रायबरेली की जनता के लिए मां की तरह थीं इंदिरा गांधी, लोगों को नाम से बुलाती थीं
रायबरेली। इंदिरा गांधी का रायबरेली में काफी पुराना सम्बन्ध रहा। यह कहा जाए कि उनकी राजनीति की नींव ही रायबरेली थी क्योंकि इंदिरा गांधी जी के पति फिरोज गांधी 1951 और 1957 में रायबरेली से सांसद रहे। इसके बाद 1967 में इंदिरा गांधी ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस की जीत हासिल की और सांसद बनीं। इसके बाद 1971से 1980 तक रायबरेली की सांसद रहीं।

लोगों के घर जाकर मिलती थीं इंदिरा
इंदिरा गांधी का रायबरेली जनता से काफी अच्छा रिश्ता रहा। रायबरेली के लोगों का मानना है कि यहां पर फिरोज गांधी आया करते थे और उनके साथ कभी-कभी इंदिरा गांधी भी लोगों से मिला करती थीं। जब फिरोज गाँधी जी की मृत्यु हुई तो इसके बाद तो जनता से एक परिवार की तरह मुलाकात करती थी चाहे फिर वह दिल्ली हो या रायबरेली, दोनों जगह सम्मान देती थी। रायबरेली में उन्होंने जनता को रोजगार का सहारा दिया। करीब 200 फैक्ट्रियां, सड़कें, पुल, इंस्टीट्यूट,लाइब्रेरी, स्कूल आदि के जरिए जनता की जरूरतों को पूरा करने की पूरी कोशिश की गई और यहां की जनता काफी खुश दिखी। उनको एक ऐसी सांसद मिली जो नेता कम मां जैसी ज्यादा दिखती थीं रायबरेली जब भी आया करती थीं लोगों को उनके नाम से पुकारा करती थीं और सभी के घर जाकर उनके समस्याएं उनके बच्चों के बारे में ज्यादा पूछा करती थीं। अगर रास्ते में जा रही हैं कोई बच्चा उनसे मिलने की कोशिश करता था तो वह अपने गाड़ी से उतरकर तुरंत बच्चे को उसका हालचाल पूछती थी।

इंदिरा गाँधी जिले के कवियों और साहित्यकारों को भी सम्मान देती थीं
इंदिरा गांधी तीन दिन की यात्रा पर न्यूयार्क गयी थी। वहां उन्होंने वहां पर एक पुस्तकालय में जाकर आचार्य महावीर प्रसाद जी की किताब देखी और उसके बारे में जाना तो तुरंत अपने साथ रह रहे यशपाल कपूर जी और पंडित गयाप्रसाद शुक्ला जी से कहा कि जब वह रायबरेली जाएँगी तो वह कुछ इस महापुरुष के लिए कुछ करेंगी और जब वह आयीं तो उन्होंने टी सड़कों का निर्माण किया और उन्होंने सराय बहेलिया खेड़ा से दौलत पुर बाया भोजपुर बनवाया था और इसका उद्घाटन 7 अफ़्रेल 1973 को आचार्य महावीर प्रसाद दिर्वेदी के नाम से किया गया। इंदिरा गांधी की काफी ऐसे किस्से हैं जो रायबरेली में प्रचलित हैं।

इंदिरा की मौत के बाद बदले हालात
रायबरेली में जनता का मानना है कि कांग्रेस में जब से इंदिरा जी मृत्यु हुई है तबसे काफी बदलाव आ गया है। उन्होंने रायबरेली में काफी कुछ किया था। उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की सोनिया गांधी ने कोशिश तो की मगर सफलता पूरी तरह से नहीं मिली। फैक्ट्रियां जिससे जनता को रोजगार मिलता था वह पूरी तरह से बंद हो चुकी है। उनकी विरासतों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। बजट मिलता है पर पूरी तरह से पार्टियों में भेदभाव का का रूप ले लिया गया है।

इंदिरा गाँधी की विरासत की थमती साँसें
इंदिरा गाँधी उध्यान की स्थापना के पीछे वनस्पतियों में अनुसंधान का उद्देश्य था लेकिन यह उद्यान अपनी सार्थकता को साबित नहीं कर पा रहा है। वजह साफ है कि जिस कार्य को लेकर और जिस उद्देश्य से इंदिरा गांधी वानस्पतिक उद्यान नाम देकर अब से वर्षों पूर्व स्थापित किया गया था। उसने वनस्पतियों की अनुसंधान की तो बात दूर रही औषधि पेड़-पौधे भी खत्म हो चुके हैं। वन विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियों को चाहिए कि इस उद्यान में तरह-तरह की वनस्पतियों के पौधे रोपित कर उन को संरक्षित करके उन में अनुसंधान किया जाए, जिससे यह उद्यान एक अनुसंधानशाला के रूप में विकसित हो सके। यह उद्यान लोगों के मॉर्निंग वॉक करने और सैर-सपाटे का एक मात्र साधन बन कर रह गया। यूं तो इंदिरा गांधी वानस्पतिक उद्यान की स्थापना कई दशक पहले करोड़ों की लागत से हुई थी जब रायबरेली में वानस्पतिक उद्यान की स्थापना हुई तो यह जानकर लोग बेहद खुश थे कि कभी हमारे रायबरेली में ही वनस्पतियों में अनुसंधान होगा, यहां औषधीय कार्यशालाएं होगी, यहां आयुर्वेदिक औषधियों का उत्पादन हो सकता है। ढेर सारी संभावनाएं थी लेकिन ना तो इसके विकास के लिए कोई बजट दिख रहा है और ना ही इसको संरक्षित करने के लिए कोई साधन दिख रहा है। लिहाजा यह उद्यान अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।












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