CM योगी और केशव के बीच सबकुछ ठीक नहीं ?, जानिए दोनों एक ही गाड़ी से क्यों पहुंचे लोकभवन
लखनऊ, 20 अप्रैल: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद भी बीजेपी न सिर्फ डैमेज कंट्रोल में लगी है, बल्कि सांकेतिक राजनीति के जरिए संगठन में ही नहीं बल्कि जनता को यह संदेश भी देना चाहती है कि सब कुछ ठीक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पांच साल बाद पहली बार ऐसा मौका आया है जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने डिप्टी सीएम केशव मौर्य को अपने साथ गाड़ी में लेकर लोकभवन में कैबिनेट की बैठक में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। दरअसल इससे पहले भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बीच मतभेद की खबरें सामने आ चुकी हैं। योगी संघ के एक वरिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबोले के साथ केशव के घर लंच करने पहुंचे थे। तब भी केशव और योगी के बीच मतभेदों की खबरें सामने आईं थीं। लेकिन आलाकमान के प्रयास से चीजें दब गईं थीं।
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केशव और योगी के बीच बढ़ रहीं नजदीकीयां
भाजपा और सरकार में सब कुछ ठीक नहीं है। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के दखल के बाद अब बीजेपी डैमेज कंट्रोल में लगी थी। दूसरी बार ऐसा मौका आया है जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केशव के बीच नजदीकीयां इतनी बढ़ी हैं। चुनाव समाप्त होने के बाद ही सीएम योगी आदित्यनाथ ने अपने दोनों डिप्टी सीएम के साथ मोदी और शाह से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद ही योगी में यह बदलाव देखने को मिल रहा है कि सीएम के लगभग हर कार्यक्रम में केशव मौर्य नजर आ रहे हैं।

पहले भी एकजुटता का संदेश देने की कोशिश हुई
इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भोजन के लिए संगठन, क्षेत्र के प्रचारकों के साथ केशव मौर्य के आवास पर पहुंचे थे तो यह संदेश देने का प्रयास किया गया था कि भाजपा में सब कुछ ठीक है और हम साथ हैं। उस समय योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास पर हुई बैठक के बाद केशव मौर्य ने सह-सरकार प्रमुख डॉ. कृष्ण गोपाल, राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष, प्रभारी राधा मोहन सिंह, क्षेत्र प्रचारक अनिल जी और महेंद्र जी को आमंत्रित किया। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा को भी न्योता दिया गया। मंगलवार को जब सभी केशव मौर्य के घर खाने के लिए पहुंचे तो राजनीतिक संदेश भी दिया गया कि बीते दिनों रिश्तों में आई बर्फबारी और दूरियों की चर्चा भी पिघल गई है।

संगठन की नाराजगी खत्म करने में जुटी भाजपा
यूपी में बीजेपी का सियासी सफर कुछ ऐसा रहा है। 90 के दशक में, भाजपा ने राज्य में सत्ता खोने का एक समान चरण देखा है। कारण मतभेद ही थे। कुछ ऐसे ही संकेत मौजूदा सरकार और यूपी बीजेपी के संगठन में भी दिख रहे थे। लेकिन नेतृत्व ने समय आने पर इसे भांप लिया। संगठन की नाराजगी दूर हुई और अब नेताओं ने भी दिखाना शुरू कर दिया है कि सरकार और पार्टी में सब कुछ ठीक है। लेकिन सवाल ये है कि ऐसा दिखाने की कोशिश क्यों की जा रही है। क्या वाकई में अंदरखाने सबकुछ ठीक नहीं है।

यूपी चुनाव में सीएम फेस को लेकर हुई थी चर्चा
पिछले दिनों राजनीतिक चर्चा हुई थी कि यूपी विधानसभा चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कौन होगा? जिसको लेकर डिप्टी सीएम केशव मौर्य और बाद में कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य का बयान आया कि चुनाव के बाद विधायक मंडल, पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा कि मुख्यमंत्री कौन होगा। संगठन के मोर्चों पर और सरकार के आयोगों और निगमों में नियुक्ति न होने पर नाराजगी पर सवाल खड़ा हो गया था। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद नाराजगी दूर हुई थी।












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