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काशी में राम दरबार की बेतहाशा मांग, तमिल अपने साथ ले जाना चाहते हैं साथ

वाराणसी में नमो घाट पर हो रहे काशी तमिल संगमम के दौरान कई स्टॉल्स लगाए गए हैं। यहां आने वाले हर आगंतुक के बीच ये स्टॉल आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वाराणसी की स्थानीय काष्ठकला को लोग काफी पसंद कर रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत कलाकार ओम प्रकाश शर्मा द्वारा बनाए गए राम दरबार की मांग काफी हो रही है। इसकी कीमत हजार रुपये से लेकर पौने दो लाख रुपये तक है। लोग अब दाम नहीं, काम देखते हैं। काशी तमिल संगमम में आए कई तमिल भी राम दरबार को खरीद कर ले जा रहे हैं।

कुआपुरा विश्वेसरगंज निवासी ओम प्रकाश शर्मा बताते हैं कि एक समय था कि हमलोग अपनी कला के प्रति मायूस हो चुके थे। अपने परिवार को इस पेशे में नहीं लाना चाहते थे। लेकिन, साल 2017 के बाद सरकार की ओर से हमें कई प्रकार की सुविधा मिलने लगी। बीते दो साल में तो हमारी कला के कद्रदानों और खरीददारों की संख्या इस कदर बढ़ी है कि हमारे परिवार के नए बच्चे भी इस काम में लग गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन के बाद हमें पूरी उम्मीद है कि लोग राम दरबार की मांग और भी अधिक करेंगे। यह हम जैसे हजारों कलाकारों के लिए अच्छी बात है।

Kashi Tamil Sangamam demand for Ram Darbar in Kashi, Tamils ​​want to take it with them

आखिर क्यों ? ओम प्रकाश बताते हैं कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के समय में सनातन धर्म के प्रति लोगों का आस्था बढ़ा है। जब से प्रधानमंत्री ने इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को राम दरबार भेंट किया, उसके बाद लोग भी एक दूसरे को इसे भेंट कर रहे हैं। यूं तो कई और मूर्तियों की बिक्री अच्छी है, लेकिन राम दरबार की मांग इतनी अधिक है कि हम लोग खुद उतना बना नहीं पाते हैं। अपने साथियों के साथ मिलकर मांग को पूरा करते हैं।

खास बात यह भी है कि लकड़ी के खिलौने तथा अन्य कलात्मक चीजों ने भी वनारस की ख्याति को बढ़ाया है। इस पेशे में लगे कलाकारों को इस बात का गर्व भी है कि उनकी कला भी वाराणसी के रेशमी वस्रों के निर्माण की कला के समान ही समस्त वि में वंदनीय है। श्री राम खेलावन सिंह जो कि मास्टर क्राफ्ट्समेन हैं तथा इस धंधे को इनके पूर्वज बहुत ही प्राचीन काल से करते आ रहे हैं, कहते हैं कि बनारस की काष्ठ-कला आधुनिक या केवल दो-चार सौ वर्ष पुरानी परम्परा नहीं है बल्कि यह तो 'राम राज्य' से भी पहले से चली आ रही है। जब राम चारों भाई बच्चे थे तो भी वे इन्ही लकड़ी के बने खिलौने से खेलते थे।

आज जब इनके बनाये गये कलात्मक वस्तुओं की मांग चारों ओर दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है, ये भी नित-नूतन प्रयोग में लगे हुए हैं। इसी प्रयोग के सिलसिले में इन्होंने बहुत अन्य रंगों का भी प्रयोग करना शुरु कर दिया है। आज बाजार में जितने भी रंग उपलब्ध हैं बहुत से काष्ठ कला निर्माता उन सभी रंगों का प्रयोग किसी न किसी वस्तु को बनाने के लिए अवश्य करते हैं। उपकरणों को रंगने के बाद ऊपर से विभिन्न चित्रों से भी सुसज्जित किया जाता है। सुसज्जित करने का काम प्रायः महिलायें करती हैं। बहुत से रंगों के प्रयोग का एक कारण यहां के काष्ठ कला से निर्मित कला तत्व का निर्यात भी है। विदेशों में हो रहे मांग के हिसाब से ही विभिन्न रंगों का प्रचलन बढ रहा है और यह गति अभी भी जारी है।

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