UP election 2022:अखिलेश यादव की ये तीनों रणनीति सफल हो गई, तो BJP का चकनाचूर हो सकता है सपना
लखनऊ, 23 दिसंबर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर अभी तक जितने भी ओपिनियन पोल या चुनाव से पहले के सर्वे आए हैं, सबने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के साथ ही दिखाया है। यह भी अनुमान जताया गया है कि समय के साथ सपा, भाजपा के वोट से अंतर के फासले को कम करती जा रही है। इन तथ्यों को ध्यान में रखकर यहां हम उन रणनीतियों पर चर्चा कर रहे हैं, जिससे अखिलेश यादव की अध्यक्षता वाली समाजवादी पार्टी बीजेपी को टक्कर देने में कामयाब होती दिख रही है। समाजवादी पार्टी ने इस बार के चुनाव में कई ऐसे बदलाव किए हैं, जो पार्टी के पुराने स्टैंड से पूरी तरह से अलग है। लेकिन, मौजूदा परिस्थितियों में अगर यह काम कर गया तो ओपिनियन पोल और असल परिणाम में उलटफेर भी देखने को मिल सकता है।

अति-पिछड़ा वोट बैंक को साधने की भरपूर कोशिश
उत्तर प्रदेश चुनाव में सभी बड़ी पार्टियों की नजर ओबीसी वोटरों पर है। क्योंकि, प्रदेश की आबादी में इनका हिस्सा करीब 54% है। जाहिर है कि ओबीसी वोट बैंक देश के सबसे बड़े सूबे पर राज करने के लिए सबसे बड़ा फैक्टर है और हर पार्टी अपने-अपने हिसाब से इसे साधने में लगी हुई है। लेकिन, ओबीसी में भी एक वर्ग है- अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी)। पिछले कुछ चुनावों से यह वोट बैंक चुनावों की दिशा मोड़ने में सक्षम हो गया है और सपा ने इस बार इसे गोलबंद करने के लिए इस बार खूब पसीना बहाया है। पहले यह वर्ग मुख्य तौर पर बसपा के साथ होता था, लेकिन 2014 के बाद से बीजेपी के साथ चला गया। अखिलेश यादव को भी इल्म हो गया है कि बीजेपी के विजय अभियान को रोकना है तो अति पिछड़ों का समर्थन बहुत ही जरूरी है। इसके लिए भी पार्टी ने तीन बातों पर ध्यान दिया है। पहले जिलाध्यक्षों और महासचिवों के लिए सपा सिर्फ यादव और मुस्लिम चेहरों पर ही यकीन करती थी। लेकिन, इस बार उसने अपनी नीति बदली है और अति-पिछड़ों को भी तरजीह देना शुरू किया है। इसके बाद पार्टी ने प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में इस वोट बैंक को नजर में रखकर छोटी-छोटी यात्राएं निकाली हैं और उन्हीं वर्ग के नेताओं को वोटरों के बीच उतारा है। तीसरे चरण में उसने पिछले दो दशकों में बनीं छोटी-छोटी पार्टियों से गठबंधन किया है, जैसे कि ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी।
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आरक्षित सीटों पर समीकरण बदलने की कोशिश
समाजवादी पार्टी यूपी में पहले आरक्षित सीटों को उतना तबज्जो नहीं देती थी। वह मुस्लिम-यादव गठबंधन को ही इतना सशक्त समझ बैठी थी कि इस ओर ज्यादा काम नहीं किया। लेकिन, इस बार पार्टी का स्टैंड बदल चुका है। 2022 में वह अधिकतर आरक्षित सीटें जीतना चाहती है, जिसपर कभी बसपा अपना एकाधिकार मान बैठी थी। मायावती की पार्टी के कमजोर होने के बाद इन सीटों पर भाजपा सबसे ताकतवतर बनकर उभरी है। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगियों ने 85 रिजर्व सीटों में से 75 सीटों पर कब्जा कर लिया था। अखिलेश यादव ने बसपा से जो ताबड़तोड़ नेताओं का आयात किया है, वह इन्हीं चुनाव क्षेत्रों पर साइकिल को दौड़ाने की पहल है। पहले इन सीटों पर सपा गैर-जाटवों को टिकट देती थी। वही नीति अब बीजेपी अपनाती है। इसलिए माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी बसपा से आए उन नेताओं को टिकट देगी, जिनकी जीतने की संभावनाएं अधिक हैं।

जीतने लायक उम्मीदवारों पर दांव
पार्टी ने अपनी एक रणनीति में बहुत बड़ा बदलाव किया है। वह उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और उनकी चुनाव जीतने की क्षमता को बहुत ज्यादा अहमियत दे रही है। इसके लिए पार्टी ने कुछ मानदंड तय किए हैं। संबंधित चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशी की लोकप्रियता, वहां की जातिगत स्थिति और उम्मीदवारों का समर्पण। प्रत्याशियों की निष्ठा का मतलब यह नहीं कि वह सिर्फ पार्टी के प्रति वफादार रहेंगे, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को लेकर भी पूर्ण निष्ठावान होने चाहिए। मुलायम सिंह यादव के बाद जो पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव आया है, उसका एक उदाहरण रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के रूप में देखा जा सकता है। वह अपनी जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) का समाजवादी पार्टी से गठबंधन चाह रहे थे, लेकिन, अखिलेश का भरोसा नहीं जीत सके तो नाकाम हो गए। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उम्मीदवारों के चुनाव की प्रक्रिया के लिए अखिलेश यादव ने हैदराबाद की प्रोफेशनल सर्वे एजेंसियों की भी सेवाएं ली हैं। वैसे सपा अपने मौजूदा विधायकों को फिर से टिकट देगी, यह भी लगभग तय माना जा रहा है।

समाजवादी पार्टी के सामने चुनौतियां
इन सबके बावजूद समाजवादी पार्टी के सामने यूपी में कुछ कठिन चुनौतियां हैं। मसलन, यह कभी भी कैडर-आधारित पार्टी नहीं रही और माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण के दम पर ही सत्ता में आती रही। मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव का स्थानीय स्तर के नेताओं के साथ एक व्यक्तिगत नेटवर्क स्थापित था, जिसकी अभी अखिलेश के साथ कमी दिख रही है और उनके साथ जो संगठन है, उसकी बुनियाद भी पुरानी पड़ चुकी है। इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी ने पिछले 6-7 वर्षों में जो हर विधानसभा स्तर पर जातिगत और समुदायों के आधार पर मतदाताओं के जिस सूक्ष्म प्रोफाइल पर काम किया है और आंकड़े जुटाए हैं, उसकी अभी समाजवादी पार्टी के पास कमी बताई जाती है। इसके अलावा 2012 से 2017 के पांच वर्ष के सपा के कार्यकाल के दौरान का कई ऐसा 'भूत' है, जो अखिलेश यादव का पीछा नहीं छोड़ रहा है।












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