Kuldeep Singh Sengar के Unnao माखी कांड की पूरी कहानी, दो दशकों में फैली दुश्मनी-23 साल की जंग में सब तबाह!
Kuldeep Singh Sengar Unnao Case Makhi Kand Full Story Hindi: उन्नाव के माखी कांड में आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर की कहानी कोई एक दिन या एक साल की नहीं है। यह मामला करीब दो दशकों में फैली राजनीति, दुश्मनी, सत्ता के दुरुपयोग और इंसाफ की जद्दोजहद का नतीजा है।
अगर इस पूरे केस को समझना है, तो इसे टाइमलाइन में देखना जरूरी है, ताकि साफ हो सके कि कैसे हालात एक-एक करके यहां तक पहुंचे। इसके लिए हमें पहले 25 साल पीछे जाना होगा। आइए Oneindia Hindi के स्पेशल पैकेज में जानते हैं पूरी कहानी...

दोस्ती से दुश्मनी की शुरुआत (1990s से 2002 तक)
कहानी की शुरुआत सियासी कुर्सी की चाहत से होती है। उन्नाव जिला मुख्यालय से करीब 18 किलोमीटर दूर माखी गांव बसा है। इस गांव में कुलदीप सिंह सेंगर (Kuldeep Singh Sengar) और पीड़िता का परिवार पड़ोसी थे। 1990 के दशक में रिश्ते अच्छे थे। पीड़िता के पिता, चाचा और ताऊ इलाके के दबंग थे। कुलदीप के छोटे भाइयों मनोज उर्फ लंकेश और अतुल (Atul Sengar) का उनके घर आना-जाना था।
साल 1996 में पहली बार कुलदीप सेंगर ग्राम प्रधान बने, पीड़िता के परिवार की मदद से। फिर आया, 2002 विधानसभा चुनाव का दौर। कुलदीप सिंह सेंगर उन्नाव सदर से मायावती की बसपा पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे। पीड़िता के पिता, चाचा और ताऊ ने सेंगर की खुलकर मदद की और राजनीतिक रिश्ते मजबूत हुए। उस वक्त दोनों पक्षों को एक-दूसरे की जरूरत थी। कुलदीप सिंह सेंगर विधायक बने, तो रिश्तों में धीरे-धीरे खटास आने लगी। वजह- बनी ग्राम प्रधान का चुनाव।
पीड़ित लड़की के चाचा प्रधान बनना चाहते थे, लेकिन सेंगर खुद इस सीट पर अपना कब्जा चाहते थे। उन्होंने मुकदमों और दबाव का हवाला देकर चाचा को चुनाव लड़ने से रोका और अपनी मां को मैदान में उतार दिया। यहीं से दुश्मनी की असली शुरुआत मानी जाती है। मालूम हो कि कुलदीप के पिता का नाम कमल सिंह उर्फ मुलायम सिंह (Mulayam Singh) था, जोकि फतेहपुर जिले के मूल निवासी थे। कुलदीप सिंह सेंगर चार भाइयों में सबसे बड़े।
दुश्मनी का जहरीला दौर (2002 के बाद)
सेंगर परिवार ने पीड़िता के परिवार को सबक सिखाने की ठान ली। तभी एक तीसरा परिवार (वकील महेंद्र सिंह का) भी इसमें उलझा, क्योंकि प्रधान चुनाव में वह सेंगर के खिलाफ था। प्रधान चुनाव में सेंगर परिवार के खिलाफ वकील महेंद्र सिंह (Mahendra Singh) ने खानदान की एक महिला को मैदान में उतारा दिया। इससे सेंगर नाराज हो गए और पीड़ित परिवार को सबक सिखाने का फैसला किया गया।
कुछ समय बाद पहला बड़ा टकराव सामने आया। कुलदीप सिंह सेंगर के भाई अतुल सिंह और उसके लोगों का पीड़िता के चाचा से झगड़ा हुआ। बाद में पुलिस को अतुल सिंह खुद एक कट्टा और गोलियां सौंपता है और दावा करता है कि पीड़िता के चाचा की थीं। इसी बयान के आधार पर चाचा के खिलाफ हत्या की कोशिश का केस दर्ज कर लिया जाता है और वह फरार हो जाता है।
इसके बाद दूसरा झटका लगा, जब पीड़िता के ताऊ की संदिग्ध हालात में पीट-पीटकर हत्या हो जाती है। कहा गया कि वह किसी लड़की को बेचने जा रहा था, लेकिन परिवार का आरोप था कि यह विधायक की साजिश थी। इस मामले की जांच कभी ठीक से नहीं हो पाई। यह दौर सत्ता के दुरुपयोग का शुरुआती सबूत था - पुलिस और प्रभाव का इस्तेमाल।
वो काला दिन - बलात्कार (4 जून 2017)
अब कहानी पहुंचती है 4 जून 2017 पर। तब पीड़िता 15-16 साल की थी। आरोप है- नौकरी मांगने कुलदीप सेंगर के घर गई। वहां सेंगर ने उसके साथ बलात्कार किया। पीड़िता माखी थाने पहुंची, आपबीती बताई। लेकिन पुलिस ने FIR में सेंगर का नाम नहीं डाला। क्योंकि, यह आरोप सीधे विधायक पर थे। 7 दिन बाद यानी 11 जून 2017 को पीड़िता अचानक लापता हो जाती है। अगले दिन उसकी मां गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराती है। 20 जून को पुलिस लड़की को औरैया से बरामद तो कर लेती है, बयान भी लेती है, लेकिन फिर भी रेप के केस में विधायक का नाम दर्ज नहीं किया जाता। पीड़िता चुप नहीं रही, लेकिन सत्ता का डर इतना था कि कोई सुनवाई नहीं हुई।
पिता की लात-घूंसों से पिटाई, फटी आंत, कस्टोडियल मौत (2018)
लगभग आठ महीने बाद, 24 फरवरी 2018 को पीड़िता की मां मजबूर होकर उन्नाव की CJM कोर्ट पहुंचती है और विधायक के खिलाफ एफआईआर की मांग करती है। कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से ठीक पहले हालात और भयावह हो जाते हैं। 3 अप्रैल 2018 को पीड़िता के पिता को विधायक के भाई अतुल सिंह और गुर्गों ने पीड़िता के पिता को बेरहमी से पीटा। चश्मदीदों के मुताबिक, उन्हें बांधकर बेल्ट और लात-घूंसे मारे गए। इसके बाद उन्हें माखी थाने ले जाकर उन पर आर्म्स एक्ट का झूठा केस दर्ज कर दिया गया। पिटाई के बाद पिता लगातार दर्द की शिकायत करते रहे।
अस्पताल में सही इलाज की बजाय उन्हें दर्द की दवाएं देकर फिट घोषित कर दिया गया और जेल भेज दिया गया। जेल जाने के अगले ही दिन उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने साफ किया कि पिटाई से उनकी छोटी आंत फट गई थी। इस मौत के बाद 8 अप्रैल 2018 को पीड़िता ने लखनऊ में मुख्यमंत्री आवास के बाहर आत्मदाह की कोशिश की। इसी घटना के बाद पहली बार यह मामला देशभर की मीडिया में सुर्खियों में आया। सरकार पर दबाव बढ़ा और कार्रवाई शुरू हुई।
10 अप्रैल 2018 को पुलिस ने माखी थाने के SHO समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित किया। मारपीट के आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आने के बाद विधायक के भाई अतुल सिंह को भी जेल भेजा गया। इसके बाद यूपी सरकार ने केस CBI को सौंप दिया। CBI ने 12 अप्रैल 2018 को जांच शुरू की और पहली नजर में ही कुलदीप सिंह सेंगर को मुख्य आरोपी माना। 13 अप्रैल को उनसे पूछताछ हुई और इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर उसकी गिरफ्तारी हुई।

साजिशें और और मौतें (2019)
11 जुलाई 2018 को CBI ने पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सेंगर को रेप का मुख्य आरोपी बनाया गया। 13 जुलाई को दूसरी चार्जशीट दाखिल हुई, जिसमें पीड़िता के पिता को फंसाने और उनकी हत्या की साजिश का आरोप लगाया गया। इसमें कुलदीप, भाई अतुल और कुछ पुलिस वालों का नाम उजागर हुआ।
28 जुलाई 2019 को रायबरेली जाते वक्त, गुरुबख्शगंज थाना क्षेत्र में उन्नाव रेप पीड़िता, उसकी दो मौसियों और उनके वकील महेंद्र सिंह की कार (स्विफ्ट VDI) को एक ट्रक ने टक्कर मारी। इस हादसे में दोनों मौसियों की मौत हो गई, पीड़िता और वकील गंभीर रूप से घायल हुए, बाद में वकील की भी मौत हो गई। पीड़िता के पिता की मौत के मामले में सेंगर समेत 10 लोगों पर कोर्ट ने आरोप तय हुए। पीड़ित परिवार का आरोप- सेंगर की साजिश। 29 जुलाई को हालांकि, सीबीआई ने विस्तृत जांच, सीसीटीवी, टोल डाटा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, फोरेंसिक व तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि ट्रक ड्राइवर आशीष कुमार पाल की तेज और लापरवाह ड्राइविंग से सड़क दुर्घटना हुई, किसी साज़िश का वैज्ञानिक या प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिला।
11 अक्टूबर 2019 को पीड़िता की कार पर हमले के मामले में CBI ने कुलदीप सेंगर के खिलाफ चार्जशीट दायर की। 16 दिसंबर को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर को पब्लिक सर्वेंट मानते हुए नाबालिग से रेप के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके अलावा हत्या के मामले में भी उन्हें सजा मिली।
नई उम्मीद और फिर निराशा (2025)
इसके बाद मामला शांत नहीं हुआ। 23 दिसंबर 2025 में रेप के मामले में उम्रकैद की सजा को दिल्ली हाई कोर्ट ने निलंबित कर दी। साथ ही सशर्त जमानत दी- यह कहते हुए सेंगर को जमानत दे दी कि वह पब्लिक सर्वेंट नहीं थे और न्यूनतम सजा 7 साल की अवधि काट चुके हैं। इस फैसले ने पूरे देश को चौंका दिया। हालांकि, दूसरे मामले- पीड़िता के पिता की कस्टोडियल मौत (2018) में सेंगर जेल से बाहर आने वाला नहीं था।
CBI और पीड़ित पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act की भावना को समझते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि विधायक होना पब्लिक सर्वेंट की श्रेणी में आता है और सत्ता के दुरुपयोग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगली सुनवाई जनवरी 2026 तक के लिए टाल दी। उधर, कुलदीप सिंह सेंगर की बेटियों ने पिता के पक्ष में मोर्चा खोला। बड़ी बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने दावा किया कि पिता के खिलाफ एक भी सबूत पेश होते हैं, तो खुद वो फांसी की मांग करेंगी।
आज की स्थिति: एक लड़की की हिम्मत
इस कहानी में खत्म हो गए न जानें कितने परिवार। कोई जिंदगी से हाथ धो बैठा, तो कोई इंसाफ की लड़ाई में खप रहा है। कुलदीप का पक्ष उसे निर्दोष बताने में जुटा, पीड़िता के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। आज की स्थिति यह है कि कुलदीप सिंह सेंगर जेल में ही हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भले ही एक अंतरिम राहत हो, लेकिन पीड़िता और उसका परिवार आज भी सुरक्षा और इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहा है। माखी कांड की यह टाइमलाइन बताती है कि भारत में सच तक पहुंचने का रास्ता कितना लंबा और दर्दनाक हो सकता है।
नोट- खबर स्थानीय इनपुट, पीड़िता-आरोपी पक्ष के बयानों, CBI रिपोर्ट और कोर्ट के जजमेंट पर आधारित है।
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