जयंत-अखिलेश के सामने गठबंधन के बाद अब ये है भाजपा से भी बड़ी चुनौती
लखनऊ, 24 नवंबर: इलेक्शन कमीशन ने अभी भले ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का ऐलान नहीं किया है लेकिन राजनीतिक दल पूरी तरह चुनावी मोड़ में आ गए हैं। ऐसे में नेताओं का पार्टियां बदलने का सिलसिला चल रहा है तो गठबंधनों के ऐलान भी हो रहे हैं। कई दलों को साथ लेकर मोर्चा बनाने की कोशिश में जुटी मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है, जल्दी ही सीटों को लेकर भी दोनों दल ऐलान कर देंगे। जाहिर है कि इस गठबंधन की पश्चिमी यूपी में भाजपा से सीधे टक्कर होगी लेकिन इसके साथ-साथ दोनों दलों का एक दूसरे को वोट ट्रांसफर करा पाना उससे भी बड़ी चुनौती होगा।

ये गठबंधन नया नहीं
राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी का गठबंधन नया नहीं है। 2003 में जब मुलायम सिंह सीएम बने थे तो राष्ट्रीय लोकदल ने उनको समर्थन दिया था। 2004 का लोकसभा चुनाव दोनों साथ में लड़े और शानदार कामयाबी भी हासिल की। बाद में दोनों अलग हो गए और 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के समय दोनों के रिश्तों में काफी तल्खी भी दिखी। 2019 के लोकसभा के चुनाव में फिर साथ आ गए। ऐसे में दोनों दोनों दलों को गठबंधन नया या बेमेल तो नहीं दिखता है लेकिन 2019 के चुनाव को देखें तो एक बात साफ है कि दोनों दलों के लिए वो ट्रांसफर कराना आसान नहीं होने वाला है।

2013 के बाद बदले हुए हैं हालात
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिहाज से देखा जाए तो समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल मिलकर बड़ी ताकत बनते हैं। वेस्ट यूपी में मौटे तौर पर मुसलमान वोटों को सपा के साथ तो जाटों को लोकदल के साथ माना जाता है। कागजों पर मजबूत इन दलों को लेकर सवाल ये है कि क्या ये दल और इनके मुख्य नेता अपने बेस वोट को गठबंधन के साथी को दिला पाएंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो सपा, बसपा और रालोद साथ में थे। कागजों पर ये गठबंधन बहुत मजबूत था लेकिन नतीजे क्या रहे, ये सामने हैं। नतीजों से साफ था कि वोट ट्रांसफर नहीं हुआ, यहां तक कि मायावती ने तो ये साफतौर पर ये कहा भी। वहीं सपा और आरएलडी नेताओं ने भी दबी जुबान में माना कि बसपा का वोट उनकों मिलने की बजाय भाजपा को गया। अब 2022 में भी सपा-रालोद का वोट ट्रांसफर आसानल नहीं है। इसकी बड़ी वजह 2013 का मुजफ्फरनगर का दंगा है, जिसके बाद से जाट सपा के साथ सहज नहीं दिखे हैं।
Recommended Video

कैराना उपचुनाव का तरीका आजमाना चाहते हैं सपा-रालोद
2018 में कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सपा नेता तबस्सुम हसन को रालोद ने अपने टिकट से उतारा था और वो कामयाब रही थीं। 2019 में तबस्सुम सपा के टिकट पर लड़ीं और हार गईं। दोनों दल 2022 में भी कुछ सीटों पर कैराना उपचुनाव का तरीका आजमाना चाहते हैं। बताया गया है कि वोट ट्रांसफर हो सके इसके लिए 6 से 10 सीटों पर सपा अपने सिंबल पर रालोद नेताओं को और रालोद सपा नेताओं को अपने सिंबल पर लड़ा सकती है।
-
Gold Rate Today: सोना खरीदारों की मौज! हफ्ते के पहले ही दिन धड़ाम से गिरे दाम, चेक करें अपने शहर का नया रेट -
Tamil Nadu: धमकी से मुस्लिम महिला की सुरक्षा तक—हजीना सैयद के आरोपों से हिली कांग्रेस, चुनाव से पहले फोड़ा बम -
फोन इस्तेमाल करने पर राजस्थान रॉयल्स का अजीब जवाब, BCCI के नोटिस के बाद कहा- मैनेजर के फेफड़े खराब -
कौन हैं 24 साल के प्रफुल हिंगे? IPL डेब्यू मैच के पहले ओवर में झटके 3 विकेट, तोड़ दी राजस्थान रॉयल्स की कमर -
युवराज सिंह के शिष्य की दुखद मौत, 3 दिन के बाद मिली लाश, IPL में आने से पहले ही चली गई जान -
Hajj 2026: ईरान जंग के बीच सऊदी ने मक्का में बैन की एंट्री! हज से पहले सख्त हुए नियम, उमरा वीजा सस्पेंड -
IPL 2026: जयपुर में नहीं खेलेंगे रोहित-कोहली और धोनी, BCCI ने राजस्थान के फैंस को बनाया बेवकूफ -
MP CM Kisan Kalyan Yojana: 82 लाख किसानों को बड़ा तोहफा! 14-15 अप्रैल को खाते में आ सकती है किस्त -
VIDEO: सुरों की 'देवी' को विदा करने पहुंचे क्रिकेट के भगवान! आशा भोंसले को देख फूट-फूटकर रो पड़े सचिन -
Trump Vs China: अमेरिका पर भड़का चीन, ट्रंप को दी चेतावनी, कहा- 'कोई हमारे मामलों में दखल न दे' -
'Kanika Sharma की वजह से लड़कियां 32 टुकड़ों में कट रहीं', मुस्लिम से शादी पर हिंदू शेरनी रिद्धिमा बरसीं -
Kal Ka Match Kon Jeeta 12 April: कल का मैच कौन जीता- मुंबई इंडियंस vs आरसीबी












Click it and Unblock the Notifications