लंदन से पढ़कर आए जयंत के लिए RLD को फिर से खड़ा करना बड़ी चुनौती
यूपी चुनाव में वापसी करना रालोद के लिए है बड़ी चुनौती, जयंत चौधरी के युवा नेतृत्व की इस चुनाव में है असल परीक्षा।
लखनऊ। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव तमाम मीडिया की सुर्खियां बटोर रहे हैं। इस गठबंधन के बाद माना जा रहा है कि दोनों दल प्रदेश में काफी मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं और मुमकिन है कि इस चुनाव में कुछ अलगी ही छाप छोड़ने में सफल रहे। लेकिन इन दोनों दलों के अलावा उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल की भी भूमिका काफी अहम है, जिस तरह से पार्टी की कमान जयंत चौधरी के हाथों में दी है वह उसे बखूबी आगे बढ़ा रहे हैं और तमाम दलों में युवा चेहरों को कड़ी टक्कर देते दिख रहे हैं।
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2014 की हार 26 जिलों में चुनौती
जयंत चौधरी 2009 में मथुरा से सांसद थे और उन्होंने अपने भाषण के दम पर लोकसभा की जीत हासिल की थी, लेकिन 2014 की हार के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई करने वाले जयंत के लिए इस बार का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे कड़ी परीक्षा है। एक तरफ जहां आरलडी के भविष्य के लिए यह चुनाव काफी अहम है तो दूसरी तरफ जयंत चौधरी की असल परीक्षा भी है, जब आरएलडी के पास ना तो सपा और ना ही किसी अन्य दल का साथ है। जिस क्षेत्र से जयंत चौधरी आते हैं वह जाटों का दबदबा है और पश्चिमी यूपी के इन 26 जिलों पर अपनी पकड़ बनाना जयंत के लिए आसान नहीं होगा।

मुजफ्फरनगर का दंगा बनेगा अहम मुद्दा
पश्चिमी यूपी के इन 26 जिलों में चुनाव 11 व 5 फरवरी को होना है। 2012 में आरएलडी ने यहां कुल 46 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे सिर्फ 9 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी, लेकिन 2014 के चुनाव में पार्टी मोदी लहर में पूरी तरह से साफ हो गई और उसे एक भी सीट हासिल नहीं हुई। लेकिन जिस तरह से 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे हुए उसके बाद जयंत का मानना है कि वापसी करना मुश्किल नहीं है, बीतता समय हमेशा मदद करता है, लोगों के जख्म भी भर चुके हैं और लोग उसी समय में नहीं जीना चाहते हैं, लोग आगे बढ़ना चाहते हैं। यहां लोगों के बीच सामाजिक और आर्थिक सामंजस्य काफी अच्छा है।

जाति समीकरण को रखा ध्यान में
जयंत चौधरी का मानना है कि जो लोग मुजफ्फरनगर के मुद्दे को फिर से उठा रहे हैं वह हमारी ही मदद कर रहे हैं। उनका मानना है कि जो लोग इस मुद्दे को उठा रहे हैं वह अपरोक्ष रूप से हमारी मदद कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ, संगीत सोम दंगों की बात कर रहे हैं, थाना भवन विधायक कर्फ्यू की बातें कर रहे हैं, ऐसे में जितना ये लोग पुराने मुद्दों की बात करेंगे उतना ही हमें फायदा होगा, क्योंकि लोग आगे बढ़ना चाहते हैं। जयंत का कहना है कि हमने सभा जाति समीकरणों का ध्यान रखा है और हर समुदाय के लोगों का टिकट दिया है, हमने मुस्लिम क्षेत्र में मुस्लिमों को टिकट दिया है औऱ हमें उम्मीद है कि यह हमारे पक्ष में जाएगा।

भाजपा से पार पाना चुनौती
पश्चिमी यूपी में पहले चरण का मतदान 11 फरवरी को होना है, ऐसे में अगर आरएलडी यहां एक भी सीट नहीं जीत पाती है तो पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है, लेकिन अगर पार्टी यहां जाटों का साथ पाने में सफल होती है पार्टी के लिए राह काफी आसान हो जाएगी, लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि 2014 के चुनाव में जाटों ने पूरी तरह से भाजपा को अपना बहुमत दिया था। अम्बीर में किसानों से बात करते हुए जयंत चौधरी ने कहा कि किसानों के साथ भाजपा ने ठीक नहीं किया, किसान लाइन में लगे, शादी में खर्च नहीं कर पाए, कई बच्चों के तो स्कूल में दाखिले भी नहीं हो सके, उन्होंने भाजपा के नोटबंदी के फैसले को किसान विरोधी करार देते हुए जाटों को अपनी ओर लेने की कोशिश भी की। बहरहाल देखने वाली बात यह होगी कि क्या इस बार जाट आरएलडी की नैया पार लगाएंगे या एक बार फिर किसी बड़े उलटफेर में अहम साबित होंगे।












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