रावण की रिहाई पश्चिमी यूपी में मायावती को रोकने के लिए BJP की चाल तो नहीं
सहारनपुर। 2017 में हुई जातीय हिंसा के मुख्य आरोपी और रासुका में निरुद्ध भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ़ रावण की समय पूर्व रिहाई का फैलसा भाजपा सरकार ने यूं ही नहीं लिया। रावण की रिहाई राजीतिक कारणों से जोड़कर देखी जा रही है। राजनीतिक पंडित ऐसे कयास लगा रहे हैं। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद सवर्णों के निशाने पर आई बीजेपी यह नहीं चाहती है कि पश्चिम यूपी में दलित-मुस्लिम का गठजोड़ बन सके। इसलिए लोकसभा चुनाव से पहले से भाजपा को दलितों के प्रति हमदर्दी का संदेश देना है।

जातीय हिंसा के आरोप में भेजा गया था जेल
मई 2017 में सहारनपुर में हुए जातीय हिंसा का मुख्य आरोपी बनाकर भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण को जेल भेज दिया गया था। उनकी गिरफ्तारी भी हिमाचल प्रदेश के डलहोजी से हुई थी। रावण को केवल राष्ट्रीय सुरक्षा कानून रासुका के तहत जेल में रखा गया था। अब उनकी रासुका की अवधि 48 दिन रह गई थी। ऐसे में रावण की रिहाई भाजपा की सोची समझी राजनीति के तहत देखा जा रहा है। बता दें कि 2 अप्रैल 2018 को दलित हिंसा और 6 अगस्त की एससी एसटी एक्ट पर केंद्र सरकार के फैसले से भाजपा देशभर में सवर्ण के निशाने पर आ गई है। भाजपा को लोकसभा चुनाव 2019 से पहले अपने ऊपर लगा दलित विरोधी होने का दाग धोने के लिए ऐडी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है।

केंद्र और राज्य सरकार का 14 सितंबर को करना जबाव दाखिल
एक नवंबर 2018 को रावण पर लगी रासुका की अवधि समाप्त होनी थी। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद रावण की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। रावण के अधिवक्ता हरपाल सिंह की मानें तो सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर केंद्र और राज्य सरकार को आज यानि 14 सितंबर को जवाब दाखिल करना था।

दलित चेहरे के रूप में उभरकर आया था सामने
बता दें कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती सबसे बड़ा दलित चेहरा है। हालांकि सहारनपुर जातीय हिंसा के बाद चंद्रशेखर रावण को पहचान मिली। वह मायावती के बाद यूपी में सबसे बड़े दलित चेहरे के रूप में उभरकर सामने आए है। इतना ही नहीं कैराना और नूरपुर उपचुनाव के समय भी भीम आर्मी ने रालोद और सपा गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन किया। इसका नतीजा रहा कि कैराना लोकसभा सीट के तहत सहारनपुर जिले की दो विधानसभा सीटों पर बीजेपी को करारी हार मिली।
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