के पास पीपे वाले पुल बने हुए हैं। यह दोनों किनारों को जोड़ते हैं।
पोंटून पुल के तैरने का क्या रहस्य?
पोंटून पुल का तैरना आर्किमिडीज के सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत कहता है कि किसी भी तरल में डूबी हुई वस्तु पर ऊपर की ओर एक बल लगता है, जो वस्तु द्वारा विस्थापित तरल के भार के बराबर होता है।
- विस्थापन (Displacement): जब पोंटून पानी में रखा जाता है, तो यह पानी को विस्थापित करता है।
- उत्थापन बल (Buoyant Force): विस्थापित पानी का भार पोंटून पर ऊपर की ओर बल लगाता है।
- घनत्व का प्रभाव: लोहे का पोंटून अंदर से खोखला होता है, जिससे उसका औसत घनत्व पानी के घनत्व से कम हो जाता है।
- स्थिरता: बड़े आकार और संतुलित डिजाइन के कारण पोंटून स्थिर रहता है और भारी वजन सहन कर सकता है।
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