जानिए यूपी की वो पांच वजहें जिनकी वजह से बैकफुट पर आए पीएम मोदी

लखनऊ, 20 नवंबर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा चौकाने वाले फैसलों के लिए जाने जाते हैं। इसी तरह का फैसला उन्होंने शुक्रवार को लिया जब उन्होंने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। मोदी की इस घोषणा को यूपी समेत पांच चुनावी राज्यों में फायदे के तौर देखा जा रहा था। यूपी और पंजाब में पिछले एक साल से किसान इन कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। पश्चिमी यूपी में महापंचायतें हो रही थीं जिससे बीजेपी अपने आपको असहज पा रही थी। पश्चिमी में फैल रहे इस आदोलन की आग सेंट्रल यूपी होते हुए पूर्वांचल तक पहुंचने का खतरा बना हुआ था। इस संभावित खतरे और इससे होने वाले चुनावी नुकसान को भांपते हुए मोदी ने अचानक ऐतिहासिक फैसला ले लिया। आइए हम आपको बताते हैं कि यूपी में वो कौन सी पांच वजहें हैं जिनकी वजह से मोदी को भी बैकफुट पर आने के लिए मजबूर होना पड़ा।

किसान आंदोलन पूरे यूपी में फैलने का खतरा था

किसान आंदोलन पूरे यूपी में फैलने का खतरा था

यूपी बीजेपी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जिसने 2017 के विधानसभा चुनावों में भारी जनादेश हासिल किया और 2019 के लोकसभा चुनावों में 80 में से 73 सीटें हासिल कीं। लखीमपुर खीरी की घटना तब हुई जब योगी कुछ 'किसान समर्थक' कदम उठाने की कोशिश कर रहे थे जैसे कि पराली जलाने के मामलों को वापस लेना और गन्ने की कीमतों में वृद्धि। लखीमपुर खीरी यूपी के तराई क्षेत्र का सबसे बड़ा जिला है, जहां सिख किसान समुदाय का वर्चस्व है, जो पाकिस्तान से पलायन करने के बाद वहां बस गए थे। यह 80% ग्रामीण है, जिसमें अधिकांश आबादी गन्ने की खेती पर निर्भर है। जिले में ब्राह्मणों की एक महत्वपूर्ण आबादी भी है, इसके बाद गैर-यादव ओबीसी के बीच मुस्लिम और कुर्मी हैं। किसानों का आंदोलन अब और क्षेत्रों में फैलने की संभावना बन गई थी।

लखीमपुर खीरी कांड ने बढ़ाई थी बीजेपी की टेंशन

लखीमपुर खीरी कांड ने बढ़ाई थी बीजेपी की टेंशन

चुनाव से पहले लखीमपुर खीरी कांड ने बीजेपी की टेंशन में इजाफा किया था। विश्लेषकों की माने तो अगर लखीमपुर खीरी हिंसा के खिलाफ विरोध अगले साल की शुरुआत में चुनाव तक जारी रहता है तो भाजपा के लिए नुकसान होने की भारी संभावना बनी हुई थी। विपक्षी दलों और बीकेयू ने आंदोलन तेज करने की योजना बनाई थी। अखिलेश यादव ने 12 अक्टूबर से पार्टी की 'विजय रथ यात्रा' में हर जगह लखीमपुर खीरी कांड का जिक्र किया। दूसरी बात यह कि लखीमपुर खीरी की घटना बीजेपी को नुकसान पहुंचाने वाले चुनावी मुद्दे के तौर पर सामने आ रहा था। बीजेपी ने 2017 में भारी जनादेश हासिल किया था, जब तक कि वह चुनाव से पहले अपने नुकसान नियंत्रण अभ्यास में मदद करने वाली साजिशों का सहारा लेने में सफल नहीं हो जाती।

 अखिलेश-राजभर गठबंधन का पूर्वांचल में असर

अखिलेश-राजभर गठबंधन का पूर्वांचल में असर

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल हर मुमकिन माहौल बनाने की कोशिश में जुटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दिन पहले ही सुल्तानपुर में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का भव्य उद्घाटन किया था। इसके एक दिन बा समजावादी पार्टी के अखिलेश यादव और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के चीफ ओम प्रकाश राजभर ने पूर्वांचल एक्सप्रेस वे पर 342 किलोमीटर लंबी रथयात्रा निकाली। इसका मेन मकसद एक्सप्रेस वे से सटे जिलों में आने वाली विधानसभा सीटों पर माहौल बनाना था। रथयात्रा में ऐतिहासिक भीड़ आई जिसे देखकर बीजेपी की नींद उड़ गई थी। रथयात्रा के दौरान अच्छी खासी संख्या में भीड़ देखने को मिली थी। बीजेपी को लग रहा था कि इस गठबंधन से नुकसान हो सकता है।

सपा-रालोद के गठबंधन और टिकैत के समीकरण को ध्वस्त करने का प्रयास

सपा-रालोद के गठबंधन और टिकैत के समीकरण को ध्वस्त करने का प्रयास

किसान आंदोलन के अपहरणकर्ता राकेश टिकैत का घर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है। यहां भी भाजपा नेताओं को कई जगहों पर गांवों में प्रवेश करने से रोका गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया था। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी यूपी की 110 में से 88 सीटें जीती थीं। 2012 के चुनाव में उसे सिर्फ 38 सीटें मिली थीं. लेकिन किसान आंदोलन को देखते हुए बीजेपी को बड़े नुकसान की बात कही जा रही थी। हालांकि, इस फैसले के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे तस्वीर बदल जाएगी। संदेश यह होगा कि वे सरकार की नजर में महत्वपूर्ण थे और इसलिए सरकार को झुकना पड़ा।

 जाट-मुस्लिम समीकरण को तोड़ने की कोशिश

जाट-मुस्लिम समीकरण को तोड़ने की कोशिश

वेस्ट यूपी के 6 मंडलों के 26 जिलों में जाटों का प्रभाव है। अलीगढ़ संभाग मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, आगरा के 26 जिले ऐसे हैं जहां जाट राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। दिल्ली और हरियाणा से सटे बागपत में छपरौली पिछले 84 सालों से रालोद का गढ़ है। वहीं बागपत से लेकर आगरा तक यूपी और केंद्र की राजनीति पर जाटों का सीधा असर है। इन जाटों ने किसान आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। जाटों की राजनीति कर रही रालोद को इस किसान आंदोलन से बढ़त मिल रही थी, लेकिन अब समीकरण बदल सकते हैं।

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