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नामी चेहरों ने छोड़ा 'बहनजी' का साथ, सवर्ण और ओबीसी नेताओं के बिना कैसे सफल होगी सोशल इंजीनियरिंग

लखनऊ, 10 अगस्त: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव में जाने से पहले सारी पार्टियां पूरे जोर से चुनावी तैयारियों में जुट गई हैं। भाजपा ने जहां अपनी तैयारियों को और तेज कर दिया है वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी एक बार उसी समीकरण की ओर लौटती हुई दिखाई दे रही है जिसके बूते उसने 2007 का विधानसभा चुनाव जीता था लेकिन इस बार बसपा की सुप्रीमो मायावती के सामने कई चुनौतियां भी हैं। तब के दौरे में बसपा के पास हर सवर्णों के साथ ही ओबीसी के नेताओं की भी एक लंबी कतार थी जिसके बूते माया की सोशल इंजीनियरिंग सफल हो गई थी लेकिन इस बार की परिस्थितियां इसके बिल्कुल विपरीत हैं।

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बसपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने वन इंडिया डॉट कॉम से बातचीत के दौरान चुनाव से पहले बसपा के सामने आने वाली चुनौतियों को लेकर विस्तार से बातचीत की। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने स्वीकार किया कि बसपा की सोशल इंजीनियरिंग तभी सफल होगी जब यहां पहले की तरह हर वर्ग और समुदाय के अच्छे और नामी नेता मौजूद रहेंगे। चुनाव से पहले इस कमी को पूरा करना ही होगा।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने कहा, '' बसपा में पहले हर समुदाय के नेताओं की फौज हुआ करती थी। स्वामी प्रसाद मौर्या, बाबू सिंह कुशवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दिकी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर, लालजी वर्मा अब बसपा से अलग हो गए हैं। नेताओं की कमी से जूझ रही पार्टी को इस पर विचार करने की जरुरत है। पार्टी ने अब ब्राह्मण सम्मेलन या यूं कहें कि प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन करने का फैसला किया है लेकिन अगर गौर करें तो राज्यसभा सांसद सतीश मिश्रा के बाद हमारे पास सवर्ण नेताओं का आभाव है। ऐसे में अगड़ों के बीच पार्टी कैसे पैठ बनाएगी। पहले ऐसी स्थिति नहीं थी।''

दरअसल, नवंबर में ही मायावती ने पूर्व राज्यसभा सांसद मुनकाद अली को हटाकर भीम राजभर को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। मुनकाद अली को भी 2019 में आर एस कुशवाहा की जगह प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी लेकिन वह भी मायावती की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। हालांकि बसपा के सूत्रों की माने तो बसपा की रणनीति ओबीसी और सवर्ण पर फोकस करने की है। इसी के तहत अब जिलों में प्रबुद्ध सम्मेलन कराए जा रहे हैं ताकि एक बार फिर जातीय समीकरण साधा जा सके।

पार्टी में ओबीसी नेताओं की कमी चिंता का विषय
सूत्रों ने बताया कि पार्टी की तरफ से हर जिले में भाइचारा समितियों का गठन किया गया है। इसमें एक दलित, एक मुस्लिम और एक ओबीसी सदस्य होने की अनिवार्यता भी रखी गई है। ये लोग अपने समुदायों में पार्टी के लिए काम करेंगे और उसकी विचारधारा को आगे ले जाने का प्रयास करेंगे। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी बैठकों में सार्वजनिक तौर पर यह बात स्वीकार की है कि पार्टी में ओबीसी चेहरों की कमी से पार्टी की गतिविधियों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ने भी यह बताया कि कार्यकर्ताओं की यह चिंता वाजिब है। क्योंकि चुनाव में अब बहुत कम समय ही बचा हुआ है लिहाजा इस पर काम करने की जरूरत है।

एक दिन पहले ही मायावती ने ओबीसी को लेकर किया था ट्वीट
मायावती ने ओबीसी को लेकर अपने एक ट्वीट में लिखा कि ओबीसी वर्ग बहुजन समाज का अभिन्न अंग है, जिसके हित व कल्याण के लिए बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान में धारा 340 की व्यवस्था की व उसपर सही से अमल नहीं होने पर देश के प्रथम कानून मंत्री पद से इस्तीफा भी दे दिया था। बीएसपी भी वैसे ही इन वर्गों के लिए जी-जान से समर्पित। मायावती ने दूसरे ट्वीट में कहा कि राज्य सरकारों द्वारा ओबीसी की पहचान करने व इनकी सूची बनाने सम्बन्धी संसद में आज पेश संविधान संशोधन बिल का बीएसपी समर्थन करती है, किन्तु केन्द्र केवल खानापूर्ति न करे बल्कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी के वर्षों से खाली पदों को भरने का ठोस काम भी करे।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार कहते हैं, निश्चित तौर पर आज के समय में सोशल इंजीनियरिंग ही चुनाव जिता सकती है। लेकिन इसके लिए काम करने की आवश्यकता है। आप देखिए की भाजपा में हर वर्ग को संगठन और सरकार दोनों में बराबर की तरजीह दी जा रही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी हाल ही में हुए फेरबदल में भी यूपी के जिन लोगों को मंत्री बनाया गया वह सभी यूपी में अगले साल होने वाले चुनाव को ध्यान में ही रखकर बनाया गया है। इसी तरह बसपा और सपा को भी सोचना होगा और हर वर्ग और समुदाय के नेताओं को आगे लाना होगा ताकि उसका फायदा पार्टी को मिल सके।

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